गुरुवार, 1 फ़रवरी 2018

माँ आदरणीय पर कौन सी माँ ?

उस रोज़ सुबह 7 बजे आँख अन्नू के फ़ोन से खुली.... “बेन ये बताओ घी कैसे बनता है?” मेरा उनींदा दिमाग़ इस सवाल के लिए तैयार नहीं था...मैंने अलसाते हुए पूछा “मिक्सर है?”...उधर से पूरे आत्मविश्वास से आवाज़ आई “नहीं”..“मथनी है?”....नहीं...चम्मच है उससे काम चलेगा?”...मेरे जवाब का इंतज़ार किये बिना उसने सहायिका को आवाज़ देकर कहा “दीदी चम्मच से ही कर दीजिये, हो जाएगा”....इसके बाद भी मुझे कुछ बोलने का मौका दिए बिना उसने अपनी बात जारी रखते हुए उदास लहजे में जो अगली बात कही वो और भी अधिक अप्रत्याशित थी..नींद से भरे अलसाए दिल, दिमाग़ और शरीर के लिए ज़्यादा ही भारी...“बेन मेरा सपना पूरा नहीं होगा क्या? मेरे ढेर सारे बच्चे कैसे होंगे? साला...शादी नहीं होगी तो क्या हम मां नहीं बनेंगे...हम कह रहे हैं सादिया से चलो 3-4 सहेलियां मिलकर सिंगल मदर बनते हैं...बच्चे पैदा करेंगे...तुम सब ख़बरों में आ जाओगी...कोई कुछ कहेगा या विरोध होगा तो वो भी ख़बर और एक बड़ा सवाल....और हमें तो साला किसकी इतनी हिम्मत कि कोई कुछ कहे...बताओ क्या कहती हो सही आईडिया है न?”...मेरी नींद उड़ाने का भला इससे ज़ालिम तरीका क्या हो सकता था....चाय की तलब हो गयी पर अभी बातें पूरी नहीं हुई थीं...पुराने संबंधों पर बातें और उन लड़कों को गरियाने से दिन की शुरुआत हो गयी....

इस लड़की ने मुझे हमेशा विस्मित किया है...अपनी बातों, मलंग और मस्त रवैये और तमाम अन्य बातों से...हर बार कोई न कोई ऐसी बात जो चौंका देती....दुनिया को ठेंगे पर रख देना...और उसका ये तरीका मुझे अजीब ख़ुशी से भर देता....मैं जब से इसे जानती हूँ तब से ये बात जानती हूँ कि उसे ढेर सारे बच्चे पैदा करने थे....साल दर साल वक़्त बीतता गया, उसके साथ हम लोग बढ़ते गए लेकिन इतने वक़्त में एक ये बात कभी न बदली....ऐसा भी लगता कि उसे शादी भी शायद बस इसीलिए करनी है कि वो बच्चे पैदा कर सके...इस लेख का कुछ हिस्सा जब उसे पढ़ाया तो उसने फ़ौरन कहा कि “सुनो हम मज़ाक नहीं कर रहे हैं, सीरियस हैं....एक साल में अगर शादी नहीं हुई तो हम कुछ न कुछ जुगाड़ करके बच्चा तो पैदा कर ही लेंगे”....उसी रोज़ शाम अंकिता ने बातचीत के दौरान कहा “बहन हमें पति की ज़रुरत नहीं लगती पर बच्चे की लगती है अब जिसकी ज़रुरत होगी वो ही करना चाहिए न”...मैंने हंसते हुए कहा “हाँ बिल्कुल सही बात”... और ये कहते हुए मेरे ज़ेहन में सुबह की बातचीत ताज़ा होने लगी...मैंने उसका ज़िक्र भी किया तो ये आगे बताने लगी “पता मेरी एक सहेली ने कहा कि तुम अपनी जन्मपत्री पंडित को दिखाना...जब वो विवाह का योग बताये तब ही अपने लिए लड़का ढूंढना ज़रूर मिलेगा....हमने उससे कहा सुनो हमें पंडित ने पति योग तो नहीं संतान योग बताया है बताओ क्या करें....उसने कहा बेशर्म हो गयी हो बिल्कुल”....हम दोनों ही हंस पड़े... अन्नू की बात कानों में गूँज रही थी ... “शादी नहीं होगी तो क्या हम मां नहीं बनेंगे”...मैं इन ‘बिगड़ी’ लड़कियों को सुन कर ख़ुश हो रही थी....ढांचे पर पत्थर मार एक और दरार डालने वाली बात...शाबाश!!

वाकई अगर सोचें तो भला क्यों ये ज़रूरी हो...एक बच्चे की ख्वाहिश और ज़रूरत महसूस होना, लेकिन एक पुरुष साथी की ज़रूरत न महसूस होना, शादी के बंधन में बंधने की इच्छा न होना इतना अस्वाभाविक क्यों है....अन्तरंग संबंधों का शादी से पहले और बाद में होने से उसका जायज़ नाजायज़ या सही ग़लत होना....एकल अभिभावक बनना....मेरी ज़िन्दगी, मेरे शरीर, मेरे मन की ज़रूरतें भला बाकी बातों के दबाव में क्यों हों...ऐसे सवाल चोट तो करेंगे पर इन्हें सोचना तो ज़रूरी है ही...भला इन सबका ऐसा दबाव क्यों...हम अपनी चाहतें और ज़रूरतें देखते हुए रिश्ते क्यों चुन या बना नहीं सकते.  

मैं अगर अपनी ही बात करूँ तो मेरी जो सहजता महिला मित्रों के साथ है वो पुरुष मित्रों के साथ नहीं. बल्कि पुरुष मित्र गिनती के ही होंगे. अपनी ज़िन्दगी में मेरी प्राथमिकताएं फ़र्क हैं जैसे काम, परिवार, दोस्त, पढ़ना लिखना वगैरह...इन सबमें शादी के लिए वक़्त कहीं फ़िट नहीं होता. बल्कि मेरी तो शादी के लिए भी प्राथमिकताएं फ़र्क ही हैं. अपनी ज़िन्दगी से संतुष्ट हूँ और शादी की ज़रुरत महसूस ही नहीं होती. कुछ लोगों ने दबे स्वर और सभ्य भाषा में कहा कि जीवन की और भी ज़रूरतें होती हैं, साथ चाहिए होता है...उनके लिए मेरा जवाब ज़रा असभ्य हो जाता कि उन ज़रूरतों के लिए भला शादी करने की क्या ज़रुरत...मुझे कभी ऐसे भाव मिलते मानो मैं कैसी बेशर्म हूँ..इसी से चरित्र का अंदाज़ा भी लगा लिया जाता है...कभी हैरानी के भाव होते हैं तो कभी सहमति के भी. रही साथ की बात तो भई ‘फ़ैशन के इस दौर में गारंटी की इच्छा न करें’ की तर्ज पर मैं ‘साथ’ की गारंटी पर सवाल कर देती हूँ. तो बात हमेशा एक हल्के विवाद के बाद आई गयी हो जाती है. पर इन सबके बावजूद बच्चों से मुझे बेहद प्यार है. मैं माँ तो बनना चाहूंगी पर गोद लेकर, गर्भधारण करके नहीं. मुझे उस असहजता और दर्द से नहीं गुज़रना न ही मुझे ‘मेरा’ या ‘दूसरे’ का बच्चा जैसी ही कोई समस्या है. अभी इस ज़िम्मेदारी के लिए तैयार नहीं हूँ पर अगर कल को हो ही जाऊं तो भला क्यों शादी या पति की ज़रुरत हो. क्यों ये सोचना मुश्किल हो.

अब दूसरी स्थिति लें. मैं गर्भधारण करना चाहूँ तो? अन्नू की तरह. पर मुझे शादी की ज़रुरत न हो तो? मुझे एक बच्चे की ज़रुरत हो, मैं उसे पैदा करना, एक अभिभावक का प्यार देना चाहूँ लेकिन मुझे पति के रूप में किसी साथी की ज़रुरत न हो, मेरे लिए ये कोई ज़रूरी शर्त न हो कि बच्चे के जीवन में पिता हो ही, मेरी कोई इच्छा न हो कि मेरी बच्चे की ख्वाहिश के साथ जबरन मुझपर ससुराल से जुड़े तमाम सम्बन्ध और ज़िम्मेदारियाँ लाद दी जाएँ....मैं सक्षम व स्पष्ट हूँ, मेरी ज़रूरतें और प्राथमिकताएं फ़र्क हैं, तो क्यों सिर्फ़ शादी के ज़रिये रिश्तों की संवैधानिकता या असंवैधानिकता तय हो. तार्किक तौर पर सोचें, मैं एकल अभिभावक बनना चाहती हूँ, न मेरे साथ कोई धोखा हुआ, न ज़बरदस्ती बल्कि ये मेरा चुनाव है...उस बच्चे को एक अच्छा इंसान बनाने के लिए जो भी ज़रूरतें हैं, उनके लिए मैं सक्षम हूँ....तो शारीरिक सम्बन्ध का विवाह से पहले और बाद में बनाये जाने से ‘सही’ ‘ग़लत’ क्यों तय हो....मैं IVF तकनीक में न जाना चाहूँ, कोई हो जिससे शायद मुझे प्रेम हो, या कहिये सिर्फ़ आकर्षण हो तो क्यों ज़रूरी हो कि मेरी एक बच्चे की ज़रुरत के लिए हम बिना वजह शादी में बंधें...और अगर न बंधें तो क्यों वो ग़लत करार दिया जाए...अगर वो मेरा ही निर्णय है तो?

