गुरुवार, 2 मार्च 2017

अजीब दास्ताँ है ये...

मुझे बताया जाता है कि मेरे जन्म पर मेरे पिता बहुत खुश हुए थे... क्यों हुए यह तो आज तक समझ नहीं आया क्योंकि मुझसे बड़ा भाई भी था और बहन भी... खैर जन्म के कुछ बाद का वक्त... अब तो मुझे याद भी नहीं कि उस वक्त क्या उम्र थी... बस ये याद है कि बहुत छोटी थी... वो ही उम्र जिसे शायद होश सँभालनाकहते हैं... तब जबकि बातें धुँधली ही सही पर याद रह जाती हैं... मैं बेहद अंतर्मुखी थी... कुछ शायद प्राकृतिक रूप से और कुछ साथ घटी घटनाओं की वजह से (हालाँकि ये बात आज समझ पाती हूँ)... पर मुझे ये पता था कि बड़े होकर डॉक्टर बनना है... डॉक्टर की स्पेलिंग पता नहीं थी पर बनना है ये पता था... जरा सा और बड़े होने पर भी सहेलियाँ ज्यादा थीं नहीं और मेरा पसंदीदा खेल बस एक हुआ करता था... तौलिये को सिर पर बांधकर जूड़ा बनाकर टीचर बन जाती... दरवाजे पर सवाल जवाब लिखती और एक काल्पनिक कक्षा को पढ़ाया करती... मेरे इस खेल से किसी को ज्यादा दिक्कत नहीं थी बल्कि पापा खुश ही होते क्योंकि मैं इस तरह अपने सबक याद कर लेती... बस ये था कि मकान मालिक के दरवाजे का हाल बुरा हो जाता... टीचर का वो खेल खेलते वक्त भी मुझे ये पता था कि मुझे बड़े होकर डॉक्टर बनना है... मेरी आँखों में ये ही सपना डाला गया था... मुझे ये अहसास कराया गया था कि मैं उस सफेद कोट के लिए ही बनी हूँ... हालाँकि मेरे खेलों में डॉक्टर बनने का खेल कभी भी शामिल न हुआ...

मेरे माँ पापा के इस सपने में कोई बुराई नहीं थी... बल्कि अच्छा ही था... बेहद सीमित संसाधनों वाले परिवार में मेरे अभिभावकों ने मेरे लिए एक बड़ा सपना बुना था... मेरे पापा की लखनऊ आ बसने की एक बड़ी वजह ये थी कि उन्हें पढ़ाई से बहुत प्यार था... अपने दिनों में उन्हें इसके लिए जो संघर्ष करने पड़े वो सुनकर हम लोग आज भी बेचैन हो जाते हैं... वे चाहते थे उनके बच्चों को पढ़ाई के लिए कभी कोई दिक्कत न हो... खाली हाथ आकर एक अजनबी शहर में बस जाना आसान नहीं होता... पर उन्होंने वो सब किया... बाकी सब जगह कटौती करके संसाधनों को पढ़ाई के लिए इस्तेमाल किया गया... माँ एक सभ्रांत परिवार से आने के बावजूद इन स्थितियों में हमेशा उनके साथ खड़ी रहीं... हमारे पास खिलौने, कपड़े, जूते चप्पल भले खूब सारे न हों पर पढ़ाई में कहीं कोई चूक नहीं... ये भी सच है कि अपनी बहन के मुकाबले मुझे सब कुछ ज्यादा  मिला... उसकी रुचि नृत्य में थी और वो काफी कम उम्र से इसमें सक्रिय हो गई... घर में उसे रोका तो नहीं गया पर कुछ खास बढ़ावा भी नहीं मिला... ऐसा नहीं कि संगीत से कोई दिक्कत हो... मेरे खानदान में संगीत को लेकर बड़ा सकारात्मक माहौल रहा है... पापा तो चित्रकारी भी गजब की करते हैं... बिना किसी ट्रेनिंग के ऐसे क्रिएटिव हैं कि क्या कहा जाए... पर वह क्षेत्र क्योंकि माँ पापा के बुने हुए सपनों में नहीं था और उसकी पढ़ाई कुछ हद तक 100/100 वाली तरफ नहीं बढ़ रही थी तो सपनों की पूरी दिशा मेरी तरफ मुड़ गई... मुझे सबक घोंट के याद करा दिए जाते... कभी कक्षा में सेकंड की जगह थर्ड आ जाती तो इससे बड़ा अवसाद न होता... किताबें, सबक, नंबर ये ही मेरी दुनिया थी... मैं शायद पढ़ने में होशियार नहीं थी, पर याद कर लेती थी... डॉक्टर बनना हैइस बात को मैंने ओढ़ लिया... कुछ जानने वाले मुझे तब, मेरी उस छोटी उम्र से डॉक्टर साहब बुलाने लगे थे... तब क्या बल्कि आज भी बुलाते है... आप इन सपनों का बोझ समझ पा रहे हैं?     
  
छठी में पहुँची तो 25-30 की जगह 50-60 लड़कियों की कक्षा थी... एक छोटे स्कूल से बड़े स्कूल पहुँची थी... वहाँ वो सब लड़कियाँ भी थीं जो कहीं ज्यादा होशियार और समझदार थीं... शायद किशोरावस्था की तरफ बढ़ रही थी तो तरह तरह की बातें सुनकर, बड़ा स्कूल देखकर, वहाँ के माहौल में भटकने लगी... इतनी भीड़ में अब मैं पहले की तरह सेलेब्रिटी नहीं थी... मेरे पास छुप जाने के, न पढ़ने के, होम वर्क न करने के मौके थे... और मैं पिछड़ गई... 60 की कक्षा में सरक कर छठे नंबर पर... शायद वो भी न आती अगर क्लास की एक लड़की ने दीदी से शिकायत न कर दी होती... तब दीदी और माँ ने मेरे सारे छूटे हुए काम पूरे किए थे... मुझे दीदी की तरह जीने का दिल करता... कितनी सारी सहेलियाँ थीं... डांस प्रोग्राम करने अलग अलग शहरों में जाती... वहाँ अपनी टीम में सबकी लाड़ली थी... इतनी व्यवहारकुशल थी कि सब जगह उसकी तारीफें होतीं... और मैं... मेरी सिर्फ पढ़ाई की बातें... जिनसे अब मैं दूर होती जा रही थी...

घर पर इसे और बेहतर करने के प्रयास जारी थे सो मुझे अंग्रेजी माध्यम के स्कूल में डाला गया... डॉक्टर बनना है ये अब सिर्फ माँ पापा का सपना नहीं था... भैया दीदी इस मुहिम से जुड़ चुके थे... दीदी ने क्योंकि हिंदी माध्यम में पढ़ने के बाद मिलने वाली दुश्वारियाँ झेली थीं तो उसका पूरा जोर था कि मुझे अंग्रेजी माध्यम में भेजा जाए... अब ये नया स्कूल तो मेरे लिए आफत हो गया... अंग्रेजी जो बिल्कुल नहीं आती थी... और यहाँ हिंदी छोड़ सब कुछ अंग्रेजी में... बल्कि नियम भी बना दिया जाता था कि कोई हिंदी में बात नहीं करेगा... उस स्कूल में सातवीं में पहुँची मैं हिंदी में सर्वाधिक नंबर लाती थी और बाकी विषयों में लाल निशान... ऐसा निशान जिसे देखने की आदत ही नहीं थी... सिखाया भी नहीं गया था कि असफलता से कैसे मुकाबला करना चाहिए... अंग्रेजी मीडियम कवर करना है’, फिलहाल के लिए ये उद्देश्य था और रट्टू तोता के तौर पर मुझ पर और जोर शोर से मेहनत की जाने लगी... उस दबाव ने मुझे, मेरी रुचियों को पढ़ाई से और दूर किया... जो बदलाव उस उम्र में होते हैं वो भी दिमाग में हो ही रहे थे... स्कूल में मैं किसी टीचर को तब तक पसंद नहीं आई जब तक दसवीं के नतीजों में मैंने सबको पीछे छोड़ते हुए खुद को साबित नहीं किया... इसके बाद ग्यारहवीं में विज्ञान- बायोलॉजी क्योंकि डॉक्टर बनना है... मेरे विषय मेरे घर पर सबने मिल कर चुने थे... मेरा सपना डॉक्टर बनना था पर वो मेरी रुचि कभी नहीं बना... ये बात न मैंने समझी न मेरे घर पर किसी ने... ग्यारहवीं की पढ़ाई बहुत कठिन पड़ गई... उस पर से कहीं ज्यादा होशियार बच्चे थे इस बार क्लास में, जिनकी नींव बहुत मजबूत थी... मैं और मेरी तबीयत वो भार ले ही नहीं पाई... एक साल बाद बारहवीं विज्ञान से हुई तो पर डॉक्टर का सपना उसके बाद मैं आगे लेकर नहीं चली... ये निजी तौर पर मेरे और मेरे घर पर भी सभी के लिए बहुत कठिन था... हाँ इस बीच एक बात हुई थी... बहन ने महिला अध्ययन में एमए किया... उसकी बातें सुनती तो रोमांच से भर जाती थी... पहली बार मन में इतनी मजबूती से किसी विषय के लिए महसूस किया था कि मुझे भी ये पढ़ना है... उसकी किताबें लेकर पढ़ती, उसे सबसे बहस करते देखती... ये उसमें बड़ा बदलाव था... आत्मविश्वास और चमक से भरा... जाने कौन सी किताब थी, शायद छिन्नमस्ता जो तभी पढ़ ली थी और कितनी ही जगह पर खुद से जोड़ भी पाई थी... बहन अच्छी बेटीथी तो एमए के बाद शादी के लिए उस वक्त ना न कह सकी...  खैर...
बीए में घर वालों की आँखों में नया सपना आ गया था... आईएएस बनाने का... डॉक्टर, इंजीनियर, आईएएस, टीचर... इसके सिवा होता ही क्या था... मेरे पास उन्हें समझाने को तर्क नहीं थे कि मैं पत्रकारिता या फाइन आर्ट्स क्यों पढ़ना चाहती हूँ... एक दिन गुस्से में आकर खुद के बनाए सारे स्केच कूड़ेदान के हवाले कर दिए... उस वक्त किसी का साथ भी नहीं था... विषय अपनी पसंद का एक ही मिला क्योंकि पढ़ना उसी कॉलेज में था और मनोविज्ञान की सारी सीटें भर चुकी थीं... एक मेरे, एक पापा के और एक भाई की पसंद के विषय से बीए हुआ जिसका हाल बिल्कुल मिली जुली सरकार जैसा था... अंग्रेजी साहित्य के अलावा मुझे सब कुछ किसी दूसरी दुनिया का लगता... पर इन सबके बीच अब एक बात अंदर बैठ गई थी कि कुछ बनना है... और प्रेम, अफेयर, लड़कों से दोस्ती इसमें बाधा होंगे... घर में माहौल तो यूँ भी ऐसा ही था... एमए में जाकर सबकी इच्छाओं के विरुद्ध महिला अध्ययन में दाखिला ले लिया... अब तक घर वालों का सपना बदल कर मुझे लेक्चरर, प्रोफेसर देखने का हो गया था... शायद बचपन में होता तो अभी तक का जीवन बेहद सफल व सकारात्मक रहा होता... क्योंकि वो जूड़ा बनाकर काल्पनिक क्लास को पढ़ाना शायद मेरी रुचि थी जिसे कोई समझ नहीं पाया... पर अब शायद मैं बदल चुकी थी...

महिला अध्ययन... यहाँ मैं बदलने लगी, खुद को, बाहर की दुनिया को समझने लगी, रूपरेखा मैम और विषय के जरिए मुझे मेरी अभी तक की बेतरतीब उलझी जिंदगी से निकाला जा रहा था... सवालों के जवाब मिल रहे थे... चुप नहीं कराया जा रहा था, सवाल करने की आदत को प्रोत्साहित किया जा रहा था... मैं पहली बार उस ऊर्जा, बदलाव, खुशी और सकारात्मकता के दौर में थी जब मुझे असल मायनों में खुद का कुछ होना महसूस हो रहा था... मैं वो कह और कर रही थी जो मुझे पसंद था... दूसरे साल में ठीक इसी वक्त घर में कुछ और दिक्कतें हुई जो आगे के लिए बहुत परेशानी खड़ी कर गईं... दिल्ली में थी जब पता चला अपने विभाग में टॉप किया है... आगे पढ़ने के लिए बाहर जाना चाहती थीं पर मना हो गया... बहुत टूटी... सोचा कोई बात नहीं मैम को गाइड चुन पीएचडी कर लूँगी पर तभी मैम ने खुद को विश्वविद्यालय से अलग कर लिया... नेट पहली बार में ही निकालने के बावजूद मेरे लिए सारे रास्ते बंद थे... वो पीएचडी अब तक न हो पाई... खैर...
इसके बाद एक संस्थान से पत्रकारिता हुई और उसके बाद नौकरी जो जारी ही है... मीडिया में जाने के बाद जो असहजता लगी तो दोबारा गई नहीं... अफसोस भी नहीं हुआ... माँ पापा के उस लेक्चरर वाले आखिरी सपने को भी किनारा कर दिया... पर आज जहाँ जिस क्षेत्र में हूँ, जिस जगह हूँ ये मेरी पसंद का है... यहाँ मिली हर सफलता असफलता मेरी है... तमाम दिक्कतों के बावजूद ये मुझे प्रिय है, मैं इसी में आगे बढ़ी हूँ और यहीं रहना भी चाहती हूँ... मुझे मिले तमाम दोस्तों के चलते मेरी इस क्षेत्र से मुहब्बत बढ़ी ही है क्योंकि जिंदगी के प्रति समझ बढ़ी है, लड़ने की ताकत मिली है... मैं शायद एक इनसान के तौर पर जिस तरह यहाँ विकसित और परिपक्व हुई हूँ और कहीं न हो पाती... आज मेरे माँ पापा भी मुझसे बहुत खुश हैं, ये अलग बात है कि डॉक्टर वाली कसक अब भी शायद है कहीं... पर आज उन्हें अपनी भी गलतियों का अहसास है और वो मेरे लिए बहुत है... मेरे पिता ने अपनी पहचान खुद गढ़ी थी, मुझे ऐसा करते देखना भी उन्हें अच्छा ही लगता है... अब इस हाल में हूँ कि मोटे तौर पर अपने रास्ते गिरते पड़ते रोते हँसते बना ही लेती हूँ... शादी को लेकर संग्राम जारी है पर उसमे भी समय के साथ साथ बड़े बदलाव आए हैं...