यहाँ तक तो बातें मेरी इच्छाओं व चुनाव की...अब अगर ये देखना शुरू करें कि मेरे इर्द गिर्द वो कौन सी संस्थाएं हैं जो सीधे तौर पर मुझे प्रभावित करेंगी...मेरे लिए स्थितियों को आसान या मुश्किल करेंगी...तो इस मामले में कानून बहुत उलझाने वाले हैं...अव्वल तो एकल अभिभावकों के लिए अलग से कोई कानून नहीं...इसके सामाजिक पहलू भी हैं...और कानूनी तौर से कई सारी बातें हैं जैसे गोद लेने या IVF तकनीक की जगह यदि बच्चा पैदा किया जाए तो उसमें बड़े पेंच हैं...मान लें अगर कोई महिला किसी पुरुष के साथ सम्बन्ध बनाकर गर्भ धारण करती है...सम्बन्ध बनाने से पहले ही ये बात स्पष्ट कर दी जाती है कि महिला को माँ बनना है, ये उसकी इच्छा, उसका चुनाव है, न शादी होनी है न ही पुरुष को किसी भी तरह की ज़िम्मेदारी निभानी होगी...इन सबके बावजूद यदि कल को जैविक पिता बच्चे पर दावा कर दे तो कानूनन उसके अधिकार हो सकते हैं..ये कोर्ट के निर्णय पर निर्भर करेगा...इसके अलावा उस बच्चे के भी न सिर्फ़ अपनी माँ बल्कि जैविक पिता की संपत्ति पर अधिकार होंगे...शादी होने या न होने से कोई फ़र्क नहीं पड़ेगा...अब ऐसे में भला कौन ही पुरुष साथी तैयार हो क्योंकि बहुत समय तक ये संभव नहीं कि संतान के आग्रह के बावजूद उससे पिता की पहचान छुपायी जाए या जीवन भर हर पल झूठ का सहारा लिया जाए...ख़ास तौर से संतान के वयस्क होने के बाद...ये सही भी नहीं लेकिन ऐसा होने के नतीजे उस पुरुष साथी के लिए मुश्किल पैदा कर सकते हैं....ऐसे में किसी भी पुरुष साथी का सहयोग देने से बचना स्वाभाविक है क्योंकि संतान की इच्छा तो पूरी तरह महिला की थी और सम्बन्ध सिर्फ़ इसी वजह से बनाए जा रहे थे..वो क्यों चाहेगा कि बाद में उसके जीवन में एक दोस्त को दिया गया सहयोग अचानक कोई समस्या बनकर आ जाए...ऐसे में ये ज़रूरी है कि एकल अभिभावकों व उनके बच्चों के लिए कानून में अलग समुचित व्यवस्था की जाए जिसमें सबके अधिकारों को सुनिश्चित किया जाए. 
  
इसके अलावा अब परिवार की ही भूमिका को अगर देखें....परिवार वो संस्था है जो अगर साथ आ जाये तो व्यक्ति की न सिर्फ़ सबसे बड़ी मुश्किल आसान हो जाए बल्कि उसे दुनिया से लड़ने का हौसला भी मिल जाए...लेकिन क्या ऐसा होता है? ऐसे परिवार बमुश्किल ढूंढे मिलें शायद जो इन स्थितियों में घर की बेटी का साथ दें...बल्कि जो होता है वो इसका उल्टा होता है...परिवार सबसे बड़ी रुकावट या विरोधी हो जाता है...ख़ासतौर से अगर बच्चा गोद, IVF या सरोगेसी की जगह किसी पुरुष साथी के साथ सम्बन्ध बनाकर पैदा किया जाए...ये एक बड़े कलंक की तरह देखा जाएगा जिसे कोई परिवार पसंद नहीं करेगा...बेटी का रात दिन जीना दुश्वार किया जा सकता है और बच्चे के लिए जो कड़वा व्यवहार होगा उसकी कोई सीमा नहीं...ऐसे में एक बात और आ जुड़ती है...बेटी के माँ बाप सालों साल कोशिश करते हैं कि उसकी शादी हो ही जाए...वो मान जाए और कर ले...ये कोशिश कहिये बेटी के 50- 55 साल के हो जाने तक भी चलती रहे...तो एक बात तो ये कि परिवार की नज़र में बेटी की शादी ज़रूरी होती है जिसके लिए परिवार के लोग कई कारण गिनाने लगते हैं....दूसरी बात ये कि एक ऐसी महिला की शादी होना उनकी नज़र में मुश्किल है जो एक माँ भी है...और अगर ये माँ बनने की प्रक्रिया बाक़ायदा सम्बन्ध बनाकर की गयी है तब तो शादी असंभव ही हुई...हमारे परिवारों में जहाँ बेटी ‘पराया धन’ है वहां उसके बच्चे कैसे अपनाए जा सकते हैं....किसी भी कारणवश यदि माँ को कुछ हो जाये तो बच्चे को अपनाने वाला कोई भी नहीं, उसका क्या जीवन हो...हमारे पास कोई वैकल्पिक व्यवस्था भी नहीं. 
    
इसी तर्ज पर अब समाज की प्रतिक्रिया भी समझी जा सकती है...कि किस प्रकार का चरित्र हनन किया जायेगा...ये न सिर्फ़ माँ के लिए है बल्कि बच्चे के लिए भी उसका बचपन व युवावस्था तमाम मुश्किलों भरी होगी...वो ऐसे रिश्ते से दुनिया में आया होगा जिसे न सिर्फ़ समाज बल्कि क़ानून भी ‘नाजायज़’ कहता है...हर पल ख़ुद को ‘पाप की संतान’ सुनना एक अबोध मन पर क्या प्रभाव डालेगा ज़रा सोचें...माना कि माँ मज़बूत है दुनिया को ठेंगे पर रखने वाली लेकिन एक बाल मन तो कोमल होता है, भोला, निश्छल...इन सब बातों को समझ पाने से कहीं दूर....और परिवार व समाज कितना वीभत्स हो सकता है इसकी कई बार कल्पना करना भी मुश्किल है...ये दुश्वारियाँ मध्यमवर्गीय परिवारों और छोटे शहरों में अधिक हैं...ऐसे बच्चों की परवरिश बहुत ध्यान व समझ से करने की पूरी ज़िम्मेदारी माँ पर ही होगी क्योंकि उसे एक सकारात्मक या सहयोगी वातावरण मिलना फ़िलहाल तो दूर की बात है बल्कि आलोचनाओं और टीका टिप्पणियों का सामना आये दिन  न सिर्फ़ माँ बल्कि बच्चे को भी करना होगा...क्या हम एकल पिताओं को भी उसी तरह का व्यवहार देते हैं जैसे एकल माँ...पिता के केस में ख़ानदान आगे बढ़ने की बात लेकिन माँ के केस में बोझ...ज़रा सोच कर देखें...और ये भी देखें कि किस तरह पितृसत्ता औरत के दिल, दिमाग़, कपड़े, व्यवहार, सपनों से लेकर योनि तक कहीं उसका नियंत्रण नहीं रहने देती. 
  
ये उलझनें हैं जो कई बार इस समाज की सड़न का अहसास कराने लगती हैं. विवाह के रिश्ते में जबरन बनाए गए शारीरिक संबंधों, औरत की मर्ज़ी पूछे बग़ैर या उसके विरुद्ध जाकर या दबाव बनाकर बच्चों की कतारें लगा देना ग़लत नहीं होता...न परिवार और समाज में बल्कि काफ़ी हद तक क़ानून में भी....उसकी इज़्ज़त एक माँ के तौर पर ही होती है...मां से ऊपर तो इस देश में कुछ भी नहीं, सबसे ज्यादा श्रृद्धा इसी के प्रति, इसके नाम पर बलिदान से लेकर हत्याएं और मार काट हो जाए...तो फिर एक मां के प्रति श्रद्धा सिर्फ़ मां होने के कारण होनी चाहिए न...उसमे शादी शुदा होने या न होने की क्या भूमिका...सारा चरित्र निर्माण क्या सिर्फ़ यौन संबंधों के ही आधार पर होगा? क्या ये उसके चयन, उसकी आज़ादी, उसके निर्णयों को सीमित करने या जबरन कंट्रोल करने की कोशिश नहीं? या ये भी पितृसत्ता के लिए एक डर ही है कि जिस व्यवस्था में अभिभावक के तौर पर हमेशा पिता का नाम रहा हो, वंश उसके नाम से आगे बढ़ा हो अगर ये स्त्री के हिस्से चला गया तो क्या होगा? क्या होगा अगर स्त्री मां बनने के लिए भी ख़ुद अपनी मर्ज़ी से चुनाव करने लगे और विवाह संस्था को ख़ारिज कर आगे बढ़ जाए...प्रेम संबंधों पर कामसूत्र रच देने वाले, राधा कृष्ण के प्रेम को पूजने वाले, सरस्वती को देवी मानने वाले, प्रेम पर बनी फिल्मों को ब्लॉक बस्टर बनाने वाले असल व्यवहार में किस कदर दोगले और खोखले हैं...हमारे पास नफ़रत द्वेष और हिंसा के लिए तो भरपूर जगह है पर प्रेम के लिए नहीं...किसी को अगर ये लगता है कि गोद लेना सरल है तो वे भी ये जान लें कि एकल अभिभावक के लिए गोद लेने से जुड़ी प्रक्रिया व कानून भी आसान नहीं बल्कि खासे मुश्किल हैं  

कब होगा कि हम चयन और सहमति को सही अर्थों में समझेंगे...हम हिंसा पर ख़ामोश होना सिखाते हैं, विवाह के भीतर जबरन बनाए संबंधों को बलात्कार नहीं मानते, एक लड़की का बलात्कार हो जाने पर उसका मुंह ढँकवा देते हैं, ये लडकियां माँ सरस्वती की तरह नहीं पूजी जाती...या इन मां सरस्वती की मां कौन थीं...यहाँ परिवार के लोग खाप बन कर इज़्ज़त के नाम पर हत्याएं करते हैं, घर में ही बलात्कार हो जाते हैं...एक लड़की के पैदा होने से लेकर मरने तक हर क़दम उसके लिए एक नयी मुश्किल खड़ी कर देते हैंऐसे में चुनाव, मर्ज़ी वो भी ऐसी तो बड़ी बात हो गयी न...मैं  ये भी जानना ज़रूर चाहूंगी कि भारत माता विवाहित हैं या एकल अभिभावक हैं...या उनके अलावा भी पूजी जाने वाली तमाम माताओं का वैवाहिक स्टेटस क्या है...क्या सारी सहूलियत काल्पनिक पात्रों के लिए है...असल व्यवस्था में सिवाय बंदिशों के कुछ भी नहीं?   

(शीर्षक के लिए मनोज जी का आभार)

मंगलवार, 22 अगस्त 2017

तुम्हारे लिए बेन...



अजीब ही है पर कुदरत की बनायी या अपने आस पास की शायद ही कोई शै होगी जिससे मैं जुड़ाव महसूस नहीं कर पाती....धूप, मिटटी, सुबहें, सड़कें, दरख़्त, पत्थर, चांदनी, ट्रेन की गूंजती आवाज़, रसोई से उठते धुंए में लिपटी ख़ुशबू या किसी बच्चे की किलकारीबारिशों से यारी और शामों से बैर रहा...इन सबसे कहने सुनने में कभी कोई मुश्किल नहीं हुई...और ऐसे में जब बात लोगों की हो तो क्या ही कहूँ...हर शख्स मुझे कहानी लगता है...कुछ न कुछ ऐसा जो जानना कहना चाहती हूँ...संवाद...कितना ज़रूरी है ये मेरे लिए...

मैं सोचती थी मेरे इर्द गिर्द वो सब लोग जिनसे सबसे गहरे जुड़ी हूँ...जिनका असर है, जिनका होना मेरे होने और ऐसा होने में बहुत मायने रखता है...उनके बारे में लिखूं...पर सोचती ही रह गयी...आज सोचा कुछ शुरू तो कर ही दूँ...ये शायद मुक़म्मल नहीं होगा पर कोशिश तो करूँ...और इसके लिए सात साल पीछे लौट रही हूं..

ईटीवी के साथ बहुत थोडा वक़्त काम करके लौटी थी...अच्छा ख़ासा संघर्ष अपने शहर में नौकरी ढूँढने में हो रहा था...एक पार टाइम काम से मुक्त हुई थी...इत्तेफाक़न दो जगहों से एक ही समय में काम करने का ऑफर आ गया...मैं फिर उलझन में जिससे हमेशा की तरह मुझे मैम ने निकाला था....पहले दिन पहुँचने पर या शायद इंटरव्यू के ही दिन सहयोग के दफ़्तर पहुंचकर उनके बाहर के कमरे में इंतज़ार करती हूँ...नर्वस, डरी भी कह सकते हैं जैसे कोई बच्चा किसी नए स्कूल पहुँचने पर होता है...मुझे वहां के लोग ऐसे लग रहे थे कि क्या लोग हैं ये, ऑफिस का माहौल कुछ वैसा जिसमे कभी काम नहीं किया, मुझे तो ऐसा कुछ नहीं आता, कैसे होंगे लोग यहाँ पर, मैं सीख पाऊँगी या नहीं, काम कर पाऊँगी या नहीं, आत्मविश्वास जाने कहाँ पीछे कहीं था और उन सबके ऊपर था संशय कि ठीक कर तो सकेंगे, ख्वाहिश कि इन सब जैसे हो सकें...खुद से ही कह रहे थे कि खूब मन से काम करेंगे...और आने वाले कुछ समय में वो जगह परिवार सी हो गयी..

दाहिनी तरफ़ के कमरे का दरवाज़ा खुलता है और एक लड़की बाहर आती है...कोई मिलने आया है उससे, उसे लेकर अन्दर चली जाती है...शायद उससे कहती है कि आओ इधर ही बैठ जाओ...न कोई गर्मजोशी, न कोई दिखने की भी औपचारिकता...बस ये ही झलक थी...मिनट के उस हिस्से में जो दिखा वो बला का आत्मविश्वास और सहजता थी, जिससे शायद ही कोई प्रभावित न हो....ये तुम थी...मेरी अन्नू बेन !

मैंने कहा था न कुदरत के साथ यूँ ही राब्ता कायम हो जाता है मेरा...इस वक़्त जब इस बेमिसाल लड़की के साथ बिताये पल याद कर रही हूँ तो बाहर झूम कर बारिश हो रही है...किसी अहसास को इससे खूबसूरत भला कैसे बनाया जा सकता होगा कि आपके दिल के दो अज़ीज़ एक ही वक़्त आपके साथ हों...

मैं क्या तुम से मिलने पर शुरू में कोई भी व्यक्ति चकरा जाए...उस सहजता, अल्हड़पन की उम्मीद नहीं रहती किसी को...उम्मीद इसलिए नहीं रहती कि आम तौर पर लोग ऐसे होते नहीं... ‘दिखने’ या ‘लगने’ की फ़िक्र में ज़रा तो घुलते ही हैं...उन सबसे इतर तुम एक एक पहाड़ी नदी सी...पूरे शोर, हलचल और जोश के साथ बहने वाली कि जो आसपास हो बस खिलखिलाता हुआ साथ हो ले...देखी हैं न वो पहाड़ी वादियाँ कि जहाँ गर वो नदी न हो तो डरावना सन्नाटा पसर जाए...बस ऐसी ही ज़िन्दगी से भरी शख्सियत है तुम्हारी...पर ये सिर्फ़ एक ही पक्ष है...मनमौजी, बेफिक्र बच्चों सी ज़िद्दी भी और वैसी ही मन की कच्ची भी...जिन बातों का सामना करने में अच्छे अच्छों की हिम्मत जवाब दे जाए वो काम तुम बस यूँ ही कर जाओ...और जो बातें बातों जैसी हों भी न, वहां फुक्का फाड़ के रोने लगो...ऐसी लड़की कि जिस महफ़िल में बैठे वहां की अघोषित सभापति बन जाए...नए लोग विस्मित हो देखें, किसी को भी डपट दे, किसी के लिए भी उदास हो जाए...