ये सारी गाथा और कहानी अभी कुछ दिन पहले ताजा हुई... जब एक फिल्म देख रही थी... बेहतरीन अभिनय से कसी और बेइंतिहा पसंद की जा रही फिल्म कहीं कहीं मुझे परेशान कर रही थी... अभिभावक को जिस संपूर्णता में सही दिखाकर भगवान जैसा बना दिया गया था वह मुझे उलझन दे रहा था... पिता की जिद, अहं, दीवानगी, गुस्सा, सोच सब कुछ सही दिखाया जा रहा था... बचपन, किशोरावस्था में लड़की की असहमतियों में उसे पूरी तरह लापरवाह और गलत साबित किया जाता है... सही गलत का अंतर और साफ तरीके से बताने के लिए दोनों बेटियों के बीच तुलना हो जाती है... पूरी फिल्म को यूँ बुना जाता है कि असहमति होने पर पूरी संवेदनाएँ पिता के साथ हो जाती हैं... बेटी को गलत साबित करने के लिए तब तक असफल होते दिखाया जाता है जब तक वो वापस पिता की शरण में नहीं आती... और वापस आते ही वो सही साबित होने लगती है... यहाँ बात सही गलत की नहीं रह जाती बल्कि हमेशा से चली आ रही आदर्श बच्चेवाली बात को ही मजबूती देने की हो जाती है... जहाँ सहीतो अभिभावक ही होते हैं और गलतियाँ सिर्फ बच्चों से ही होती हैं... कहानी के साथ छेड़छाड़ होनी ही थी तो शायद बेहतरी के लिए की जा सकती थी... बेटी पर गर्व करने की बस एक ये ही स्थिति बन पाती है... माँ, हमेशा की तरह न के बराबर दिखती हैं... कुछ ऐसी रूढ़ियाँ या चलन जिन्हें चुनौती देने की जरूरत समझी ही नहीं जाती या यूँ कहें रिस्क नहीं लिया जाता... एक बात ये भी कि क्या विजेता होकर ही अस्तित्व माना जाएगा? उसके क्या मायने होंगे? जो शीर्ष पर न पहुँच सके उसके लिए जीवन का कोई अर्थ नहीं

आमतौर पर कुछ विचार देने पर सबसे पहले निजी जीवन से जोड़ दिया जाता है... शायद इसीलिए अब मेरी आदत हो चली है कि मैं पहले बातों को व्यक्तिगत जीवन पर लेती हूँ तब सोचती हूँ... मैं बचपन में बेहद अंतर्मुखी थी... बड़े होने पर एक ऐसा समय आया जब जरा खुली पर दोस्तों से भरी जिंदगी को कोई प्रोत्साहन नहीं मिलता था क्योंकि अर्जुन की तरह चिड़िया की आँख पर सारा ध्यान लगाने को कहा जाता था... ये बहुत बाद तक रहा... मेरी आदत मेरे व्यवहार में शामिल होती गई... तमाम सारी दीवारें जो आज तक भी खड़ी हैं जिन्हें एक एक कर तोड़ने की कोशिश करती हूँ... उनमें कुछ हैं जो अब होती ही नहीं क्योंकि वो खुद मेरे व्यवहार में उतर आई हैं... जैसे दोस्त बनाना... उनसे मिलना जुलना, घूमना फिरना, घर आना जाना... खासतौर से पुरुष मित्र... मेरे इस व्यवहार में मेरे घर के साथ साथ बड़ी संख्या में उन पुरुष मित्रों ने मुझे ऐसा बनाया... घर में ऐसी दोस्तियों के लिए हतोत्साहित किया जाता और ज्यादातर पुरुष मित्र आज नहीं तो कल घर वालों की बातों को सही साबित कर देते... करते करते एक ऐसा दायरा बन गया कि अब इसके पार जाते भी नहीं बनता... एक वो समूह जिसमें सबको बहुत आराम से रहते या खुश होते देखती हूँ, लगता है मैं उससे कितनी दूर हो चुकी हूँ... पता नहीं इस खालीपन के लिए किसे जिम्मेदार ठहराऊँ... घर पर आज भी इसका इलाज शादी बताया जाता है...  
      
ये ही मोटे तौर पर हमारा समाज है... मैं उन लड़कियों के समूह से हूँ जो पढ़ी लिखी हैं, जानकार हैं, अपनी और अपने से जुड़े और लोगों की जिम्मेदारियाँ ले सकती हैं, अपने हक जानती हैं, दूसरों की मदद करने की स्थिति में हैं, तरक्कीपसंद हैं, आजाद खयाल हैं... बराबरी और साथ में भरोसा रखती हैं, मजबूत हैं और भावुक भी... लेकिन अपनी सोच, इच्छाओं, विचारधारा, उसूल, ख्वाहिशों और परिवार के साथ सामंजस्य बैठाने में वे वो बड़ी कीमतें चुकाती हैं... ये एक ऐसा माहौल होता है जहाँ दोस्ती की जरूरत समझाई ही नहीं जा सकती... वो एक बेमतलब की चीज होती है... ‘मन’ तो सिर्फ भटकाने का काम करता है... महिला मित्रों के लिए भी कोई खास प्रोत्साहन या स्वीकार्यता नहीं होती... वजहें ढूँढ़ी जाती हैं कि क्यों मिला जाय, क्या काम है... क्यों कहीं जाओ या क्यों कोई आए... ये व्यर्थ समय नष्ट करना है... साथीके विकल्प को उनके सामने पेश किया जाता है लेकिन वो मंजूर न होने पर दूसरा विकल्प खालीपन ही होता है... जब जिरह कर माहौल बदलने की कोशिश हो तो दोस्त बनने पहुँचे लोग ही कितनी बार आपको गलत साबित कर देते हैं... ये दुहरी मार दम घोंटती है... दिमाग का इतना इस्तेमाल कि वो थक जाता है और इसके बाद इस खालीपन में ही वो विकल्प तलाशे जाते हैं जिनसे इसे भरा जा सके... ये जिंदगी होती तो आपकी मर्जी वाली है पर वैसी नहीं जैसी आपने चाही थी... हम खुद को ये कहकर समझाते हैं कि कभी किसी को मुकम्मल जहाँ नहीं मिलता... और एक वक्त के बाद इसकी शिकायतें भी बंद हो जाती हैं... हम एडजस्ट कर लेते हैं... नहीं करना चाहिए था, बोलना चाहिए था, विरोध-जिद करनी चाहिए थी पर हम थक चुके होते हैं तो एडजस्ट कर लेते हैं... हम आज भी सवालों के घेरे में रहते हैं तो एडजस्ट करते हैं... हर उस जगह जहाँ किया जा सकता है क्योंकि कुछ बेनतीजा बहसें भीतर गुस्से को ही भरती हैं... और हम इन सवालों से दूर रहना चाहते हैं... 


हम वे परिवार हैं जिनके दबाव बच्चों को उनके मन से जिंदगी के सपने बुनना सिखाते ही नहीं... उनकी फिक्र को सोच और व्यवहार में जैसे उतरना चाहिए था वो कभी उतरती नहीं... ये सभी कुछ काफी हद तक इस सामाजिक ढाँचे के असर में ही होता है... मुझे नहीं पता कि अपनी आँखों में जबरन डाले गए सपने को सच कर देती तो क्या होता? उस न्यूरोसर्जन के लिए सफलता और खुशी की क्या परिभाषाएँ होतीं? जीवन के प्रति नजरिया कितना इनसानियत भरा होता, किस तरह की स्थितियों में होती, क्या तब भी ऐसे ही दबाव और सवाल होते? क्या खुश और संतुष्ट होती? परिवार खुश होता ये तय है पर वह तो आज भी खुश ही है... क्या मेरे परिवार को और पीछे पड़ जाना चाहिए था? और मुझे? और पढ़ाई, कोचिंग, सुबह जल्दी उठना - देर तक पढ़ना... कुछ भी करना, सब कुछ भूल कहीं भीतर खुद को दफन कर खत्म कर देना पर उस सपने को पूरा करना और मिसालबन जाना... सपने के रंगीन काँच वाले चश्मे को यूँ पहनना कि कभी जिंदगी में आँखों से न उतारना... ऐसी स्थितियाँ कि जब वो कभी उतरे भी तो आँखों में रोशनी ही न बची हो... वो मेरी ही बेहतरी के लिए तो था... इस दुनिया में जहाँ लड़कियाँ जरूरत तो हैं पर बेटियाँ अनचाही होती हैं, ऐसे में उसके लिए इतना बड़ा सपना देखना, हर सुविधा मुहैया कराना, मेहनत करना (यकीन मानिए मेरे घर पर मेरे ऊपर सबने बहुत मेहनत की)... था तो मेरी ही बेहतरी के लिए पर उस बेहतरीकी परिभाषा क्या है? गर बहू, पत्नी, प्रेमिका की अस्मिता की इतनी बातें होती हैं तो बेटियों की क्यों नहीं या इस मामले में तो किसी भी बच्चे की क्यों नहीं... वंचित करना गलत है पर दबाव से भरकर जीवन कंट्रोल करना क्या सही है? परिवार की उलझनों में अब किसे सही और किसे गलत कहा जाएगा... पापा मेरी हर सफलता पर मारे खुशी के भावुक हो जाते थे, गर्व से भरी एक अलग ही आवाज होती थी उनकी... तो क्या अपनी राह चुनकर मैं उनकी अपराधी हो गई हूँ... क्या मेरे चुनाव को मेरी असफलता में गिना जाएगा? हर किसी की उम्मीदों से इतर चल अगर मैं अपराधी हुई हूँ तो क्या अपनी गुनाहगार नहीं? खुद से मेरी भी कई उम्मीदें थीं जिन्हें किनारे कर दिया और एडजस्टकिया, अब भी करती हूँ... प्यार, फिक्र, खयाल सबको एक दूसरे का था और है भी पर शायद वैसा नहीं जैसे की सामनेवाले को जरूरत या ख्वाहिश थी... कोई भी किसी को संतुष्ट नहीं कर सका... किसी के हिसाब से नहीं चल सका... जाने क्यों हम चाहते हैं कि कोई हमारे हिसाब से चले... सफलता असफलता की परिभाषाएँ सिर्फ वो नहीं जो हम जानते हैं... आज मुखर हूँ, बहुतों के लिए बद्तमीज भी हूँ... मुझे मेरे भीतर का प्यार और कड़वाहट दोनों इसी समाज से मिले हैं... आत्मविश्वास भी और डर, कमजोरी भी... मैं मिसालनहीं बनी पर क्या जिंदगी में इसके सिवा कुछ भी नहीं? शायद कभी हम समझ सकें कि एक जिंदगी है जो महत्वाकांक्षाओं के परे है... गर नहीं भी है तो इसकी तैयारी कराने का सिर्फ एक ही तरीका तो नहीं... 