बेपरवाह होकर अपनी तरह जीना, बिना किसी शर्म और अफ़सोस के, अपनी बातों पर टिकना, उनके लिए लड़ जाना जैसी तमाम बातें जो करते मैं तुम्हें लगभग हर रोज़ देखती हूँ और इसके अलावा शायद ही किसी को ऐसा देख पायी हूँ...भयंकर मूडी कि सुबह सुबह स्टेशन पर कुली को हड़का दो....दुसरे का एकदम संतुलित प्यार और फ़िक्र हो...ज़रा भी ज़रूरत से ज्यादा प्यार दिखाना तुम्हें उलझन दे जाए पर ज़रूरत भर का न होने पर शामत भी है...परफेक्ट चाय जैसा...तुम्हारे मन की भला चाय भी कौन बना पाए...अपने प्यार का इज़हार छोटी छोटी अदृश्य बातों से पर अपनी ईर्ष्या और गुस्से का इज़हार खुल्लम खुल्ला करने वाली, दिल खोलकर मदद करने वाली, बेतरतीब पर बिंदास, बेझिझक और कहीं भी किसी के सामने अपनी बात कहने वाली लड़की

तुम उसी पल मुझसे झगड़कर मुझे डांटती तो दूसरे ही पल मुझे कुछ कह देने पर किसी की क्लास लगा देती...वो भी ऐसी कि ख़ुद मुझे समझाना पड़े कि जाने दे सबकी परवाह मत किया कर, किसी परेशानी में होने पर चाहने के बावजूद मैं तुम्हें कोई बात बताना जितना हो सके टालती हूँ...क्यूंकि मुझे समझाने के बाद तुम  ख़ुद मेरे लिए मुझसे ज्यादा टेंशन में आ जाती...बहुत संभावना होती है कि मैं नार्मल हो चुकी हूँ और तुम मेरी फ़िक्र में घुली जा रही होती हो...और ये बात सिर्फ़ मुझ तक सीमित नहीं तुमसे जुड़े हर शख्स के बारे में है... दो पल पहले बिलकुल बे सिर पैर की बात करने वाली लड़की जब मेरी तकलीफ ध्यान से सुनकर समझाती है तो कितनी ही दफ़ा मैं ख़ुद हैरानी से भर जाती हूँ...मेरे अच्छे बुरे दौर में तुम मेरे पास न होकर भी रही हो...मुझे ये भरोसा रहा है कि सब ठीक होगा क्यूंकि तुम हो...तुमसे लड़ने झगड़ने के बावजूद तुमने हर पल मुझे बेहतर इंसान और में जिंदगी को बेहतर मायने दिए हैं...मुझमें जो कुछ भी अच्छा है, उसके होने की वजह में तुम्हारा होना भी है....मुझे नहीं पता कि जो जगह है तुम्हारी उसे कैसे बताया जा सकता है...पर मेरी ज़िन्दगी की सबसे खूबसूरत बातों में से एक ये है कि तुम साथ हो, फिर चाहे तुम सबके सामने मेरा मजाक ही क्यूँ न बना दो...और उससे भी खूबसूरत ये कि कभी कभी मैं भी तुम्हारे साथ इसी तरह हो पाती हूँ...रातों को घूमना, बात न करना पर ट्रेन की एक ही बर्थ साझा करना, टीटी के टोक देने पर दूसरे के लिए उससे झगड़ा कर लेना... या एक दूसरे को देख पेट पकड़ कर थक जाने की हद तक हँसना...और बाकी सारे हैरान परेशान हमें पागल समझ देखते रहें....मेरे दिल की एल्बम में साथ बिताया हर पल महफ़ूज़ है..  

आज के दिन तुम्हारे लिए चाहूँ तो क्या चाहूँ...शायद बस इतना कि तुम्हें कोई जाने तो पूरी तरह जाने, जैसी तुम हो वैसी ही, उस तरह टुकड़ों में नहीं जैसा करने की गलती कई लोगों ने की...क्यूंकि तुम उसी निश्छल प्यार कि हक़दार हो जो तुम दूसरों को देती हो...तुम्हारा भोलापन और साफ़गोई किसी को भी प्रभावित भले करे पर तुम्हारी तरफ़ स्वार्थी न बनाये....तुम्हारी ज़िन्दगी से हर उदासी दूर हो, दुनिया के सामने वो जिंदादिल खिलखिलाता किरदार एक भी पल किसी अकेली उदासी से न घिरे...क्यूंकि अपने उस हिस्से को ये कहीं गहरे छुपा देता है...मैं जानती हूँ दुनिया कि बाकी सारी बातों और मुश्किलों से तो तुम ख़ुद ही निपट लोगी...आज का दिन तुम्हे बहुत बहुत मुबारक...तुम्हें बहुत बहुत प्यार और शुक्रिया...इस तरह होने के लिए...तुम ख़ुश रहो बस ये ही चाहती हूँ...फ़ोन की आपदा का समय है इसलिए तस्वीर पुरानी है...अब जल्दी से आओ केक पापा मंगवायेंगे, आज पेठा मिला है...हमारे लिए तो कभी मंगवाने को कहा नहीं ऐसे...हुंह!

और सुनो, आज सुबह बेमतलब का डांटा गया है हमें   

    

गुरुवार, 2 मार्च 2017

अजीब दास्ताँ है ये...

मुझे बताया जाता है कि मेरे जन्म पर मेरे पिता बहुत खुश हुए थे... क्यों हुए यह तो आज तक समझ नहीं आया क्योंकि मुझसे बड़ा भाई भी था और बहन भी... खैर जन्म के कुछ बाद का वक्त... अब तो मुझे याद भी नहीं कि उस वक्त क्या उम्र थी... बस ये याद है कि बहुत छोटी थी... वो ही उम्र जिसे शायद होश सँभालनाकहते हैं... तब जबकि बातें धुँधली ही सही पर याद रह जाती हैं... मैं बेहद अंतर्मुखी थी... कुछ शायद प्राकृतिक रूप से और कुछ साथ घटी घटनाओं की वजह से (हालाँकि ये बात आज समझ पाती हूँ)... पर मुझे ये पता था कि बड़े होकर डॉक्टर बनना है... डॉक्टर की स्पेलिंग पता नहीं थी पर बनना है ये पता था... जरा सा और बड़े होने पर भी सहेलियाँ ज्यादा थीं नहीं और मेरा पसंदीदा खेल बस एक हुआ करता था... तौलिये को सिर पर बांधकर जूड़ा बनाकर टीचर बन जाती... दरवाजे पर सवाल जवाब लिखती और एक काल्पनिक कक्षा को पढ़ाया करती... मेरे इस खेल से किसी को ज्यादा दिक्कत नहीं थी बल्कि पापा खुश ही होते क्योंकि मैं इस तरह अपने सबक याद कर लेती... बस ये था कि मकान मालिक के दरवाजे का हाल बुरा हो जाता... टीचर का वो खेल खेलते वक्त भी मुझे ये पता था कि मुझे बड़े होकर डॉक्टर बनना है... मेरी आँखों में ये ही सपना डाला गया था... मुझे ये अहसास कराया गया था कि मैं उस सफेद कोट के लिए ही बनी हूँ... हालाँकि मेरे खेलों में डॉक्टर बनने का खेल कभी भी शामिल न हुआ...

मेरे माँ पापा के इस सपने में कोई बुराई नहीं थी... बल्कि अच्छा ही था... बेहद सीमित संसाधनों वाले परिवार में मेरे अभिभावकों ने मेरे लिए एक बड़ा सपना बुना था... मेरे पापा की लखनऊ आ बसने की एक बड़ी वजह ये थी कि उन्हें पढ़ाई से बहुत प्यार था... अपने दिनों में उन्हें इसके लिए जो संघर्ष करने पड़े वो सुनकर हम लोग आज भी बेचैन हो जाते हैं... वे चाहते थे उनके बच्चों को पढ़ाई के लिए कभी कोई दिक्कत न हो... खाली हाथ आकर एक अजनबी शहर में बस जाना आसान नहीं होता... पर उन्होंने वो सब किया... बाकी सब जगह कटौती करके संसाधनों को पढ़ाई के लिए इस्तेमाल किया गया... माँ एक सभ्रांत परिवार से आने के बावजूद इन स्थितियों में हमेशा उनके साथ खड़ी रहीं... हमारे पास खिलौने, कपड़े, जूते चप्पल भले खूब सारे न हों पर पढ़ाई में कहीं कोई चूक नहीं... ये भी सच है कि अपनी बहन के मुकाबले मुझे सब कुछ ज्यादा  मिला... उसकी रुचि नृत्य में थी और वो काफी कम उम्र से इसमें सक्रिय हो गई... घर में उसे रोका तो नहीं गया पर कुछ खास बढ़ावा भी नहीं मिला... ऐसा नहीं कि संगीत से कोई दिक्कत हो... मेरे खानदान में संगीत को लेकर बड़ा सकारात्मक माहौल रहा है... पापा तो चित्रकारी भी गजब की करते हैं... बिना किसी ट्रेनिंग के ऐसे क्रिएटिव हैं कि क्या कहा जाए... पर वह क्षेत्र क्योंकि माँ पापा के बुने हुए सपनों में नहीं था और उसकी पढ़ाई कुछ हद तक 100/100 वाली तरफ नहीं बढ़ रही थी तो सपनों की पूरी दिशा मेरी तरफ मुड़ गई... मुझे सबक घोंट के याद करा दिए जाते... कभी कक्षा में सेकंड की जगह थर्ड आ जाती तो इससे बड़ा अवसाद न होता... किताबें, सबक, नंबर ये ही मेरी दुनिया थी... मैं शायद पढ़ने में होशियार नहीं थी, पर याद कर लेती थी... डॉक्टर बनना हैइस बात को मैंने ओढ़ लिया... कुछ जानने वाले मुझे तब, मेरी उस छोटी उम्र से डॉक्टर साहब बुलाने लगे थे... तब क्या बल्कि आज भी बुलाते है... आप इन सपनों का बोझ समझ पा रहे हैं?     
  
छठी में पहुँची तो 25-30 की जगह 50-60 लड़कियों की कक्षा थी... एक छोटे स्कूल से बड़े स्कूल पहुँची थी... वहाँ वो सब लड़कियाँ भी थीं जो कहीं ज्यादा होशियार और समझदार थीं... शायद किशोरावस्था की तरफ बढ़ रही थी तो तरह तरह की बातें सुनकर, बड़ा स्कूल देखकर, वहाँ के माहौल में भटकने लगी... इतनी भीड़ में अब मैं पहले की तरह सेलेब्रिटी नहीं थी... मेरे पास छुप जाने के, न पढ़ने के, होम वर्क न करने के मौके थे... और मैं पिछड़ गई... 60 की कक्षा में सरक कर छठे नंबर पर... शायद वो भी न आती अगर क्लास की एक लड़की ने दीदी से शिकायत न कर दी होती... तब दीदी और माँ ने मेरे सारे छूटे हुए काम पूरे किए थे... मुझे दीदी की तरह जीने का दिल करता... कितनी सारी सहेलियाँ थीं... डांस प्रोग्राम करने अलग अलग शहरों में जाती... वहाँ अपनी टीम में सबकी लाड़ली थी... इतनी व्यवहारकुशल थी कि सब जगह उसकी तारीफें होतीं... और मैं... मेरी सिर्फ पढ़ाई की बातें... जिनसे अब मैं दूर होती जा रही थी...

घर पर इसे और बेहतर करने के प्रयास जारी थे सो मुझे अंग्रेजी माध्यम के स्कूल में डाला गया... डॉक्टर बनना है ये अब सिर्फ माँ पापा का सपना नहीं था... भैया दीदी इस मुहिम से जुड़ चुके थे... दीदी ने क्योंकि हिंदी माध्यम में पढ़ने के बाद मिलने वाली दुश्वारियाँ झेली थीं तो उसका पूरा जोर था कि मुझे अंग्रेजी माध्यम में भेजा जाए... अब ये नया स्कूल तो मेरे लिए आफत हो गया... अंग्रेजी जो बिल्कुल नहीं आती थी... और यहाँ हिंदी छोड़ सब कुछ अंग्रेजी में... बल्कि नियम भी बना दिया जाता था कि कोई हिंदी में बात नहीं करेगा... उस स्कूल में सातवीं में पहुँची मैं हिंदी में सर्वाधिक नंबर लाती थी और बाकी विषयों में लाल निशान... ऐसा निशान जिसे देखने की आदत ही नहीं थी... सिखाया भी नहीं गया था कि असफलता से कैसे मुकाबला करना चाहिए... अंग्रेजी मीडियम कवर करना है’, फिलहाल के लिए ये उद्देश्य था और रट्टू तोता के तौर पर मुझ पर और जोर शोर से मेहनत की जाने लगी... उस दबाव ने मुझे, मेरी रुचियों को पढ़ाई से और दूर किया... जो बदलाव उस उम्र में होते हैं वो भी दिमाग में हो ही रहे थे... स्कूल में मैं किसी टीचर को तब तक पसंद नहीं आई जब तक दसवीं के नतीजों में मैंने सबको पीछे छोड़ते हुए खुद को साबित नहीं किया... इसके बाद ग्यारहवीं में विज्ञान- बायोलॉजी क्योंकि डॉक्टर बनना है... मेरे विषय मेरे घर पर सबने मिल कर चुने थे... मेरा सपना डॉक्टर बनना था पर वो मेरी रुचि कभी नहीं बना... ये बात न मैंने समझी न मेरे घर पर किसी ने... ग्यारहवीं की पढ़ाई बहुत कठिन पड़ गई... उस पर से कहीं ज्यादा होशियार बच्चे थे इस बार क्लास में, जिनकी नींव बहुत मजबूत थी... मैं और मेरी तबीयत वो भार ले ही नहीं पाई... एक साल बाद बारहवीं विज्ञान से हुई तो पर डॉक्टर का सपना उसके बाद मैं आगे लेकर नहीं चली... ये निजी तौर पर मेरे और मेरे घर पर भी सभी के लिए बहुत कठिन था... हाँ इस बीच एक बात हुई थी... बहन ने महिला अध्ययन में एमए किया... उसकी बातें सुनती तो रोमांच से भर जाती थी... पहली बार मन में इतनी मजबूती से किसी विषय के लिए महसूस किया था कि मुझे भी ये पढ़ना है... उसकी किताबें लेकर पढ़ती, उसे सबसे बहस करते देखती... ये उसमें बड़ा बदलाव था... आत्मविश्वास और चमक से भरा... जाने कौन सी किताब थी, शायद छिन्नमस्ता जो तभी पढ़ ली थी और कितनी ही जगह पर खुद से जोड़ भी पाई थी... बहन अच्छी बेटीथी तो एमए के बाद शादी के लिए उस वक्त ना न कह सकी...  खैर...
बीए में घर वालों की आँखों में नया सपना आ गया था... आईएएस बनाने का... डॉक्टर, इंजीनियर, आईएएस, टीचर... इसके सिवा होता ही क्या था... मेरे पास उन्हें समझाने को तर्क नहीं थे कि मैं पत्रकारिता या फाइन आर्ट्स क्यों पढ़ना चाहती हूँ... एक दिन गुस्से में आकर खुद के बनाए सारे स्केच कूड़ेदान के हवाले कर दिए... उस वक्त किसी का साथ भी नहीं था... विषय अपनी पसंद का एक ही मिला क्योंकि पढ़ना उसी कॉलेज में था और मनोविज्ञान की सारी सीटें भर चुकी थीं... एक मेरे, एक पापा के और एक भाई की पसंद के विषय से बीए हुआ जिसका हाल बिल्कुल मिली जुली सरकार जैसा था... अंग्रेजी साहित्य के अलावा मुझे सब कुछ किसी दूसरी दुनिया का लगता... पर इन सबके बीच अब एक बात अंदर बैठ गई थी कि कुछ बनना है... और प्रेम, अफेयर, लड़कों से दोस्ती इसमें बाधा होंगे... घर में माहौल तो यूँ भी ऐसा ही था... एमए में जाकर सबकी इच्छाओं के विरुद्ध महिला अध्ययन में दाखिला ले लिया... अब तक घर वालों का सपना बदल कर मुझे लेक्चरर, प्रोफेसर देखने का हो गया था... शायद बचपन में होता तो अभी तक का जीवन बेहद सफल व सकारात्मक रहा होता... क्योंकि वो जूड़ा बनाकर काल्पनिक क्लास को पढ़ाना शायद मेरी रुचि थी जिसे कोई समझ नहीं पाया... पर अब शायद मैं बदल चुकी थी...

महिला अध्ययन... यहाँ मैं बदलने लगी, खुद को, बाहर की दुनिया को समझने लगी, रूपरेखा मैम और विषय के जरिए मुझे मेरी अभी तक की बेतरतीब उलझी जिंदगी से निकाला जा रहा था... सवालों के जवाब मिल रहे थे... चुप नहीं कराया जा रहा था, सवाल करने की आदत को प्रोत्साहित किया जा रहा था... मैं पहली बार उस ऊर्जा, बदलाव, खुशी और सकारात्मकता के दौर में थी जब मुझे असल मायनों में खुद का कुछ होना महसूस हो रहा था... मैं वो कह और कर रही थी जो मुझे पसंद था... दूसरे साल में ठीक इसी वक्त घर में कुछ और दिक्कतें हुई जो आगे के लिए बहुत परेशानी खड़ी कर गईं... दिल्ली में थी जब पता चला अपने विभाग में टॉप किया है... आगे पढ़ने के लिए बाहर जाना चाहती थीं पर मना हो गया... बहुत टूटी... सोचा कोई बात नहीं मैम को गाइड चुन पीएचडी कर लूँगी पर तभी मैम ने खुद को विश्वविद्यालय से अलग कर लिया... नेट पहली बार में ही निकालने के बावजूद मेरे लिए सारे रास्ते बंद थे... वो पीएचडी अब तक न हो पाई... खैर...
इसके बाद एक संस्थान से पत्रकारिता हुई और उसके बाद नौकरी जो जारी ही है... मीडिया में जाने के बाद जो असहजता लगी तो दोबारा गई नहीं... अफसोस भी नहीं हुआ... माँ पापा के उस लेक्चरर वाले आखिरी सपने को भी किनारा कर दिया... पर आज जहाँ जिस क्षेत्र में हूँ, जिस जगह हूँ ये मेरी पसंद का है... यहाँ मिली हर सफलता असफलता मेरी है... तमाम दिक्कतों के बावजूद ये मुझे प्रिय है, मैं इसी में आगे बढ़ी हूँ और यहीं रहना भी चाहती हूँ... मुझे मिले तमाम दोस्तों के चलते मेरी इस क्षेत्र से मुहब्बत बढ़ी ही है क्योंकि जिंदगी के प्रति समझ बढ़ी है, लड़ने की ताकत मिली है... मैं शायद एक इनसान के तौर पर जिस तरह यहाँ विकसित और परिपक्व हुई हूँ और कहीं न हो पाती... आज मेरे माँ पापा भी मुझसे बहुत खुश हैं, ये अलग बात है कि डॉक्टर वाली कसक अब भी शायद है कहीं... पर आज उन्हें अपनी भी गलतियों का अहसास है और वो मेरे लिए बहुत है... मेरे पिता ने अपनी पहचान खुद गढ़ी थी, मुझे ऐसा करते देखना भी उन्हें अच्छा ही लगता है... अब इस हाल में हूँ कि मोटे तौर पर अपने रास्ते गिरते पड़ते रोते हँसते बना ही लेती हूँ... शादी को लेकर संग्राम जारी है पर उसमे भी समय के साथ साथ बड़े बदलाव आए हैं...