बुधवार, 28 सितंबर 2016

सामाजिक सर्विलांस पर रखे चरित्र

(इस लेख को फिल्म समीक्षा की उम्मीद में न पढ़ें)
  
वो एक अजीब स्थिति थी...नहीं पता कि हॉल में पसरा सन्नाटा किस बात का था...लोग फ़िल्म की कसावट में जकड़े थे....उसके बहाव में बह रहे थे...सस्पेंस महसूस कर रहे थे...या खामोशी से उन उन लम्हों को याद कर रहे थे जब वो ऐसी किसी स्थिति का हिस्सा बने थे...जब उन्होंने ऐसा किसी के साथ किया था...जब ऐसा कुछ उनमे से किसी के साथ हुआ था...जब उनके चरित्र को उनकी निजी आदतों पर आंका गया था या फिर उन्होंने ख़ुद ऐसा किसी और के साथ किया था...जब वो ऐसे दोस्त, पड़ोसी, माता पिता, बॉयफ्रेंड, गर्लफ्रेंड, रिश्तेदारसरकारी अधिकारी कुछ भी बने...जाने क्यूँ मैं दिल से ये ही चाह रही थी कि वहां बैठा हर इंसान अपनी ज़िन्दगी में आये उस लम्हे को याद कर सके जब उसने ऐसा किया...किसी से भले ज़िक्र न करे पर कहीं खुद अपने अंदर अपने ऊपर शर्मिंदा हो...याद करे कि वो देर रात घर लौटने वाली लड़की बदचलन नहीं....वो कॉल सेंटर में काम करती है, कॉल गर्ल नहीं है और अगर है भी तब भी उसकी अस्मिता, वजूद और हक सिमट नहीं जाते...वो दोस्तों संग शराब पीने वाली लड़की वेश्या नहीं...वो एक बेहद अक्लमंद और संवेदनशील इंसान और कामकाजी औरत है....और वैसे आप तो शराब न पीने वाली लड़कियों को पिछड़ा समझते हैं...तो अब क्या हुआ...ऐसा दोगलापन भी क्या कि अगर वो साथ बिस्तर तक पहुँच जाय तब तो ठीक वरना वो बदचलन...इस तरह के तमाम सवाल उठाये ही गए हैं...जिनकी कसौटी पर आम तौर पर लड़कियों का चरित्र आंका जाता है...पर क्या तुम्हें याद आया कि कब तुम्हारी साथी की उस पार्टी में जाने की इच्छा नहीं थी, तुम्हारे बॉस के साथ वो असहज हो रही थी पर तुम्हे ज़रा भी कोफ़्त नहीं हो रही थी...ये अलग बात है कि किसी रोज़ इसी तरह वो अपना एक और साथी चुन लेती तो वो तुम्हारे लिए बदचलन हो जाती...क्या याद आया तुम्हे कि उस दिन तुम्हारी साथी एकांत चाहती थी...उसे तुम्हारा साथ तो चाहिए था पर शारीरिक सम्बन्ध नहीं और कैसे उसके मना करने के बावजूद तुमने उसकी एक न सुनी थी और कैसा इमोशनल ब्लैकमेल किया था उसे....कैसे प्रेम के सारे अर्थ सिर्फ़ शरीर तक आकर सिमट गए थे...क्या तुम्हे याद आई अपनी वो दोस्त जो जिससे बेइंतेहा दोस्ती थी तुम्हारी...हर सुख दुःख हंसी मज़ाक लड़ाई झगड़े के साथी लेकिन वो तुम्हे एक दोस्त के तौर पर ही देखती थी...अपने एक तरफ़ा प्यार में पागल होकर अपने सड़े अहं के साथ किस कदर मुश्किलें खड़ी की तुमने...कैसी कैसी स्थितियों में क्रूर हुए तुम...कि सावधानी लेने के नाम पर तुम्हे अपने मज़े में खलल लगती थी जबकि ताक पर तुम्हारी साथी की सेहत थी...वही साथी जिससे तुम्हे बेइंतेहा मुहब्बत थी....कैसे उस छोटी बच्ची के जिस्म पर उँगलियाँ फिराने की कोशिश की थी तुमने...उसकी सहमी आँखों पर ज़रा भी तरस नहीं आया तुम्हे....जबकि कैसे बहन से छेड़छाड़ होने पर खून खौल उठता था तुम्हारा...कैसे दफ़्तर में आधुनिक कपड़े पहनने वाली, अंग्रेजी बोलने, शराब पीने, पार्टी करने वाली लड़कियों पर तुम फ़िदा रहते थे लेकिन घर पर तुम्हे बीवी बहन और बाकी औरतें सीमा रेखा के अन्दर ही सुहाती थीं....कैसे किसी की भावनात्मक कमजोरी के दौर को तुमने अपने लिए एक मौके के तौर पर देखा था...कैसे अपनी बीवी की सेक्स के लिए इच्छा ज़ाहिर करने पर असहज हो गए थे तुम...प्रेम में सेक्स ज़रूरी है और इसलिए तुमने गर्लफ्रेंड से किया भी पर ऐसे सेक्स करने वाली लड़कियां वहाँ भीतर तुम्हारे दिल में 'अच्छी' नहीं ही मानी जाती थीं...क्या कुछ भी याद करके शर्मिंदा हो पाए तुम? वो किरदार जिन्हें तुम परदे पर देख रहे थे वो तुम्हारे और मेरे बीच के ही किरदार हैं  

फ़िल्म देखते वक़्त मेरे दिमाग में फ़्लैश बैक में जाने क्या क्या चल रहा था...हर उम्र, स्थितियों, जगहों से जुड़ी वो बातें याद आ रही थीं जिन्हें हमेशा दफ़न करने की ही कोशिश की लेकिन ज़रा सा छेड़ भर देने से एक भयंकर शोर के साथ वो दुबारा खड़ी हो जाती थीं...जैसे आज हुई थीं...मैं खामोश थी...फिल्म के बाद भी खामोश रही...लोग वाह वाह कर रहे थे, तारीफें कर रहे थे और मैं समझ नहीं पा रही थी कि इस फिल्म में इन्होने ऐसा क्या देखा जो पता नहीं था..सुना नहीं था, किया नहीं था या किसी भी तरह अनुभव ही नहीं हुआ था...क्या वो सब अभिनय कर रहे थे ये दिखाने का कि हमने कभी ऐसा नहीं किया...क्या वो भीतर ही भीतर शर्मिंदा थे...क्या कहीं कोई चोट लगी थी...क्या उन लड़कियों को ये अहसास हुआ था कि अपने मर्ज़ी के साथी चुनकर, या बाहरी दुनिया का हिस्सा बनकर वे कुछ ग़लत नहीं कर रहीं...ये उनकी निजी ज़िन्दगी और उनके हक हैं...जिन पर उन्हें विश्वास और फख्र होना चाहिए...क्या ये लड़कियां याद कर पा रही थीं कि कब इन्होने किसी और लड़की के चरित्र प्रमाण पात्र जारी किये थे....यूँ ही ‘स्लट’, ‘बिच’, ‘होर’ कह दिया था...जिस लड़के को ये पसंद करती थीं वो अगर किसी और लड़की को पसंद करता था तो वो लड़की गालियों की हक़दार बन जाती....पड़ोस में देर रात लौटने वाली या फिल्म देखने जाने वाली लड़की ‘उस टाइप’ की हो जाती सिर्फ इसलिए क्यूंकि हम वो सब काम नहीं कर पा रहे थे...हर वो लड़की जो हमे सिखाई गयी ‘अच्छी लड़की’ या नैतिकता की परिभाषा से इतर कुछ करती वो गलत हो जाती...क्या याद आ पा रहा था?

मैं बेचैन थी...पर मैं चाहती थी कि वहां बैठे सभी लोग बेचैन हों...वो सब मर्द बेचैन हों जो कभी न कभी ऐसे हुए थे...वो जानें देखें कि कैसी सड़ांध है उनकी सोच की लेकिन उसी पल मुझे ये भी लगा कि क्या वाकई नहीं जानते कि इन्होने क्या किया है और कब किया है...बाहर इनमे से कितनों ने ही इस पर बड़ी बड़ी बातें की हैं...ये आधुनिक हैं, खुली सोच के हैं...इन्हें लड़कियों की आजादी देखकर ख़ुशी होती है...पर क्या वाकई ये सोच है? क्यूंकि व्यवहारिकता तो कुछ और ही बता देती है...वो उस दोगलेपन को उजागर कर देती है जिसकी कल्पना भी नहीं की थी.... “चलते हैं न तुम्हारे घर...कब तक लोगों की परवाह करोगी...तुम व्यस्क हो और ये तुम्हारी ज़िन्दगी है”..... “अरे यार एक दो ड्रिंक से कुछ नहीं होता, ट्राय न”, “अभी 10 ही तो बजे हैं चली जाना क्या जल्दी है”....“सेक्स प्रेम का बहुत ज़रूरी हिस्सा है...तुम भी किस ज़माने की बातों में उलझी हो लेट्स डू इट”.... “सॉरी यार मिस्ड इट अगेन ऐसा करो आई पिल ले लो”....तुम ही कहते थे न...तो ये सब तो वहां होता है जहां साथी अपनी मर्ज़ी से चुने जाते हैं...तुम्हारे मन की इस दुनिया में शराब और सेक्स ज़रूरी हो जाता है...वो आधुनिक होने का प्रमाण हो जाता है...इतना कि तुम्हें किसी का किसी के साथ कितनी बार भी सेक्स करना गलत नहीं लगता लेकिन बाद में गलत सिर्फ लड़की ही कैसे हो जाती है....अब उन लड़कियों का सोचके देखें जहां चुने हुए साथी जैसा कुछ नहीं....

मेरी ज़िन्दगी समाज के सर्विलांस पर होती है....कब उठती हूँ...कहाँ जाती हूँ...कौन घर आता है...कहाँ काम करती हूँ...क्या काम करती हूँ...क्या पहनती हूँ...क्या खाती हूँ....लड़कों से दोस्ती है...कब वो अकेले आते हैं घर...आते हैं तो घर के अन्दर क्या होता होगा....सेक्स ही होता होगा....घर पर लड़के नहीं आने चाहिए...एक ही लड़का आता है या अलग अलग...अगर आते हैं तो लड़की गलत है...रात को कहाँ से आती हूँ...दो दिन तक घर से बाहर क्यूँ रहती हूँ...किससे बात करती हूँ...पड़ोसियों के यहां कथा में क्यूँ नहीं जाती और देर रात फिल्म देखने क्यूँ जाती हूँ....शादी नहीं की...क्यूँ नहीं की...उम्र हो गयी है...ज़रूर कोई चक्कर होगा...घरवालों ने ज्यादा छूट दे रखी है...क्या पता इसमें ही कोई कमी हो...जाने कितने सवालों की एक्सरे मशीन से हर रोज़ हर पल मेरे चरित्र का स्कैन होता है और अगर उस दिन मैं बाइज्ज़त बरी हो सकी तो वो मेरी किस्मत है...ये अलग बात है कि इनमे से किसी सवाल का जवाब देना अब मैं ज़रूरी नहीं समझती...

उस फिल्म को देखते वक़्त क्या खुद से सवाल किया था कि क्यूँ करते हैं हम ऐसा...क्यूँ बन जाते हैं ऐसे जाननेवाले...पड़ोसी, परिवारजन, रिश्तेदार, दोस्त या सहकर्मी...शर्मिंदगी हुई थी या ये ही लगा था कि अब लड़कियां ऐसा करेंगी तो उनके साथ ऐसा तो होगा ही...मुझे लगता है ज्यादातर ने आत्मग्लानि से बचने के लिए अपने अन्दर उठ रहे उन सवालों को ये जवाब देकर ही शांत किया होगा....और ये भी जानती हूँ कि अगले ही दिन मेरा पाला एक ऐसे व्यक्ति से पड़ सकता है जिसके लिए मैं सिर्फ इसलिए पिछड़ी हूँ क्यूंकि मैंने उसके साथ शराब पीने का ऑफर ठुकरा दिया....आपको लगता है तमाम दफ्तरों में बैठी लड़कियों, औरतों की जिंदगियां आसान होती हैं....इस गुलाबी आईने में ख़ुद की वो सियाह सूरत और सीरत पहचानिए....आपके फूहड़ मज़ाक पर आपको हड़का देने वाली लड़की का ‘सेंस ऑफ़ ह्यूमर’ बीमार घोषित हो जाता है और वो प्रोफेशनल सेक्टर के लिए अयोग्य हो जाती है....तुम्हारी नज़र में हमारा चरित्र हमारी बर्दाश्त करने की सीमा से तय होता है...

मेरे इर्द गिर्द तमाम लोगों के लिए ये सवाल है...पर अब मुझे वाकई नहीं लगता कि कोई फर्क पड़ता है इससे...क्यूंकि वापस आकर एक अच्छा रिव्यु पोस्ट हो जाता है, कुछ देर चर्चा हो जाती है...तारीफ हो जाती है सलाह दे दी जाती है कि ज़रूर देखें....और ऐसा कहकर हम ये ज़ाहिर कर देते हैं कि हम ऐसी ज़िम्मेदार फिल्में देखते हैं मतलब संवेदनशील हैं....हम कितने ज़िम्मेदार हैं और फिल्म में दिखाए गए खलनायकों जैसे नहीं हैं....हमें स्त्री विमर्श पर बोलने के लिए कुछ और बातें पता चल जाती हैं जिसके ज़रिये हम प्रभावशाली बातें कर पाते हैं और संवेदनशील होने का मैडल हथिया लेते हैं...किसी लड़की से ज्यादा बात करने या उसमें दिलचस्पी लेने और संवेदनशील होने में ज़मीन आसमान का फर्क होता है...अब भी मानती हूं कि सब ऐसे नहीं लेकिन बड़ी संख्या ऐसों की ही है...चेहरे दुहरी सोच के नकाब में हैं….रही बात ‘न’ को स्थापित करने की तो जानकारी का दायरा बढ़ाइए... ‘No Means No’ (न मतलब न) विश्व भर में चल रहा अभियान है...हिन्दुस्तान में भी इसकी कम चर्चा नहीं हुई...पर आपके लिए तो ‘न’ का अर्थ लड़की की शर्म से निकाला जाता है और उसमें आपको एक अलग ही किस्म की ‘हाँ’ दिखती है...      