ये सारी गाथा और कहानी अभी कुछ दिन पहले ताजा हुई... जब एक फिल्म देख रही थी... बेहतरीन अभिनय से कसी और बेइंतिहा पसंद की जा रही फिल्म कहीं कहीं मुझे परेशान कर रही थी... अभिभावक को जिस संपूर्णता में सही दिखाकर भगवान जैसा बना दिया गया था वह मुझे उलझन दे रहा था... पिता की जिद, अहं, दीवानगी, गुस्सा, सोच सब कुछ सही दिखाया जा रहा था... बचपन, किशोरावस्था में लड़की की असहमतियों में उसे पूरी तरह लापरवाह और गलत साबित किया जाता है... सही गलत का अंतर और साफ तरीके से बताने के लिए दोनों बेटियों के बीच तुलना हो जाती है... पूरी फिल्म को यूँ बुना जाता है कि असहमति होने पर पूरी संवेदनाएँ पिता के साथ हो जाती हैं... बेटी को गलत साबित करने के लिए तब तक असफल होते दिखाया जाता है जब तक वो वापस पिता की शरण में नहीं आती... और वापस आते ही वो सही साबित होने लगती है... यहाँ बात सही गलत की नहीं रह जाती बल्कि हमेशा से चली आ रही आदर्श बच्चेवाली बात को ही मजबूती देने की हो जाती है... जहाँ सहीतो अभिभावक ही होते हैं और गलतियाँ सिर्फ बच्चों से ही होती हैं... कहानी के साथ छेड़छाड़ होनी ही थी तो शायद बेहतरी के लिए की जा सकती थी... बेटी पर गर्व करने की बस एक ये ही स्थिति बन पाती है... माँ, हमेशा की तरह न के बराबर दिखती हैं... कुछ ऐसी रूढ़ियाँ या चलन जिन्हें चुनौती देने की जरूरत समझी ही नहीं जाती या यूँ कहें रिस्क नहीं लिया जाता... एक बात ये भी कि क्या विजेता होकर ही अस्तित्व माना जाएगा? उसके क्या मायने होंगे? जो शीर्ष पर न पहुँच सके उसके लिए जीवन का कोई अर्थ नहीं

आमतौर पर कुछ विचार देने पर सबसे पहले निजी जीवन से जोड़ दिया जाता है... शायद इसीलिए अब मेरी आदत हो चली है कि मैं पहले बातों को व्यक्तिगत जीवन पर लेती हूँ तब सोचती हूँ... मैं बचपन में बेहद अंतर्मुखी थी... बड़े होने पर एक ऐसा समय आया जब जरा खुली पर दोस्तों से भरी जिंदगी को कोई प्रोत्साहन नहीं मिलता था क्योंकि अर्जुन की तरह चिड़िया की आँख पर सारा ध्यान लगाने को कहा जाता था... ये बहुत बाद तक रहा... मेरी आदत मेरे व्यवहार में शामिल होती गई... तमाम सारी दीवारें जो आज तक भी खड़ी हैं जिन्हें एक एक कर तोड़ने की कोशिश करती हूँ... उनमें कुछ हैं जो अब होती ही नहीं क्योंकि वो खुद मेरे व्यवहार में उतर आई हैं... जैसे दोस्त बनाना... उनसे मिलना जुलना, घूमना फिरना, घर आना जाना... खासतौर से पुरुष मित्र... मेरे इस व्यवहार में मेरे घर के साथ साथ बड़ी संख्या में उन पुरुष मित्रों ने मुझे ऐसा बनाया... घर में ऐसी दोस्तियों के लिए हतोत्साहित किया जाता और ज्यादातर पुरुष मित्र आज नहीं तो कल घर वालों की बातों को सही साबित कर देते... करते करते एक ऐसा दायरा बन गया कि अब इसके पार जाते भी नहीं बनता... एक वो समूह जिसमें सबको बहुत आराम से रहते या खुश होते देखती हूँ, लगता है मैं उससे कितनी दूर हो चुकी हूँ... पता नहीं इस खालीपन के लिए किसे जिम्मेदार ठहराऊँ... घर पर आज भी इसका इलाज शादी बताया जाता है...  
      
ये ही मोटे तौर पर हमारा समाज है... मैं उन लड़कियों के समूह से हूँ जो पढ़ी लिखी हैं, जानकार हैं, अपनी और अपने से जुड़े और लोगों की जिम्मेदारियाँ ले सकती हैं, अपने हक जानती हैं, दूसरों की मदद करने की स्थिति में हैं, तरक्कीपसंद हैं, आजाद खयाल हैं... बराबरी और साथ में भरोसा रखती हैं, मजबूत हैं और भावुक भी... लेकिन अपनी सोच, इच्छाओं, विचारधारा, उसूल, ख्वाहिशों और परिवार के साथ सामंजस्य बैठाने में वे वो बड़ी कीमतें चुकाती हैं... ये एक ऐसा माहौल होता है जहाँ दोस्ती की जरूरत समझाई ही नहीं जा सकती... वो एक बेमतलब की चीज होती है... ‘मन’ तो सिर्फ भटकाने का काम करता है... महिला मित्रों के लिए भी कोई खास प्रोत्साहन या स्वीकार्यता नहीं होती... वजहें ढूँढ़ी जाती हैं कि क्यों मिला जाय, क्या काम है... क्यों कहीं जाओ या क्यों कोई आए... ये व्यर्थ समय नष्ट करना है... साथीके विकल्प को उनके सामने पेश किया जाता है लेकिन वो मंजूर न होने पर दूसरा विकल्प खालीपन ही होता है... जब जिरह कर माहौल बदलने की कोशिश हो तो दोस्त बनने पहुँचे लोग ही कितनी बार आपको गलत साबित कर देते हैं... ये दुहरी मार दम घोंटती है... दिमाग का इतना इस्तेमाल कि वो थक जाता है और इसके बाद इस खालीपन में ही वो विकल्प तलाशे जाते हैं जिनसे इसे भरा जा सके... ये जिंदगी होती तो आपकी मर्जी वाली है पर वैसी नहीं जैसी आपने चाही थी... हम खुद को ये कहकर समझाते हैं कि कभी किसी को मुकम्मल जहाँ नहीं मिलता... और एक वक्त के बाद इसकी शिकायतें भी बंद हो जाती हैं... हम एडजस्ट कर लेते हैं... नहीं करना चाहिए था, बोलना चाहिए था, विरोध-जिद करनी चाहिए थी पर हम थक चुके होते हैं तो एडजस्ट कर लेते हैं... हम आज भी सवालों के घेरे में रहते हैं तो एडजस्ट करते हैं... हर उस जगह जहाँ किया जा सकता है क्योंकि कुछ बेनतीजा बहसें भीतर गुस्से को ही भरती हैं... और हम इन सवालों से दूर रहना चाहते हैं... 