एक बात जो बेहद ज़रूरी है...संवाद...खासतौर पर लड़कों बच्चों के साथ...संवाद की कमी ज़बरदस्त भटकाव ला रही है...उन्हें दोस्तों में अपनी इमेज बनाने का अजीब दबाव है...लड़की छेड़ना, मार पीट, मां बहन की गालियां, हिंसा...तमाम सारी बातें जिसपर उनसे चर्चा नहीं की जाती...अपने आसपास के लोगों, मीडिया और माहौल से प्रभावित होकर वो एक अलग ही ट्रैक में बढ़ जाते हैं...जहां उन्हें ‘बुलेट राजा’ जैसा बनना होता है....यहां ज़बरदस्ती करना ‘हीरो’ होने की ज़रूरी शर्त है....हर रोज़ इतनी हिंसा की ख़बरों में जिन अपराधियों का ज़िक्र है वो हमारे आपके घरों से ही निकल रहे हैं...उनमें अनपढ़ भी हैं और कान्वेंट से पढ़े हुए भी...झुग्गी में रहने वाले हैं और बड़े अधिकारियों के बेटे भी.... ये जिस ‘भौकाल’ की ख्वाहिश और नशा है देखिएगा वो आपके समाज को बना क्या रही है....हिंसा को ख़त्म करने के लिए पहले सहमती और असहमति की संस्कृति के लिए जगह बनाइये...किसी लड़की का चरित्र सिर्फ़ इसलिए संदिग्ध नहीं हो जाता क्यूंकि वो आपकी ‘अच्छी लड़की’ की परिभाषा से फर्क है.  


और लड़कियों...बिना वजह शर्मिंदा होने की ज़रूरत नहीं बल्कि सबकी बातों पर तो ध्यान देने की भी ज़रूरत नहीं...पर अपने जैसी रहो....किसी समूह विशेष में शामिल होने या उनकी स्वीकार्यता पाने के लिए भला क्यों ख़ुद को बदलो...हमारी ज़िन्दगी हमारी दुनिया भला कोई और क्यों तय करे....ख़ासतौर पर वो जिसके लिए हम उपभोग की वस्तु से इतर कुछ हुए ही नहीं...तुम्हारे लिए नियम क़ायदे कानून भला वो क्यों बनाएं, तुम्हारे फ़ैसले वो क्यों लें...कुछ करो तो इसलिए करो कि तुम्हारा दिल किया...किसी भेड़चाल में शामिल होने के लिए नहीं...बस दिमाग की खिड़कियां खुली रखो...और हां किसी के साथ कुछ ग़लत होने पर बन सको तो उसकी हिम्मत बनो परेशानी नहीं...ये कहने से बचो कि ‘हम भी तो बाहर जाते हैं हमारे साथ तो कभी ऐसा नहीं हुआ’...क्यूंकि ‘ये’ किसी घोषणा के साथ नहीं होता...और करने वाले ज़्यादातर जान पहचान के होते है....बाकी...फिल्म तो अच्छी थी ही...लोगों का मनोरंजन हुआ और वीकेंड की एक शाम सार्थक साबित हुई. 

मंगलवार, 26 अप्रैल 2016

बराबरी की लड़ाई में बेनकाब होते चेहरे


सब कुछ ठीक ठाक सा ही चल रहा था...लोग मोदी विरोधी बातें लिख रहे थे... दक्षिणपंथी रवैये पर सरकार की बखिया उधेड़ रहे थे...कोई भी भेदभाव वाला, पिछड़ा, गैरबराबरी वाला, दमनकारी फ़ैसला आता और पूरी मजबूती के साथ एक पूरा वर्ग विरोध में खड़ा हो जाता...कसके एक दूसरे का हाथ थामे, हौसला देते हुए...नए दोस्त बनते गए, उनकी बातों से लोग प्रभावित होते और फिर और लोगों से जुड़ते जाते...ऐसा करते करते दक्षिणपंथी व्यवस्था के ख़िलाफ़ एक भरा पूरा वर्ग जिसमे छात्र- छात्राएं, बुद्धिजीवी, प्रोफेशनल्स, गैर सरकारी संगठन, सामाजिक कार्यकर्ता जैसे तमाम लोग एकजुट हो गए...पर ज़रा एक बुर्के- परदे नाम का झोंका क्या आया पल भर न लगा इस समूह को औरत और मर्द में विभाजित होने में (सब ऐसे नहीं हैं ये भी सच है, पर बड़ी आबादी ऐसी ही निकली)... इस मसले को धार्मिक रंग भी खूब दिया गया.

जिसने बुर्के के विरोध में कुछ कहा उसे गालियाँ मिलीं, चरित्र प्रमाणपत्र जारी हो गए, धमकियाँ मिलने लगीं और क्या कुछ नहीं कहा गया...ध्यान दें ये वो ही लोग हैं जो अभी तक साथ चल रहे थे...तरक्कीपसंद ख़याल ज़ाहिर कर रहे थे... ऐसी बड़ी बड़ी बातें कि आपके पास प्रभावित होने के अलावा कोई चारा न हो...पर ये ही वो लोग हैं जो अब मां बहन की गालियाँ दे रहे थे...रंडी से लेकर रंडी की औलाद तक का तमगा लगा रहे थे...शैतान की उपाधि दे रहे थे एंटी मुस्लिम या एंटी हिन्दू होने की बात करने लगे थे....आख़िर हक़ की आवाज़ उठाने वाली औरत "रंडी" क्यूं? वैसे सच कहूँ तो मुझे बहुत ज्यादा हैरानी नहीं हुई क्यूंकि ये बात मैं पहले भी कह चुकी हूँ कि मैंने जेंडर से जुड़े मुद्दों पर बड़े बड़े तरक्कीपसंदों का गला बैठते और उन्हें बगले झांकते देखा है...तो भई एक झटके में कइयों का मुखौटा उतर गया...ये भी क्या ज़बरदस्त टेस्टिंग हुई.

कुछ बेहद मूलभूत बातें...और इन्हें यहाँ दर्ज करने से पहले ये साफ़ कर दूँ कि मेरे हिसाब से बराबरी किसी भी धर्म में औरतों को नहीं मिली इसलिए यहाँ इसे किसी एक विशेष धर्म के लेंस से देखना आपकी आँखों और दिमाग की कमज़ोरी होगी जिसपर मुझे कोई सफ़ाई नहीं देनी.

1-      लड़की लड़का पैदा हुए, न बुर्के में हुए न बिकनी में न घूंघट में न धोती कुरते या कुरते पायजामे में....जी हाँ वो नंगे पैदा हुए...कैसे हुए ये भी जानते ही होंगे...नहीं जानते तो गूगल कीजिये लेख से लेकर वीडियो तक सब उपलब्ध है....वे औरत मर्द के बीच उन्ही शारीरिक संबंधों का नतीजा थे जो आपके लिए शादी से पहले पाप और शादी के बाद पुण्य होते हैं. 9 महीने भ्रूण बनकर उसी औरत के गर्भ की गर्मी में पले बढ़े जिससे जुड़ी बातें खुलकर करना शर्म की बात हैं...और उस भ्रूण के विकसित होकर एक शिशु बनकर दुनिया में आने का रास्ता वो ही था जिसे आपके यहाँ नरक का द्वार कह दिया गया है...पैदा होते ही मां बच्चे को उसी छाती से दूध पिलाती है जिसे आप आमतौर पर बाकी लड़कियों के क्लीवेज झांकते वक़्त देखते हैं...तो बात साफ़ है कि सब कुछ जुड़ा तो शारीरिक संरचना से है...बस लड़की और लड़के में ज़रा फ़र्क है.  

2-      पैदा होने के बाद दोनों को कपड़े में लपेटा गया...बच्चे को पता नहीं था कि वो क्या है...वो बस टुकुर टुकुर विस्मय से ये नयी दुनिया देख रहा था...बच्चा बड़ा होता है उसका नाम रखा जाता है, उसकी परवरिश होती है, खेल तय होते हैं, काम तय होते हैं, मिज़ाज तय होते हैं, व्यवहार तय होते हैं और कपड़े भी तय होते हैं....ये सब उसके जीवन में इतने आहिस्ता से शामिल किया जाता है जैसे उसका खाना बदलना या उसके कपड़ों की माप बदलना कि सबकुछ बदलता भी जाए और पता भी न चले...नतीजा लड़के माचो मैन बनते हैं और लड़कियां डेलिकेट डार्लिंग...दोनों के लिए उनकी डील डौल बेहद ज़रूरी हो जाती है पर एक को मजबूती दिखानी होती है तो दूसरी को अपने शरीर के उतार चढ़ाव और नाज़ुक- गोरी चमड़ी...एक अपने मज़बूत बाजुओं पर इतराता है तो दूसरी अपनी गोरी कलाइयों में खनकती चूड़ियों पर...एक को चौड़ी छाती ताननी होती है तो दूसरी को अपना वक्ष छुपाना होता है...कहीं कुछ दिख न जाए....कहीं कोई शॉर्ट्स टी शर्ट में होता है तो दूसरी ओर कोई अपना दुपट्टा और कमर से नीचे लटकती चोटी संभाल रही होती है...टांगे दिखना, झीना कपड़ा पहन लेना, या बाकी छोड़िये जीन्स टी शर्ट पहनने पर भी त्योरियां चढ़ने लगती हैं...गांव देहात में पल्ला सिर से सरकना नहीं चाहिए और बुर्के की तो खैर कोई उम्र ही नहीं होती. यहाँ ध्यान दीजिये कि कपड़े तय करने से पहले कतई पूछा नहीं गया...विकल्प नहीं दिए गए...लड़की के सामने चार तरह के परिधान रखकर ये नहीं कहा कि अपनी पसंद का पहनावा अपनी सहूलियत से चुन लो...हाँ चार एक ही तरह के परिधान भले रख दिए गए हों...साथ ही दिमागी परवरिश ऐसी कि वो इस सब को सही मानकर चले.

3-      हम उस समाज में बढ़ने लगते हैं जहाँ जिस लड़की का शरीर दिख जाए तो वो बदचलन हो जाती है और उसके साथ कोई अप्रिय घटना होने पर वो खुद ज़िम्मेदार होती है क्यूंकि वो सही लड़की नहीं थी...भीषण गर्मियों में देखिये अपने घरों में कि किस तरह मर्द अधनंगे टहलते हैं कि गर्मी बहुत है और औरत के पास विकल्प नहीं...गाउन पहन कर किसी बाहर वाले के सामने नहीं आ सकती मानो इसकी गिनती कपड़ों में है ही नहीं. मज़े की बात है आज तक कभी ऐसी कोई चर्चा होते नहीं सुनी कि मर्दों को शरीर ढंक कर रखना चाहिए ताकि वो औरतों की बुरी नज़र का शिकार न हों...मतलब आप ये मानते हैं कि बुरी नज़र सिर्फ मर्द की होती है बल्कि बातों से तो यूँ लगता है कि सारे मर्दों की बुरी ही होती है...तो भैया अगर रोग तुम्हे है तो इलाज की ज़रूरत भी तुम्हे ही है न...ऐसा तो है नहीं कि बुखार तुम्हे आएगा तो दवा अपने पडोसी की कराओगे.

4-      यहाँ एक और रिवाज़ चल निकला कि भई गुस्सा कहीं का भी और कैसा भी हो उसे निकालो औरत पर और अगर ज्यादा ही रंजिश है तो उसकी यौनिकता से बेहतर कोई विकल्प नहीं...वहीँ प्रहार करो क्यूंकि ये न सिर्फ़ उसकी बल्कि पूरे खानदान की ‘इज्ज़त’ है...मतलब ये कि दिमाग, समझ, व्यवहार, काम, या दिल, जिगर, गुर्दा, हाथ, पैर, आँख, कान, मन भर नसों और हड्डियों से भरे पूरे शरीर में आपको दिखा क्या- योनि...अब भई जब बच्ची हुई थी तब उसने तो कहा नहीं था कि खानदान की इज्ज़त को उसकी योनि में फिट कर दो...तो ये माजरा क्या है...कुछ भी नहीं आपकी मानसिक बीमारी का एक लक्षण मात्र है...और इसमें आप अकेले शामिल नहीं हैं...हर वो व्यक्ति इसमें शामिल है जिसके लिए शर्म हया लड़की का गहना हो जाते हैं...मर्दानगी की परिभाषाओं में तो शर्म का ज़िक्र होता ही नहीं...और न ही हमारे समाज में लड़कियों को विरोध करना सिखाया जाता है...उसे बताया जाता है त्याग, करुणा, सहनशक्ति, ममता, शर्म, सुन्दरता (जिसकी परिभाषाएं भी कोई अच्छी नहीं)...तो भई कुल मिलाकर औरत हुई सामान और मर्द को बनाया गया उसका मालिक.

5-      धर्म हुए, नियम कानून हुए, व्यवस्थाएं बनी, काम तय हुए...बात ये, कि ये सब किये किसने...कौन शामिल था जब ये सब तय हुआ...जब पुरुष घर का मुखिया और बेटा घर का चिराग हो गया...जब सती और जौहर के रिवाज़ तय हुए...जब पति स्वामी हो गया, जब औरत घर की चार दीवारी में सीमित कर दी गयी...जब उसके हिस्से धीरे धीरे सिर्फ सुनना, आदेश का पालन करना, बच्चे जनना और उनका पालन पोषण करना आ गया...उसे बुरा न लगे तो उसे देवी बना दिया...उसके क़दमों में जन्नत होने की बात कर दी...इस तरह एक लॉलीपॉप पकड़ाया और कहा गया बस इसमें ही खुश रहो. शरीर के हिस्सों को शर्म से जोड़ दिया और ज़िन्दगी भर उनकी हिफाज़त करने की हिदायत दे दी...पायल चूड़ी झुमके हार की खनखन और असहज कर देने वाले कपड़ों की भव्यता को तड़कीला भड़कीला बनाकर उसकी मोबिलिटी पर कण्ट्रोल कर दिया...उसने इन कैद की जाने वाली जंजीरों का मतलब न भांपा या यूँ कहें आपने चकाचौंध के साथ साथ ऐसा डर का माहौल बनाया कि उसके पास दूसरा विकल्प नहीं था...सिन्दूर न लगाया तो पति की जान ख़तरे में, व्रत न रखा तो बेटे की...अरे शादी से पहले ये मर्द कैसे जीवित था बिना औरत के सिन्दूर लगाए, मंगलसूत्र पहने...और बहन बेटियों के लिए व्रत का तो कोई कांसेप्ट मैंने आज तक न सुना न देखा

6-      कहां हैं आपके इतिहास में औरतें...बस ऋषि मुनि जैसे विद्वान् हैं...जिन्होंने रचा क्या गैरबराबरी से भरी पूरी किताबें...औरतें कहां थीं उस वक़्त...ऐसा नहीं था उनके पास दिमाग नहीं था...बात ये थी कि उनके पास मौका नहीं था...आज देखिये....कहीं भी किसी भी परीक्षा के नतीजे उठा के देख लीजिये...तमाम संघर्षों के बाद भी लड़कियां जब मैदान में उतरती हैं तो सैलाब बन जाती हैं...मुस्लिम साथी बात करते हैं कि उस वक़्त हमारे यहाँ इतनी तरक्की पसंद खयालात थे कि महिलाओं की ज़बरदस्त प्रतिभागिता थी...हर काम में उनका दखल था...व्यवसाय हो या युद्ध उनका दखल सब जगह था...तो भैया अब क्या हो गया...ज़रा अब अपने व्यवहार को देखो...अब देखो कितना आज़ादख़याल या खुला माहौल मिल रहा है लड़कियों को...कितने मौके मिल रहे हैं...इस्लाम के नियम, उनकी ‘मर्ज़ी’ और उनकी सुरक्षा के नाम पर उन्हें बुर्के के पीछे ढकेला हुआ है...अपने पहनावे में भी बदलाव न करते...और जब तुम शॉर्ट्स पहने टहला करते हों सड़कों पर, क्यूँ तब तुम्हारा इस्लाम खतरे में नहीं आता, तब तुम कूल कैसे हो जाते हो. ठीक ये ही बात घूंघट पर जाती है.

ये कैसी व्यवस्था या सोच है तुम्हारी कि लड़कियां तुम्हे वो पसंद आती हैं जो मॉडर्न हों, अक्लमंद हों...आज मिलें, कल डेट करें, देर रात साथ घूमें और परसों बिस्तर पर पहुँच जायें...न पहुंचे तो पिछड़ी हुई...पर हाँ अक्लमंद कितनी भी क्यों न हों बहस न करें...प्रेम के मायने कितने फ़र्क कर दिए गए... और ये ही परिभाषाएं बदलते देर नहीं लगती जब बात घर की औरतों की हो...उनका घर से बाहर आना जाना, पहनना ओढ़ना, व्यवहार, काम काज सब परम्परागत...बाकी छोड़िये कल तक जो मॉडर्न गर्लफ्रेंड थी वो भी अगर बीवी बन जाए तो उसे भी अपनी सीमाएं समझ लेनी चाहिए...और अगर कभी इसपर बात छेड़ी जाए तो कहा जायेगा हम तो मना करते हैं पर वो अपनी मर्ज़ी से ऐसा करती हैं...अगर वो अपनी मर्ज़ी से ऐसा करती भी हैं तो क्या आपकी ज़िम्मेदारी नहीं की आप उन्हें जागरूक करें...आप उन्हें विमर्श में शामिल करें...उन्हें दुनिया भर में हो रहे बदलाव और उसकी ज़रूरत के बारे में बताएं...पर नहीं आप उनकी हाँ में हाँ मिलाते हुए बुर्के या ऐसी किसी भी बात को उनकी पहचान या सुरक्षा से जोड़ देते हैं और अपने तरक्कीपसंद दोस्तों के बीच आकर बेचारे बन जाते हैं.    

बातें बराबरी की होनी चाहिए...हर पीछे छूटे व्यक्ति को मुख्यधारा में लाने की होनी चाहिए और सिर्फ बातें नहीं कोशिशें और काम होने चाहिए....कभी संपत्ति में अधिकार की बात हो तो दिक्कत हो जाए, वो हक के लिए आवाज़ उठाये तो बुरी हो जाए...एक बेचारे बेसहारा को तरस खाकर जितना दिया जाए वो उसी में खुश रहे- कुछ ऐसी ही सोच है इस व्यवस्था की...वो ढंकी रहे और सिर्फ तब दिखे जब आप देखना चाहें, तब नहीं जब वो दुनिया देखना चाहे...अपने हिसाब से...धूप में तपना चाहे, बारिश में भीगना चाहे...बाहें फैलाए और भर ले भीगी मिट्टी की खुशबू अपने भीतर...आप सोच भी कैसे पाते हैं कि आप दूसरे के जीवन को कंट्रोल करें...आप तय करें उसके लिए...और धर्म को सबसे बड़ा हथियार बना लें...नहीं बनना वो कमसिन हूर परी...हमें क्या बनना है ये हम तय करेंगे...न तुम न तुम्हारा धर्म...जिस धर्म में बराबरी न हो...जिसकी पहचान जालीदार टोपी, दाढ़ी मूंछ, बुर्के, तिलक, और चार मंत्रो तक हो, हम उसे खारिज कर देंगी...जाओ कर लो शिकायत उस ख़ुदा और भगवान् से जिसे तुमने मंदिर के घंटों, मूर्तियों, और मस्जिद की सीढ़ियों तक सीमित कर दिया है...तुम्हारा ईश्वर फ़र्क है        

तुम दस लड़कियों से सम्बन्ध बनाओ तो कुछ नहीं पर अगर लड़की के एक से ज्यादा सम्बन्ध रहे तो उसका चरित्र खराब...इस तरह की और तमाम सारी बातें हैं जो तुम्हारे व्यवहार और तुम्हारी सोच के साथ साथ इस व्यवस्था की चालाकियों का खुलासा करती हैं...तभी तो कल तक बेहद अक्लमंद लगने वाली लड़की रंडी या रंडी की औलाद हो जाती है...जिसे आपने रंडी कहा उसके साथ जुड़ने वाले मर्दों या उसके रंडी होने का कारण बनने वाले मर्दों को आप क्या कहते हैं...बाप दादा भाई की यौनिकता पर हमले वाली गालियाँ क्यूँ नहीं...उनके लिए नामर्द होना गाली है...हमे हर वो शास्त्र और साहित्य जलाना है जो बराबरी को कहीं भी किसी भी रूप में रोकता है, गलत बताता है...और जिस योनि को गालियाँ देते हो, याद रखो तुम्हारा वो अंग जिस पर इतना गुरूर है तुम्हे वो क्या तुम भी इस दुनिया में न होते अगर ये योनि न होती...व्यवस्था गलत है, उसका विरोध करो...जहाँ गलत है, वहां विरोध करो...सही गलत को सहूलियत के हिसाब से नहीं चुना जाता...गर तुम ऐसे स्वार्थी हो तो दूसरों को किस मुंह से गलत कहते हो, उनके दमनकारी व्यवहार के ख़िलाफ़ क्यूँ बोलते हो...खुद के भीतर झांको और खुद को जवाब दो हम तो असलियत देख चुकीं....आखिरी बात...तुम्हारे कहने से आज तक न हम देवी हुईं न हमारे क़दमों में जन्नत आई...तो भैये तुम्हारे कहने से रंडी भी न होने की....तुम खुद को संभालो तुम्हारे लिए वही बड़ा काम है.  

शुक्रवार, 14 अगस्त 2015

कभी न भूलती वो एक जोड़ा कजरारी आंखें


अपनी लाडली संग नानी
चौक में लगे नीम के नीचे चारपाई पर बैठी बड़े ही विस्मय और कौतुहल से मैं उसकी कजरारी आँखें देखती और मन में सोचती कि नानी ने कितना सुन्दर काजल लगाया है इसके...सुबह सुबह ही लगा देती हैं क्या कि कभी देखा ही नहीं...फिर फुदकते हुए नानी के पास पहुँचती और पूछती कि गाय के काजल उन्होंने लगाया क्या...वो बालमन के सवाल पर हंस देतीं और मेरे आगे के सवालों से बचने के लिए कह देती हाँ....पर इससे तो और सवाल उपज जाते...कब लगाती हो, कैसे लगाती हो, रोज़ लगाती हो, सब लोग अपनी अपनी गाय के लगाते हैं, इससे क्या होता है...ऐसी झड़ी कि नानी खीझ जातीं...मैं वापस चारपाई पर आती और फिर उतने ही ध्यान से उन बड़ी बड़ी सुन्दर कजरारी आँखों को निहारने लगतीउसकी पूँछ के काले सफ़ेद बाल देख नानी को बताती कि देखो ये बुड्ढी हो रही है...

फिर कुछ समय बाद एक बछिया हुई....सफ़ेद, छोटी सी, छोटा सा मुंह, छोटे छोटे खुर और नन्ही सी पूंछ...वो गाय के आगे पीछे घूमा करती...और मैं उसके आगे पीछे...ऐसे मचल उठी थी मैं उसे देखकर...कित्ती प्यारी है ये....अरे इसकी आँखों पर भी काजल लगा है और ये तो गाय से भी ज़्यादा सुन्दर है...अपनी नन्ही मुट्ठियों में भर कर मैं बार बार उसको चारा देती...नानी से कहती उसे प्यास लगी होगी चलो पानी पिलाते हैं...बचपन में काम करने का कुछ ज़्यादा ही चाव होता है..बड़े लोगों जैसा....मेरे लिए एक छोटी बाल्टी रख दी गयी थी...तो बस उसमे भर कर बछिया के लिए पानी लाना...इस घर में अब एक नयी दोस्त आ गयी थी और अब मुझे बाहर जाने की ज़रूरत नहीं थी...मैं सबको चहक चहक कर बताती कि पता है हमारे घर में सुन्दर सी बछिया आई है...अब भला गाँव के बच्चों के लिए इसमें क्या नया था...वो मेरी नादानी पर हंस देते और मैं मुंह बना लेती...हाँ मामी लोग मेरी ही तरह चहक कर पूछतीं...अच्छा क्या सच में?? कब आई? कैसी दिखती है? हमें भी दिखाओगी? और बस मेरी ख़ुशी का ठिकाना नहीं...   

जो काम नानी करती वो मुझे भी करना होता....मैं कोई छोटी बच्ची थोड़े ही न थी...पानी लाया जाता तो एक छोटी बाल्टी मेरी, चारे का गट्ठा (बिठुग) होता तो एक छोटी बिठ्गी मेरी, तसले में गोबर उठता तो छोटा तसला मेरा भी होता, चौक की लिपाई होती तो नन्हे नन्हे हाथ भी गीली मिट्टी और गोबर संग फिसल रहे होते और रात को रोटियाँ सिकतीं तो छोटी छोटी टेढ़ी मेढ़ी रोटियां मैं भी बनाती...नानी गाय के लिए बनाती तो मैं बछिया के लिए...वो बर्तन धोतीं तो मैं धुले बर्तन अन्दर रखती...बस फिर खाट में उनसे चिपके, तारों, जुगनुओं को निहारते और नानी की कहानियां, लोरियां सुनते सो जाती...

जब बड़ी हुई तो बछिया एक बड़ी तंदुरुस्त गाय में तब्दील हो चुकी थी, ये बड़े बड़े सींग, सबको मारने को आती, उसे बस मेरी नानी ही खिला पिला सकती थीं या एक से दूसरे खूंटे में बाँध सकती थीं...हाँ लाठी लेकर नानाजी भी ये काम कर लेते थे...जब नानी दूध दोने को बैठतीं तो कई बार वो इधर उधर करने लगती...तो पहले उसे डांट पड़ती.... “गौड़ी...देख ले हां”...वो मज़े लेती और तब भी न सुनती तो नानाजी लाठी लेकर खड़े हो जाते...उसके बाद वो एकदम शरीफ बच्चे की तरह सीधी रहती.. बचपन में मैं ये प्रक्रिया बड़े ध्यान से देखती थी और वो दूध के ऊपर उठता झाग देखकर कितना खुश होती थी...गुड़ के साथ गरम दूध मिलता था, गुड़ वाली खीर बनती थी, छांछ, मक्खन, गरम गरम घी और घी के बाद बचा वो सुनहरे रंग का महियर...चीनी मिलाकर खाने में क्या तो स्वादिष्ट लगता था..रोटी के अंदर रोल बनाकर...वाह..जैसे अभी अभी जैसे जीभ में स्वाद घुल गया हो...