हम वे परिवार हैं जिनके दबाव बच्चों को उनके मन से जिंदगी के सपने बुनना सिखाते ही नहीं... उनकी फिक्र को सोच और व्यवहार में जैसे उतरना चाहिए था वो कभी उतरती नहीं... ये सभी कुछ काफी हद तक इस सामाजिक ढाँचे के असर में ही होता है... मुझे नहीं पता कि अपनी आँखों में जबरन डाले गए सपने को सच कर देती तो क्या होता? उस न्यूरोसर्जन के लिए सफलता और खुशी की क्या परिभाषाएँ होतीं? जीवन के प्रति नजरिया कितना इनसानियत भरा होता, किस तरह की स्थितियों में होती, क्या तब भी ऐसे ही दबाव और सवाल होते? क्या खुश और संतुष्ट होती? परिवार खुश होता ये तय है पर वह तो आज भी खुश ही है... क्या मेरे परिवार को और पीछे पड़ जाना चाहिए था? और मुझे? और पढ़ाई, कोचिंग, सुबह जल्दी उठना - देर तक पढ़ना... कुछ भी करना, सब कुछ भूल कहीं भीतर खुद को दफन कर खत्म कर देना पर उस सपने को पूरा करना और मिसालबन जाना... सपने के रंगीन काँच वाले चश्मे को यूँ पहनना कि कभी जिंदगी में आँखों से न उतारना... ऐसी स्थितियाँ कि जब वो कभी उतरे भी तो आँखों में रोशनी ही न बची हो... वो मेरी ही बेहतरी के लिए तो था... इस दुनिया में जहाँ लड़कियाँ जरूरत तो हैं पर बेटियाँ अनचाही होती हैं, ऐसे में उसके लिए इतना बड़ा सपना देखना, हर सुविधा मुहैया कराना, मेहनत करना (यकीन मानिए मेरे घर पर मेरे ऊपर सबने बहुत मेहनत की)... था तो मेरी ही बेहतरी के लिए पर उस बेहतरीकी परिभाषा क्या है? गर बहू, पत्नी, प्रेमिका की अस्मिता की इतनी बातें होती हैं तो बेटियों की क्यों नहीं या इस मामले में तो किसी भी बच्चे की क्यों नहीं... वंचित करना गलत है पर दबाव से भरकर जीवन कंट्रोल करना क्या सही है? परिवार की उलझनों में अब किसे सही और किसे गलत कहा जाएगा... पापा मेरी हर सफलता पर मारे खुशी के भावुक हो जाते थे, गर्व से भरी एक अलग ही आवाज होती थी उनकी... तो क्या अपनी राह चुनकर मैं उनकी अपराधी हो गई हूँ... क्या मेरे चुनाव को मेरी असफलता में गिना जाएगा? हर किसी की उम्मीदों से इतर चल अगर मैं अपराधी हुई हूँ तो क्या अपनी गुनाहगार नहीं? खुद से मेरी भी कई उम्मीदें थीं जिन्हें किनारे कर दिया और एडजस्टकिया, अब भी करती हूँ... प्यार, फिक्र, खयाल सबको एक दूसरे का था और है भी पर शायद वैसा नहीं जैसे की सामनेवाले को जरूरत या ख्वाहिश थी... कोई भी किसी को संतुष्ट नहीं कर सका... किसी के हिसाब से नहीं चल सका... जाने क्यों हम चाहते हैं कि कोई हमारे हिसाब से चले... सफलता असफलता की परिभाषाएँ सिर्फ वो नहीं जो हम जानते हैं... आज मुखर हूँ, बहुतों के लिए बद्तमीज भी हूँ... मुझे मेरे भीतर का प्यार और कड़वाहट दोनों इसी समाज से मिले हैं... आत्मविश्वास भी और डर, कमजोरी भी... मैं मिसालनहीं बनी पर क्या जिंदगी में इसके सिवा कुछ भी नहीं? शायद कभी हम समझ सकें कि एक जिंदगी है जो महत्वाकांक्षाओं के परे है... गर नहीं भी है तो इसकी तैयारी कराने का सिर्फ एक ही तरीका तो नहीं... 

बुधवार, 28 सितंबर 2016

सामाजिक सर्विलांस पर रखे चरित्र

(इस लेख को फिल्म समीक्षा की उम्मीद में न पढ़ें)
  
वो एक अजीब स्थिति थी...नहीं पता कि हॉल में पसरा सन्नाटा किस बात का था...लोग फ़िल्म की कसावट में जकड़े थे....उसके बहाव में बह रहे थे...सस्पेंस महसूस कर रहे थे...या खामोशी से उन उन लम्हों को याद कर रहे थे जब वो ऐसी किसी स्थिति का हिस्सा बने थे...जब उन्होंने ऐसा किसी के साथ किया था...जब ऐसा कुछ उनमे से किसी के साथ हुआ था...जब उनके चरित्र को उनकी निजी आदतों पर आंका गया था या फिर उन्होंने ख़ुद ऐसा किसी और के साथ किया था...जब वो ऐसे दोस्त, पड़ोसी, माता पिता, बॉयफ्रेंड, गर्लफ्रेंड, रिश्तेदारसरकारी अधिकारी कुछ भी बने...जाने क्यूँ मैं दिल से ये ही चाह रही थी कि वहां बैठा हर इंसान अपनी ज़िन्दगी में आये उस लम्हे को याद कर सके जब उसने ऐसा किया...किसी से भले ज़िक्र न करे पर कहीं खुद अपने अंदर अपने ऊपर शर्मिंदा हो...याद करे कि वो देर रात घर लौटने वाली लड़की बदचलन नहीं....वो कॉल सेंटर में काम करती है, कॉल गर्ल नहीं है और अगर है भी तब भी उसकी अस्मिता, वजूद और हक सिमट नहीं जाते...वो दोस्तों संग शराब पीने वाली लड़की वेश्या नहीं...वो एक बेहद अक्लमंद और संवेदनशील इंसान और कामकाजी औरत है....और वैसे आप तो शराब न पीने वाली लड़कियों को पिछड़ा समझते हैं...तो अब क्या हुआ...ऐसा दोगलापन भी क्या कि अगर वो साथ बिस्तर तक पहुँच जाय तब तो ठीक वरना वो बदचलन...इस तरह के तमाम सवाल उठाये ही गए हैं...जिनकी कसौटी पर आम तौर पर लड़कियों का चरित्र आंका जाता है...पर क्या तुम्हें याद आया कि कब तुम्हारी साथी की उस पार्टी में जाने की इच्छा नहीं थी, तुम्हारे बॉस के साथ वो असहज हो रही थी पर तुम्हे ज़रा भी कोफ़्त नहीं हो रही थी...ये अलग बात है कि किसी रोज़ इसी तरह वो अपना एक और साथी चुन लेती तो वो तुम्हारे लिए बदचलन हो जाती...क्या याद आया तुम्हे कि उस दिन तुम्हारी साथी एकांत चाहती थी...उसे तुम्हारा साथ तो चाहिए था पर शारीरिक सम्बन्ध नहीं और कैसे उसके मना करने के बावजूद तुमने उसकी एक न सुनी थी और कैसा इमोशनल ब्लैकमेल किया था उसे....कैसे प्रेम के सारे अर्थ सिर्फ़ शरीर तक आकर सिमट गए थे...क्या तुम्हे याद आई अपनी वो दोस्त जो जिससे बेइंतेहा दोस्ती थी तुम्हारी...हर सुख दुःख हंसी मज़ाक लड़ाई झगड़े के साथी लेकिन वो तुम्हे एक दोस्त के तौर पर ही देखती थी...अपने एक तरफ़ा प्यार में पागल होकर अपने सड़े अहं के साथ किस कदर मुश्किलें खड़ी की तुमने...कैसी कैसी स्थितियों में क्रूर हुए तुम...कि सावधानी लेने के नाम पर तुम्हे अपने मज़े में खलल लगती थी जबकि ताक पर तुम्हारी साथी की सेहत थी...वही साथी जिससे तुम्हे बेइंतेहा मुहब्बत थी....कैसे उस छोटी बच्ची के जिस्म पर उँगलियाँ फिराने की कोशिश की थी तुमने...उसकी सहमी आँखों पर ज़रा भी तरस नहीं आया तुम्हे....जबकि कैसे बहन से छेड़छाड़ होने पर खून खौल उठता था तुम्हारा...कैसे दफ़्तर में आधुनिक कपड़े पहनने वाली, अंग्रेजी बोलने, शराब पीने, पार्टी करने वाली लड़कियों पर तुम फ़िदा रहते थे लेकिन घर पर तुम्हे बीवी बहन और बाकी औरतें सीमा रेखा के अन्दर ही सुहाती थीं....कैसे किसी की भावनात्मक कमजोरी के दौर को तुमने अपने लिए एक मौके के तौर पर देखा था...कैसे अपनी बीवी की सेक्स के लिए इच्छा ज़ाहिर करने पर असहज हो गए थे तुम...प्रेम में सेक्स ज़रूरी है और इसलिए तुमने गर्लफ्रेंड से किया भी पर ऐसे सेक्स करने वाली लड़कियां वहाँ भीतर तुम्हारे दिल में 'अच्छी' नहीं ही मानी जाती थीं...क्या कुछ भी याद करके शर्मिंदा हो पाए तुम? वो किरदार जिन्हें तुम परदे पर देख रहे थे वो तुम्हारे और मेरे बीच के ही किरदार हैं  

फ़िल्म देखते वक़्त मेरे दिमाग में फ़्लैश बैक में जाने क्या क्या चल रहा था...हर उम्र, स्थितियों, जगहों से जुड़ी वो बातें याद आ रही थीं जिन्हें हमेशा दफ़न करने की ही कोशिश की लेकिन ज़रा सा छेड़ भर देने से एक भयंकर शोर के साथ वो दुबारा खड़ी हो जाती थीं...जैसे आज हुई थीं...मैं खामोश थी...फिल्म के बाद भी खामोश रही...लोग वाह वाह कर रहे थे, तारीफें कर रहे थे और मैं समझ नहीं पा रही थी कि इस फिल्म में इन्होने ऐसा क्या देखा जो पता नहीं था..सुना नहीं था, किया नहीं था या किसी भी तरह अनुभव ही नहीं हुआ था...क्या वो सब अभिनय कर रहे थे ये दिखाने का कि हमने कभी ऐसा नहीं किया...क्या वो भीतर ही भीतर शर्मिंदा थे...क्या कहीं कोई चोट लगी थी...क्या उन लड़कियों को ये अहसास हुआ था कि अपने मर्ज़ी के साथी चुनकर, या बाहरी दुनिया का हिस्सा बनकर वे कुछ ग़लत नहीं कर रहीं...ये उनकी निजी ज़िन्दगी और उनके हक हैं...जिन पर उन्हें विश्वास और फख्र होना चाहिए...क्या ये लड़कियां याद कर पा रही थीं कि कब इन्होने किसी और लड़की के चरित्र प्रमाण पात्र जारी किये थे....यूँ ही ‘स्लट’, ‘बिच’, ‘होर’ कह दिया था...जिस लड़के को ये पसंद करती थीं वो अगर किसी और लड़की को पसंद करता था तो वो लड़की गालियों की हक़दार बन जाती....पड़ोस में देर रात लौटने वाली या फिल्म देखने जाने वाली लड़की ‘उस टाइप’ की हो जाती सिर्फ इसलिए क्यूंकि हम वो सब काम नहीं कर पा रहे थे...हर वो लड़की जो हमे सिखाई गयी ‘अच्छी लड़की’ या नैतिकता की परिभाषा से इतर कुछ करती वो गलत हो जाती...क्या याद आ पा रहा था?