ये गाय बड़ी नखरीली थी...या यूँ कहें कि नानी ने नखरे उठाये तो वो ऐसी होती गयी...ऐसी लाडली...ज़रा देर धूप न लगे, ज़रा बौछार पड़ी नहीं कि गौशाला में बाँध दो, हैण्ड पंप का पानी पिलाओ, किसी का जूठा नहीं...उसकी अपनी बछिया का भी नहीं...सिर से मारकर गिरा देती थी बाल्टी....सारे गाँव के गाय भैंस नहर जाते पानी पीने और इनके लिए बूढ़े नानी नाना हैंडपंप से पानी लाते, ताज़ा चारा, दाल चावल रोटी सब्जी, आटा गुड़...सब चाहिए होता था...गुड़ तो अलग से इनके लिए बनवाया जाता था...कई बार नानी उसके बगल में बैठी बतियाया करती, उसे ज़रा सहलातीं तो वो गर्दन को लम्बा कर आगे बढ़ा देती और आँखें मूँद लेती...नानी बातें करती और उसे सहलाती रहती...वो आँख मूंदे तसल्ली से सब सुना करती...

मेरी मां और इस गाय में शिकायत भरा रिश्ता रहा...जैसा दो बहनों में होता है न..कि मां तुम मुझसे ज़्यादा प्यार उसे करती हो...बिलकुल वैसा...होना लाज़मी भी था...मेरी नानी कभी हमारे पास यहाँ रहने नहीं आयीं क्यूंकि गाय थी, कभी आराम नहीं करती थीं, क्यूंकि गाय की सेवा करनी होती थी...पिछले साल ही जब दोपहर को उनके बगल लेटी थी तो वो कह ही रही थीं...“मि त रात दिन बुलुद कि म्यार रैंदी रैंद चल जांद न ये त मि अपर समण खड्या दीन्द...ये गौड़ थे कैल नि रखण...पाणी भि नि दीण”...उन्हें रात दिन ये ही फ़िक्र सताती थी कि उनके बाद इस गाय का क्या होगा...एक बार दोनों बिछड़े थे तो दोनों ने खाना पीना छोड़ दिया था...गाय को कोई कुछ कह देता तो बढ़िया वाली फटकार मिलती...मेरी नानी का जीवन पूरी तरह से गाय और नानाजी के इर्द गिर्द था...गाय उन्हें उनके ब्याह के गौदान में मिली बछिया की पीढ़ी थी...तो 70-71 सालों का साथ था इस पीढ़ी के साथ...फिर तो ये लाड़ दुलार भी लाज़मी था और अपनी जगह मेरी मां की शिकायतें भी..

पर क्या खूब साथ प्यार और साथ निभाया तुम तीनों ने...नाना गए तो हम लोगों की तमाम कोशिशों के बाद भी तुम नहीं रुकी और आहिस्ता से हाथ छुड़ाकर यूं गयी कि आज भी तुम्हारी ठंडी हथेलियों का अहसास बिलकुल ताज़ा है मेरे हाथों में मेरे ज़हन में...अभी जैसे कल की ही बात हो कि तुम मेरी गोद में थी...बचपन से लेकर बड़े होने तक का फ्लैशबैक है कि थमता ही नहीं...इतना ताज़ा कि यहाँ कुछ ब्लैक एंड व्हाइट नहीं...सब एकदम साफ़ रंगीन...तुम्हारी तस्वीर पर उँगलियाँ फेरते वक़्त आज भी आँखें और दिल भर आता है और एक सिहरन सी दौड़ जाती है उँगलियों के रास्ते पूरे जिस्म में...नाना को गए तीन महीने हो गए और तुम्हे होने वाले हैं...जाने यकीन क्यूँ नहीं होता...जब तुम गयी थी तब ही लोग कहने लगे थे अब ये गाय न रह पाएगी....कैसी खामोश हो गयी थी वो...उसकी खामोशी देख रोना आने लगता था...कल तक जो किसी को पास फटकने नहीं देती थी आज उसे कोई भी बाँध ले रहा था, खिला ले रहा था....वो सब समझ गयी थी...मां की चिंताएं अब अलग हो गयी थीं कि कैसे रह पाएगी गाय उनके बिना...वो ये सोच सोचकर रो देतीं...पड़ोसियों ने पहल की और अपने यहां ले गए...मां पापा को आये 10 दिन ही तो हुए थे कि पापा लौट गए थे वहां...उसी दिन उसकी तबियत बिगड़ गयी थी...और ऐसी बिगड़ी कि सुधरी नहीं..मानो इंतज़ार कर रही हो अपनों का...खाना पीना छोड़ा तो कमज़ोर हो गयी...गिर गयी तो घाव हो गए...पापा अपने घर ले आये थे...महीने भर से रात दिन सेवा करते...थोड़ा थोड़ा करके खिलाते पिलाते रहते...दवाइयां करते, चोटों पर मरहम लगाते, अब कुछ दिन से छोटे बच्चों की तरह बोतल से पानी पिलाने लगे थे...वो उठ नहीं पाती तो बगल वाले मामाजी की मदद से उसको खिसकाकर उसके नीचे का पुआल बदलवाते...बारिश ऐसी कि रुकने का नाम न ले...खेतों में मेढ़ें टूट गयीं...बारिश ने दिक्क़तें और बढ़ा दीं...वो फैल कर लेट गयी थी इसके लिए गौशाला घुटन भरी हो जाती...बाहर ही शेड बनाया गया...5 दिनों से खाना पीना बंद कर दिया था...एक दिन थके हारे पापा अपने लिए चाय बनाकर लाये और साथ में रस्क...जाने क्या दिमाग में आया कि क्या पता गाय भी खा ले...एक दिया तो उसने खा लिया...बेचारे बगल से फ़ौरन एक पैकेट खरीद कर लाये...उसे खिलाया बोतल से पानी पिलाया तब ख़ुद चाय पी...अब पापा के रात दिन उसके इर्द गिर्द होते...वो कहते मां ने जीवन भर इतनी सेवा की है...इतना लाड़ प्यार से पाला है ऐसे कैसे छोड़ दें...गाय की जगह इंसान होती तो क्या छोड़ देते...परिवार की सदस्य है ये भी...जाने क्या चलता रहता था दिमाग में कि गर्दन लम्बी कर लेटकर सारा वक़्त रसोई की तरफ़ ताका करती...मन बांवरा होता है जैसे सब कुछ जानते हुए मैं उम्मीद पाले बैठी थी कि तुम बोल पड़ोगी, लौट आओगी...वो तो फिर मुझसे कहीं बढ़कर थी...वो तुम्हारी राह तकती रहती कि तुम अभी रसोई से निकलो और फिर उसे सहलाओ...तुम न आयीं और तुम्हारी बाट देखते देखते वो ही तुम्हारे पास चली गयी...कल की रात उसकी हम इंसानों के बीच आख़िरी रात थी.

मैं कभी तुम तीनों की एक दूसरे के बिना कल्पना नहीं कर पाती थी...कैसे करती कभी अलग अलग देखा ही नहीं था...दीदी की शादी में तुम आई थी और विदाई होते ही रट पकड़ ली थी लौटने की....ऐसा जुड़ाव एक दुसरे से कि अलग रह ही नहीं पाते थे....मुझे खूब याद है घास के गट्ठे लिए अभी हम दूर होते थे...पर जाने ये गाय कैसे जान जाती थी कि पुकारना शुरू कर देती थी...हम लोगों तक उसकी आवाज़ पहुँचने लगती...उस घर में तुम्हारे और नाना के बाद परिवार की वो ही एक सदस्य रह गयी थी जिसमें मैं तुम्हारी कल्पना करती...पर भला वो भी इस सदमे और बिछोह को कैसे सहती...मैं जब जब उसके कष्ट के बारे में सोचती थी तो आँखें भर जातीं...पर आज सुबह फ़ोन पर जब उसके जाने की ख़बर मिली तो दिल धक् से हो गया...जैसे एक पल को सब रुक गया हो....हम इसे भी नहीं रोक पाए...बचपन की यादों की जिस किताब को सीने से चिपकाए रहती हूँ...उसके पन्ने ये कैसी कैसी कहानियाँ समेटते जा रहे हैं...मैं इसे और कसके थाम लेती हूँ...कि कोई पल न बिखरे....अलविदा मेरी एक और साथी....याद आ रही है बचपन की वो दुपहर...छोटी बाल्टी में मेरा तुम्हारे लिए पानी लाना...नन्ही हथेलियों में चारा बटोर लाना...फिर खाट पर बैठना और विस्मय से तुम्हारी कजरारी आंखें निहारना...नानी तुम कितना अच्छा काजल लगाती हो!!              


मंगलवार, 9 जून 2015

क्यूंकि... तू नहीं थी तेरे साथ एक दुनिया थी...

1

“उठ ल्यो रे अफार लोग कबती पूड़ों म चल गीं” (उठ लो रे, वो देखो लोग कब का खेतों में चले गए)....नानी के यहां की सुबह अक्सर इसी डांट से होती...हम लोग अलसाए करवट बदलते हुए कहते कि उन्हें तो खेत में जाना है हम भला क्यूँ जल्दी उठें...और फिर सो जाते...ये अलग बात है कि इतनी चहल पहल में नींद फिर आना मुमकिन नहीं होता था....अन्दर से उठकर आते और बाहर अलसाकर मोढ़े में बैठ जाते...जहां से अपनी वो दुबली पतली छोटी सी नानी कुछ न कुछ काम करती दिखती रहती...अगर बाहर सोये होते तब तो उजाला अपने आप सुबह उठा देता था....नानी हर मौसम में ठीक चार बजे उठ जाती थीं....उधर गुरुद्वारे में गुरबानी शुरू होती इधर नानी बिस्तर छोड़ देतीं....मैं पिछले 32 सालों से ये ही क्रम देख रही थी...वो उठतीं...चाय बनातीं, पीतीं, पूरे आँगन में झाड़ू मारतीं, कूड़ा जलातीं, गाय का गोबर उठातीं, उसे चारा डालतीं और फिर चाय की केतली दुबारा चूल्हे पर चढ़ जाती...चाय की ऐसी शौक़ीन कि क्या कहिये...मेरे ननिहाल में नाश्ते में लोग रोटी सब्ज़ी या चाय रोटी जैसा कुछ खाकर खेतों पर निकल जाते हैं...नानी भी रोटी खातीं...चूल्हे पर दाल चढ़ातीं, गाय को छांव वाले खूंटे पर बांधतीं, दरांत उठातीं और मुंडेड़ा बांधे खेत के लिए निकल पड़तीं. 

मैं भी उनके साथ जाती थी...हमारे लिए ये घूमना भी होता था और इसका चाव भी बहुत होता...छोटी नहर के बगल बगल उनके साथ साथ चलती...उचक कर नहर देखती तो नानी डांटतीं...बड़ी नहर के ऊपर वाला संकरा पुल पार करते...मैं तो डरते डरते करती...नानी आराम से...और उसके बाद आगे फिर छोटी नहर के बगल बगल खेतों से होते हुए अपने खेत पहुँचते....नानी अपना मुंडेड़ा कसतीं और चरी के बीच जाने कहां गायब हो जातीं... 

मैं खेत में इधर उधर फुदका करती... ढों के पेड़ के नीचे बैठ जाती...ननि ननि करती उन्हें ढूंढती फिर उनके पीछे पीछे रहती...वो चारा थोड़ा थोड़ा काटकर आगे बढती रहतीं और मैं अपनी नन्ही हथेलियों से उन छोटी छोटी गड्डियों को एक जगह पर इकठ्ठा करती जिसका बाद में बड़ा गट्ठा बनाया जाता...नानी एक छोटा गट्ठा मेरे लिए भी बनातीं...जब ज़रा बड़ी हुई तो ख़ुद ही काट लेती थी...

बचपन में लौटते में कभी बोरिंग तो कभी नहर में नहाकर आती...घर आकर मशीन में कुटी (चारा) कटवाती...वैसे आमतौर पर ये काम शाम को होता था...जब मशीन में चारा ज़्यादा लग जाता तो एक तरफ नानाजी और एक तरफ मैं पकड़कर मशीन चलाते...बाद में नानाजी नहीं कर पाते थे...जिन दिनों नानी अस्पताल में भर्ती थीं गाँव के लोग कहते थे कि इतने समय में तो जाने कितना गन्ना छील देतीं...मैं अपनी नानी की कार्यक्षमता देखकर हैरान रह जाया करती थी...

2

इस घर को पहली बार बिना नानी के देख रही हूँ...पहली बार यहाँ ताला लगा देखा है...दिल धक् से बैठ गया...कुछ वैसा मानो आप कई दिनों बाद अपने घर लौटें और घर का सब कुछ चोरी हो गया हो...मन अभी भी नहीं मान रहा कि नानी अब हमारे बीच नहीं हैं...घर के कोने कोने में तलाश रही हूँ और हर एक शय से वो झांकती दिख रही हैं...कभी लगता है पीछे के आँगन में चरी काटती होंगी...कभी लगता है अभी छन्नी (गौशाला) से भूसे का टोकरा उठाये निकलेंगी...लगता है कभी रसोई में शाम की चाय बना रही होंगी और अगर कहीं भी नहीं दिख रहीं तो खेत से अभी लौटती होंगी...उनकी गाय मायूस सी खामोश लेती है...उसे सब पता है...उसे पालनेवाली उसे इतने दिनों से नहीं दिखी...जिस गाय के दूर दूर तक कोई नहीं फटकता था अब वो किसी को नहीं मारती...कोई भी चारा डाल ले रहा है पानी पिला ले रहा है, दूसरे खूंटे में बाँध दे रहा है...इन जीवों के पास हमारी भाषा नहीं पर संवेदनशीलता, भावनाओं, प्रेम और रिश्तों को निभाने में इनका कोई सानी नहीं...

कहां कहां तलाशूँ तुम्हे नानी...ख़ुद तुम नहीं जानती थी अचानक ऐसा कुछ होने वाला है...बरसात के मौसम की पूरी तैयारियां कर रखी थी तुमने...लकड़ियाँ काट के सुखा रखी हैं...उपले बना रखे हैं...देखो तो उनसे भी तुम्हारी उँगलियों के निशान कैसे झांकते हैं...कितना सारा प्याज़ हुआ तुम्हारी क्यारियों में इस बार, लहसुन भी और सब बता रहे थे कि थैले भर भर के तुमने बैंगन भी बांटे  थे...

आज सुबह सुबह उठी तो पहली बार तुम मुझे नहीं दिखी...गुरबानी भी आज नहीं भा रही थी...पहले तो जैसे ही सुबह उठकर करवट बदलती थी जाली वाली खिड़की के पार या तो तुम मुझे चाय पीती दिख जातीं या अपनी गाय से जुड़ा कोई काम करते...आज दिख ही नहीं रही थी...मैं रो पड़ी...तुम्हे ऐसे नहीं जाना था….

3

बीती बातें कैसे याद आती हैं...कुछ दिन पहले तक तुम मेरे साथ थी...पिछली बार जब यहाँ से लौटी थी तो लिपट के किस कदर रोये थे...नाना का जाना एक बड़ा सदमा था...मैं समझाने की एक नाकाम कोशिश भर ही कर सकती थी...तुमसे वादा किया था कि जल्दी आउंगी...अपना ध्यान रखना...मैं तो जल्दी आ गयी पर तुमने वादा कैसे तोड़ दिया...नहीं पता था कि अगली बार तुम्हें यूँ बिस्तर पर पड़े, ज़िन्दगी मौत के बीच जूझते देखूंगी...किस क़दर कमज़ोर हो चुकी थी तुम...पीली पड़ती जा रही थी...बल्कि उस दिन भी ये तो पता था कि तुम बीमार हो पर मैं पूरी तरह आश्वस्त थी कि तुम ठीक हो जाओगी और घर साथ लौटोगी....उस एक हफ़्ते तुम्हारे सिरहाने बैठे, तुम्हारा हाथ थामे, तुम्हारा सिर सहलाते यादों वो 32 साल मेरी आँखों के आगे से गुज़र रहे थे...तुम्हारा यदा कदा बातें करना या फिर गुस्साना भी मन को मज़बूती दे रहा था कि तुम ठीक हो रही हो...उस दिन जब तुम बैठ पायी थी तो जी कैसा ख़ुश हो गया था...लगा था कि बस दो चार दिन और फिर तुम घर पर होगी हमारे साथ.....तुम्हारी वो बच्चों जैसी बातें हिम्मत बाँध रही थीं...पर जाने अचानक ये क्या होता गया...तुम्हारा कराहना, तुम्हारा दर्द से तड़प जाना भीतर तक तोड़ दे रहा था...ज़रा आराम मिलता तो फिर तुम इशारों में जवाब देती...तुम्हारा बोलना इशारों तक सीमित हो गया था...मैं तिल तिल टूट रही थी पर जैसे लग रहा था तुम्हें जाने नहीं दूंगी...किस कदर डर गयी थी मैं कि लगता था एक पल के लिए भी पलकें न झपकाऊं...दर्द, थकान कुछ नहीं था बस ये लग रहा था किसी तरह तुम दुबारा उठ खड़ी हो....मैं इतनी कमज़ोर कभी नहीं हुई और सच कहूँ तो इससे पहले कभी ख़ुद मुझे भी ये अहसास नहीं हुआ था कि मैं तुम्हें इतना ज्यादा प्यार करती हूँ....मैं तुम्हारा हाथ कसके थामे हुए थी...तुम्हे एकटक देख रही थी न...फिर तुम कब और कैसे चली गयी कि मुझे खबर तक नहीं हुई....कैसे टटोल रही थी मैं तुम्हारी उंगलियाँ कि शायद कुछ हरकत हो जाए...शायद दर्द से ही सही तुम एक बार कुछ कहो और ये सारे के सारे लोग झूठे साबित हो जाएँ....तुमसे लिपटी तुम्हारा हाथ थामे मैं तुम्हे पुकार रही थी पर तुम कोई जवाब ही नहीं दे रही थी...ये सब लोग जब तक तुम्हे ले नहीं गए मुझे लगा तुम कुछ तो बोल पड़ोगी....इंसान प्यार में कैसा हो जाता है नानी...मैं तुम्हारे होने की उम्मीद अब भी पाले हुए थी जबकि तुम तो कहीं दूर जा चुकी थी...


तुम्हारी उन खुरदुरी हथेलियों का का स्पर्श अभी तक ज्यूं का त्यूं है...गांव के हर व्यक्ति के पास कितने किस्से हैं सुनाने को...और मैं सब कुछ सुनती हुई अपनी कल्पनाओं में उन किस्सों को जीवंत देखती जा रही हूँ....जब इन लोगों को यकीन नहीं हो रहा तो मुझे भला कैसे होता...हर एक सामान को छू छूकर उसमें तुम्हारा स्पर्श ढूंढ रही हूँ...आज तुम नहीं पर तुम्हारी खटिया, गद्दी में तुम्हारी खुश्बू लपेटे लेटी हूँ....रात आसमान के तारों को ताकती तुम्हारी लोरी याद कर रही हूँ...डेगची को छूकर तुम्हारे हाथ की दाल का स्वाद मुंह में घोल रही हूँ...कैसी ज़िद रहती थी मेरी कि जब तक मैं यहाँ हूँ दाल तुम ही बनाओ....विस्मित होकर तुम्हें छांछ छोलते देखती थी तो ख़ुद भी करने की ज़िद करती थी और आख़िरकार वो हांडी फोड़ ही देती थी... तुम्हारे बक्से से सामान निकाल रही हूँ और उससे जुड़ी एक एक याद में खोती जा रही हूँ...तुम्हारी धोतियाँ...ये नीली वाली कितने चाव से भिजवाई थी मैंने कि तुम पर कितनी अच्छी लगेगी...बचपन में कितने ध्यान से देखती थी कि ये गत्ती धोती तुम बांधती कैसे हो...छोटी सी काया वाली मेरी नानी..घर के चप्पे चप्पे, एक एक चीज़, दर ओ दीवार...छत और आँगन...पेड़ पौधे...चूल्हा चिमटा, डोलची फुकनी, उपले लकड़ी, अनाज फल, मिट्टी के ज़र्रे से लेकर पेड़ों की छांव और हवा के बहाव में तुम खुश्बू बनी बह रही हो...तुम्हारी गाय...कितना लड़ती थी तुम सबसे इसके लिए...कितने लाड़ से पाला इसे और इसके पुरखों को तुमने...सब छूट गया न..आकर देखो ज़रा किस कदर उदास हो चली है ये...खाना पीना सब कुछ छूटा...वो किसी तरह जी रही है क्यूंकि समझ गयी है कि उसकी वो मां नहीं है अब...मां बाप छूटे और अब तो उसका वो घर आंगन भी छूटा...

सिर्फ़ एक बात जिसका अफ़सोस हमेशा रहेगा कि तुमने आराम का एक दिन भी नहीं देखा...13 साल की उम्र में इस घर में ब्याह के आई तुम बच्ची ही तो थी...सारा जीवन घर के कामों में...नाना की...गाय की, सेवा में...खेती बाड़ी में लगा दिया...कितना थक गयी होगी तुम....कैसे कहते हैं ये लोग कि अँधेरे ही खेतों में पहुँच जाती और दिन ढले ही लौटती...कुछ तो नहीं देखा तुमने...कहीं भी नहीं गयी और...एक दिन मजबूरी में बैंक गयी तो लोगों की भीड़ देख कितना असहज हो गयी थी...मामाजी बता रहे थे कैसे डांटा था तुमने उनको...तुम्हें थोड़ा तो आराम मिलता...ऐसी ही छोटी सी ख्वाहिश भी थी तुम्हारी कि कुछ दिन तुम हम सब के साथ बिता सको...पर हम लोग कुछ कर ही न सके...समझ ही नहीं पाती कि मां को अब क्या समझाऊं और कैसे समझाऊं   

मैं लौटते लौटते तक उन क्यारियों, घर के कोनों में तुम्हे तलाश रही थी...तुम होती तो ख़ुश होती कि ये लमडेर बच्चे आज कितनी सुबह उठकर तैयार हो चुके हैं....तुम हमें तब तक देखती रहती थी जब तक हम लोग आँखों से ओझल नहीं हो जाते थे पर आज तुम यूँ ओझल हुई कि ढूंढें नहीं मिल रही....नहीं पता था जिसका हाथ इतने दिन कसके थामे हुई थी वो साथ छोड़कर यूँ जायेगी...दीवार पर तुम्हारी तस्वीर लगता है अभी बोल पड़ेगी...उसपर उंगलियाँ फेरती हूँ तो मन भर आता है...रोक ही नहीं पाती...मेरे पास कितना कुछ है याद करने को...वो पल याद करते हुए मैं आज भी तुम्हारे साथ ही जी रही हूँ...तुम्हे छेड़ रही हूँ, तुम्हारे साथ हंस रही हूँ, तुमसे लिपट कर सो रही हूँ...काश तुम्हें जाने से रोक पाती...काश कुछ और वक़्त साथ बिता पाती...पर यहीं आकर हम लाचार होते हैं...और यहीं आकर हम समझ पाते हैं कि अपनी लापरवाहियों के चलते क्या कुछ खो दिया हमने...अब तुम मेरे भीतर हो नानी और हमेशा हमेशा रहोगी...बस एक बार कसके तुम्हारे गले लगने का दिल कर रहा है....   



(शीर्षक फ़राज़ साहब से माफ़ी के साथ)

सोमवार, 11 मई 2015

यादों की दीवार पर टंगी मुस्कुराती वो तस्वीर...


मेरे नानाजी को रोटी और जैम बहुत पसंद था....मुझे याद नहीं पिछले कितने सालों से उनका रात का भोजन ये ही था...सब्जियां उन्हें नापसंद थीं...सब्ज़ी रोटी लेकर जाने पर फ़ौरन कह देते मुझे भूख नहीं है...मनाया जाता, डांटा जाता कि कुछ तो खा लीजिये...नहीं मानते...बड़ी मान मुनौव्वल के बाद जैम रोटी पर राज़ी होते थे...उनकी रोज़ की न न पर मेरी नानी झुंझला जाया करती थीं...और दोनों में बराबर के झगड़े होते...

पिछले साल इन्ही दिनों मैं अपने ननिहाल में थी...अपना बचपन दुबारा जी कर आई थी...ख़ुद से ये कहा था कि अब यहाँ जल्दी जल्दी आया करूंगी...यूँ सालों में नहीं...पर हम आजकल के लोग....रिश्तों को निभाने में बहुत पिछड़े होते हैं...अपने शहर में पैर पड़ते ही हमारी प्राथमिकताएं फिर बदल जाती हैं, दफ़्तर, मीटिंग, असाइनमेंट, घर, यहाँ वहां और दुनिया जहान के काम...एक एक पायदान करके ख़ुद से किया वो वादा फिर नीचे खिसकता जाता है...हम कुछ दिनों बाद जायेंगे का कह कह कर अपने आपको जवाब देकर बचना चाहते हैं और एक दिन पता चलता है कि इन बहानों ने वो दूरी खींची जो कभी पाटी नहीं जा सकेगी और वो अफ़सोस जो दिल से कभी नहीं निकलेगा.. 
  
मैं आज किसी बेहद क़रीबी और बेहद अपने को खोकर आई हूँ....भारी मन, तकलीफ़, दुःख और अफ़सोस के साथ...मेरी आंखों के आगे जैसे ज़िन्दगी की तस्वीर का एक फ्रेम टूटकर गिरा हो...हर टुकड़े से एक याद एक क़िस्सा झांक रहा है और मैं उन बिखरे टुकड़ों को कहीं कहीं समेटती चल रही हूँ....मेरे नानाजी हम सब से बहुत दूर जा चुके हैं  

बचपन से अपने नानाजी को देखती थी..वो एक बुज़ुर्ग थे और धीरे धीरे कुछ कुछ काम करते रहते...पर बहुत सक्रिय नहीं होते थे...गाँव के बाक़ी लोग बताते हैं कि वो एक ज़बरदस्त किसान थे...बहुत कर्मठ...मिट्टी फेंकें तो कहो ज़मीन सोना उगले...उनके चचेरे भाई बताते थे कि भाई जी के बैल थक जाते थे पर वो न बैठते थे....गली से जब निकलते तो जो बच्चा बाहर दिखता उसे स्कूल छोड़ आते...जिसको पैसे की तंगी होती उसकी फ़ीस जमा कर आते...सारे लोग डरते...वो सबके बाडाजी (ताऊजी) थे. न ख़ुद ख़ाली बैठते न किसी को बैठने देते...पर उसके बाद उन्हें न्यूरो की कुछ दिक्क़त हुई...कहते हैं दिमाग़ की कोई नस सूख गयी...ऑपरेशन हुआ पर उसके बाद वो पहले जैसे सक्रिय न रह सके...झड़ से गए....ये उन दिनों की बात है जब मैं बिलकुल अबोध थी...इसलिए मैंने नानाजी को खेती करते नहीं देखा...नानी के कामों में मदद कर दिया करते...गाय को पानी पिला देना...नानी के साथ मशीन में कुटी (चारा) कटवाना, गाय को अलग अलग खूंटों पर बाँध देना...बाज़ार से सब्ज़ी-फल ला देना वगैरह...मेरी नानी के घर पर हैंडपंप नहीं था...पड़ोस से पानी लाना होता था...एक अजीब सी समझ थी ये कि एक अगर पानी ला रहा होता था और जैसे ही वो घर के पास पहुँचता दिखता तो दूसरा फ़ौरन उसका बोझ हल्का करने पहुँचता और वहां से आगे एक बाल्टी ख़ुद लेकर आता...और हाँ बिना नागा नानी नाना का एक दुसरे से नोक झोंक करना. वक़्त के साथ साथ एक एक करके इन सब कामों की संख्या कम होती चली गयी और अब पिछले कुछ समय से उन्हें आँगन पार करने के लिए भी सहारे की ज़रुरत पड़ती...उनकी उम्र उनसे उनकी ताक़त छीनती जा रही थी...और अब तो वो बात भी बहुत धीमी आवाज़ में करते थे

नानाजी हमेशा मुस्कुराते रहते...मैं उनसे बहुत लडती थी उन्हें डांटती थी...तो वो कई बार मां से कहते इसको मत लाया करो बहुत डांटती है....उन्हें गुदगुदी लगती तो हम खूब परेशान करते...गाल नोचते, खूब छेड़ते...और वो हमें प्यार से डांटा करते...अभी पिछली बार ही मैंने उनसे कहा था “ननाजी सच सच बतयां तुम सबसे ज्यादा प्यार कैथे करदो”....तो नानाजी ने अपने चिरपरिचित अंदाज़ में जवाब ईमानदारी से दिया और कहा “बेटी सबसे ज्यादा प्यार त मि कैलाश थे ही करूद”...कैलाश मेरे भाई का नाम है जो कि भयानक तरीके से नानाजी का सिरचढ़ा रहा है...उसकी हर ग़लती माफ़...मैंने उनका जवाब सुनते ही कहा “अच्छा इन बात च हैं?” तो फिर हंसने लगे...उनके जवाब में मानो उनकी बेचारगी रही हो...

उस कमरे में घुसते ही दाहिनी तरफ़ उनकी चारपाई लगी होती...बाक़ी लोगों के बिस्तर समेट लिए जाते थे पर नानाजी का हमेशा लगा रहता...कमरे में घुसते ही हमें उनको देखने की आदत थी...पहुंचने की देर होती थी और में उन्हें छेड़ना शुरू कर देती...पर हाँ वो आइसक्रीम बर्फ़ वाला आता तो उसके लिए या फिर वो लालझीभ टॉफ़ी या ऊँगली में फंसाने वाले पापड़ के लिए भी पैसे नानाजी से ही लिए जाते...हाँ नानी का इमोशनल ब्लैकमेल भी खूब होता था. नानाजी समय के साथ साथ भावनात्मक रूप से भी कमज़ोर हो गए थे...हम लोगों को या किसी भी मेहमान को देखते ही मारे ख़ुशी के रोने लगते थे...     
   
बाहर आँगन में वो अपने मोढ़े पर बैठे होते...गन्ने के बड़े शौक़ीन...दांत एकदम दुरुस्त....नियम के भी पक्के...सुबह नहा धोकर और हर शाम हाथ मुंह धोकर प्रार्थना का नियम पक्का था...चाय कभी बिना बिस्कुट के नहीं पी...कुछ साल पहले तक बीड़ी पीते थे...और इसी बात पर मैं उनके लिए हमेशा विलेन बनी रहती...किसी को भी डपट देते पर वो गांव के सबसे बुज़ुर्ग लोगों में से थे और अपने वक़्त में सबकी इतनी मदद की थी कि आज पूरे गांव की अगली पीढ़ी उनके बच्चों की ज़िम्मेदारियाँ निभा रही थी...कोई कभी कुछ ख़ास बना लाता, कोई बाज़ार से फल सब्ज़ी या घर का बाक़ी सामान ले आता, गांव के डॉक्टर बेवजह डांट खाने के बाद भी मुस्कुराते रहते...नानाजी की तबियत बिगड़ने पर ईद के दिन अपने मेहमानों को बैठा छोड़ नानाजी को देखने पहुँच जाते.. 
   
रेडियो के कैसे तो शौक़ीन थे...उन्हें कुछ और नहीं चाहिए होता था...बस रेडियो की फ़रमाइश होती जिसमें उन्हें ख़बरें सुननी होतीं...यूँ तो उनकी याद्दाश्त धुंधला रही थी पर बुलेटिन उन्हें सारे याद रहते...नानाजी एकदम बच्चे सरीखे थे...जब उन्हें पता होता कि उनकी किसी बात या काम पर उन्हें डांट पड़ सकती है तो फ़ौरन मुकर जाते... “न बबा मिल नि कार” (न बच्चा मैंने नहीं किया)...’बबा’ बच्चे के लिए दुलार का शब्द हैं... “ननाजी झूठ बुना छो?”... “न बबा अछें भगवान जाणी” (न बच्चा सच में भगवान जनता है)...साथ में यूँ मुस्कुराते रहते कि कोई छोटा बच्चा भी समझ जाए कि वो काम नानाजी ने किया है...और उसके बाद हंस पड़ते..

मैंने नानाजी को उनके कर्मठ अवतार में कभी नहीं देखा बस गाँव वालों से किस्से सुने हैं...उन्होंने मुझे बड़ा होते और मैंने उन्हें वक़्त के साथ साथ और कमज़ोर होते देखा...उन्हें यूँ देखना तकलीफदेह होता था...पर हम सब अपने मन को समझाते कि ये बुढ़ापे का शरीर है...अब वो पहले जैसे कोई काम नहीं कर पाते थे...मेरी नानी ने इस लम्बे वक़्त में उनकी सेवा की...माँ पापा यहाँ आते जाते रहते थे...पापा ने सेवा में कभी कोई कोर कसर नहीं छोड़ी....पर नानाजी ख़ुद जानते थे कि जो काम उनकी जीवनसाथी कर रही है वो और वैसा कोई न कर पाए शायद...ये ही वजह थी कि पिछले दिनों जब नानी की तबियत बिगड़ी तो एक दिन नानाजी रात में दो बजे उठकर बैठ गए...मां ने पूछा क्या हो गया कोई परेशानी है...तो बोले इसे कुछ हो गया तो मैं क्या करूँगा और फिर मुझे कौन देखेगा...नानी नाना की ज़िन्दगी एक दूसरे के इर्द गिर्द थी...डांट फटकार नोंक झोंक झगड़े सब कुछ...इस बार देख के आई हूँ कि कैसा था वो रिश्ता कि एक के जाने पर दूसरे के लिए जीवन बेमानी हो चला है...

नानी कहती हैं अब मैं किससे बात करूंगी झगडा करूंगी हर वक़्त इस कमरे में एक साथ था...एक ठौर था...कुछ भी नहीं रहा सब ख़ाली हो गया...हम इसे सेवाभाव से अलग करके देखें तो शायद समझ सकें...नानी 13 साल की उम्र में ब्याह कर आई थी...नाना उस वक़्त 16 साल के थे...दोनों का ये साथ 71 साल का था...उनकी प्रतिक्रिया समझी जा सकती थी...जिस तरह नानाजी के मृत शरीर की वो उंगलियाँ सीधी कर रही थीं कि देखो कैसे ऐंठ रही हैं...दर्द होता होगा...या जैसे उनके चेहरे को सहलाती थीं तो कलेजा मुंह को आता था...ऐसी स्थिति में कुछ भी समझाना बुझाना बेमानी होता है...4 बजे गुरुद्वारे में गुरबानी बजते ही बोलीं चाय बनानी है हम दोनों का चाय का समय हो गया है....हम सब आज कुछ अलग क़िस्म के रिश्तों की दुनिया में जीते हैं...पर इन रिश्तों को समझने की कोशिश करें तो इनकी इज्ज़त करने लगेंगे...नानी ने बड़ी तकलीफें देखी जीवन में, झगड्तीं तो कहतीं कि परेशान कर दिया है...पर आज उनके चले जाने पर वो अपने जीवन की कल्पना ही नहीं कर पा रहीं...रात भर मैं उनके साथ बैठी रही...वो खाना पानी सब छोड़े बैठी थीं...किसी तरह खिलाया पिलाया...रात भर मुझे अपनी यादों की गलियों में साथ घुमाती रहीं...और मैं किस भावना से भरती जा रही थी उसके लिए मेरे पास शब्द नहीं हैं...

मुझे नाना नानी से मिलने जाना था...पर टालती जा रही थी क्यूंकि प्राथमिकताओं में ऊपर दफ़्तर और बाक़ी के काम काज आ गए थे...लगता था बस अगले हफ्ते पक्का चली जाउंगी...मैं ख़ुद अपनी नज़रों में शर्मिंदा होती और ख़ुद ही अपने को व्यस्त होने की दलील देती...शनिवार सुबह पौने पांच बजे जब नानी ने रोते हुए कहा कि नाना कुछ बोल नहीं रहे चले गए तो लगा ये कैसे मुमकिन है...अभी तो मुझे मिलने जाना था...वो एकदम ठीक थे कुछ नहीं हुआ था पर 5 मिनट के अन्दर ये सब...ऐसा कैसे हो सकता है...पूरा परिवार सब कुछ छोड़ छाड़ के चल पड़ा वहाँ...वहां मेरे नाना सचमुच अब मुझसे बात नहीं कर रहे थे...कुछ नहीं बोल रहे थे...न हंस रहे थे न रो रहे थे....वो अब जा चुके थे...

10 घंटे के उस रास्ते में मैं जाने क्या क्या याद करती रही...कितना कुछ है...इस फ्रेम के बिखरे टुकड़े समेटना मुमकिन नहीं...उनकी यादें पहाड़ों सी विशाल और समंदर सी गहरी हैं...कहां समेट सकूंगी...हम वक़्त बीतने के बाद ख़ाली घरों की दीवारों, बड़े आँगन, वहां के पेड़ों और बाकी निशानों से यादें बटोरते फिरते हैं लेकिन जब सही वक़्त होता है तब हम व्यस्त होते हैं....ये नहीं सोचते किसी को हमारा इंतज़ार है...आंखों की रौशनी के साथ न देने पर भी कुछ लोग हैं जिनकी आँखें हमारी राह देखती हैं...हमसे बात करना चाहती हैं, कुछ वक़्त बिताना चाहती हैं, आज भी हमारे नखरे उठाना चाहती हैं...      

हम सबके यूँ हर काम को अचानक छोड़ कर चले आने से हमारी निजी जिंदगियों में कुछ नहीं बिगड़ा...कहीं कोई काम नहीं रुका...तो क्यूँ मैं पहले नहीं आ गयी...क्यूँ नहीं समझा कि ये पल दुबारा नहीं मिलेंगे...ये साथ कब तक के हों पता नहीं...एक न एक दिन सब बिछड़ जायेंगे तो क्यूँ न आज इन रिश्तों का हाथ मजबूती से थाम कर चलें...क्यूं न उनके जीवन का ख़ालीपन मुस्कुराहटों से भरते रहा करें जिनकी गोद में जाने क्या क्या शैतानियाँ कीं, कितनी तकलीफें दीं, कैसी कैसी मांगें कर दीं...और जिन्होंने हमेशा मुस्कुराकर मजबूती से थामे रखा...बहुत छोटी छोटी बातें हैं पर यकीन मानिए बहुत ज़रूरी हैं...प्राथमिकताओं की लिस्ट में संशोधन बहुत ज़रूरी है...आंखें मूंद के एक पल उन ख़ास लोगों को याद करिए...ये ही हैं जो ज़िन्दगी को ज़िन्दगी बनाते हैं...कब बिछड़ जायें नहीं पता...लिस्ट में सबसे ऊपर इन रिश्तों को लिख डालिए...और कुछ यूं लिखिए कि इसमें कोई बदलाव न हो


अपनी नानी से लिपटकर उनकी खुश्बू और नानाजी का मुस्कुराता चेहरा साथ लायी हूँ....मन में अफ़सोस है और अपराधबोध भी...कुछ वक़्त की ही तो उम्मीद थी और मैं वो भी न दे सकी...इस बार हल्दी चावल की फिटाई लगाने, सिर पर हाथ फेरने और दस रुपये का नोट पकड़ाने वाला कोई नहीं था....भीतर तक तोड़ गया आपका यूँ चले जाना...मुझे माफ़ कर दीजियेगा!!