मैं बेचैन थी...पर मैं चाहती थी कि वहां बैठे सभी लोग बेचैन हों...वो सब मर्द बेचैन हों जो कभी न कभी ऐसे हुए थे...वो जानें देखें कि कैसी सड़ांध है उनकी सोच की लेकिन उसी पल मुझे ये भी लगा कि क्या वाकई नहीं जानते कि इन्होने क्या किया है और कब किया है...बाहर इनमे से कितनों ने ही इस पर बड़ी बड़ी बातें की हैं...ये आधुनिक हैं, खुली सोच के हैं...इन्हें लड़कियों की आजादी देखकर ख़ुशी होती है...पर क्या वाकई ये सोच है? क्यूंकि व्यवहारिकता तो कुछ और ही बता देती है...वो उस दोगलेपन को उजागर कर देती है जिसकी कल्पना भी नहीं की थी.... “चलते हैं न तुम्हारे घर...कब तक लोगों की परवाह करोगी...तुम व्यस्क हो और ये तुम्हारी ज़िन्दगी है”..... “अरे यार एक दो ड्रिंक से कुछ नहीं होता, ट्राय न”, “अभी 10 ही तो बजे हैं चली जाना क्या जल्दी है”....“सेक्स प्रेम का बहुत ज़रूरी हिस्सा है...तुम भी किस ज़माने की बातों में उलझी हो लेट्स डू इट”.... “सॉरी यार मिस्ड इट अगेन ऐसा करो आई पिल ले लो”....तुम ही कहते थे न...तो ये सब तो वहां होता है जहां साथी अपनी मर्ज़ी से चुने जाते हैं...तुम्हारे मन की इस दुनिया में शराब और सेक्स ज़रूरी हो जाता है...वो आधुनिक होने का प्रमाण हो जाता है...इतना कि तुम्हें किसी का किसी के साथ कितनी बार भी सेक्स करना गलत नहीं लगता लेकिन बाद में गलत सिर्फ लड़की ही कैसे हो जाती है....अब उन लड़कियों का सोचके देखें जहां चुने हुए साथी जैसा कुछ नहीं....

मेरी ज़िन्दगी समाज के सर्विलांस पर होती है....कब उठती हूँ...कहाँ जाती हूँ...कौन घर आता है...कहाँ काम करती हूँ...क्या काम करती हूँ...क्या पहनती हूँ...क्या खाती हूँ....लड़कों से दोस्ती है...कब वो अकेले आते हैं घर...आते हैं तो घर के अन्दर क्या होता होगा....सेक्स ही होता होगा....घर पर लड़के नहीं आने चाहिए...एक ही लड़का आता है या अलग अलग...अगर आते हैं तो लड़की गलत है...रात को कहाँ से आती हूँ...दो दिन तक घर से बाहर क्यूँ रहती हूँ...किससे बात करती हूँ...पड़ोसियों के यहां कथा में क्यूँ नहीं जाती और देर रात फिल्म देखने क्यूँ जाती हूँ....शादी नहीं की...क्यूँ नहीं की...उम्र हो गयी है...ज़रूर कोई चक्कर होगा...घरवालों ने ज्यादा छूट दे रखी है...क्या पता इसमें ही कोई कमी हो...जाने कितने सवालों की एक्सरे मशीन से हर रोज़ हर पल मेरे चरित्र का स्कैन होता है और अगर उस दिन मैं बाइज्ज़त बरी हो सकी तो वो मेरी किस्मत है...ये अलग बात है कि इनमे से किसी सवाल का जवाब देना अब मैं ज़रूरी नहीं समझती...

उस फिल्म को देखते वक़्त क्या खुद से सवाल किया था कि क्यूँ करते हैं हम ऐसा...क्यूँ बन जाते हैं ऐसे जाननेवाले...पड़ोसी, परिवारजन, रिश्तेदार, दोस्त या सहकर्मी...शर्मिंदगी हुई थी या ये ही लगा था कि अब लड़कियां ऐसा करेंगी तो उनके साथ ऐसा तो होगा ही...मुझे लगता है ज्यादातर ने आत्मग्लानि से बचने के लिए अपने अन्दर उठ रहे उन सवालों को ये जवाब देकर ही शांत किया होगा....और ये भी जानती हूँ कि अगले ही दिन मेरा पाला एक ऐसे व्यक्ति से पड़ सकता है जिसके लिए मैं सिर्फ इसलिए पिछड़ी हूँ क्यूंकि मैंने उसके साथ शराब पीने का ऑफर ठुकरा दिया....आपको लगता है तमाम दफ्तरों में बैठी लड़कियों, औरतों की जिंदगियां आसान होती हैं....इस गुलाबी आईने में ख़ुद की वो सियाह सूरत और सीरत पहचानिए....आपके फूहड़ मज़ाक पर आपको हड़का देने वाली लड़की का ‘सेंस ऑफ़ ह्यूमर’ बीमार घोषित हो जाता है और वो प्रोफेशनल सेक्टर के लिए अयोग्य हो जाती है....तुम्हारी नज़र में हमारा चरित्र हमारी बर्दाश्त करने की सीमा से तय होता है...

मेरे इर्द गिर्द तमाम लोगों के लिए ये सवाल है...पर अब मुझे वाकई नहीं लगता कि कोई फर्क पड़ता है इससे...क्यूंकि वापस आकर एक अच्छा रिव्यु पोस्ट हो जाता है, कुछ देर चर्चा हो जाती है...तारीफ हो जाती है सलाह दे दी जाती है कि ज़रूर देखें....और ऐसा कहकर हम ये ज़ाहिर कर देते हैं कि हम ऐसी ज़िम्मेदार फिल्में देखते हैं मतलब संवेदनशील हैं....हम कितने ज़िम्मेदार हैं और फिल्म में दिखाए गए खलनायकों जैसे नहीं हैं....हमें स्त्री विमर्श पर बोलने के लिए कुछ और बातें पता चल जाती हैं जिसके ज़रिये हम प्रभावशाली बातें कर पाते हैं और संवेदनशील होने का मैडल हथिया लेते हैं...किसी लड़की से ज्यादा बात करने या उसमें दिलचस्पी लेने और संवेदनशील होने में ज़मीन आसमान का फर्क होता है...अब भी मानती हूं कि सब ऐसे नहीं लेकिन बड़ी संख्या ऐसों की ही है...चेहरे दुहरी सोच के नकाब में हैं….रही बात ‘न’ को स्थापित करने की तो जानकारी का दायरा बढ़ाइए... ‘No Means No’ (न मतलब न) विश्व भर में चल रहा अभियान है...हिन्दुस्तान में भी इसकी कम चर्चा नहीं हुई...पर आपके लिए तो ‘न’ का अर्थ लड़की की शर्म से निकाला जाता है और उसमें आपको एक अलग ही किस्म की ‘हाँ’ दिखती है...      

एक बात जो बेहद ज़रूरी है...संवाद...खासतौर पर लड़कों बच्चों के साथ...संवाद की कमी ज़बरदस्त भटकाव ला रही है...उन्हें दोस्तों में अपनी इमेज बनाने का अजीब दबाव है...लड़की छेड़ना, मार पीट, मां बहन की गालियां, हिंसा...तमाम सारी बातें जिसपर उनसे चर्चा नहीं की जाती...अपने आसपास के लोगों, मीडिया और माहौल से प्रभावित होकर वो एक अलग ही ट्रैक में बढ़ जाते हैं...जहां उन्हें ‘बुलेट राजा’ जैसा बनना होता है....यहां ज़बरदस्ती करना ‘हीरो’ होने की ज़रूरी शर्त है....हर रोज़ इतनी हिंसा की ख़बरों में जिन अपराधियों का ज़िक्र है वो हमारे आपके घरों से ही निकल रहे हैं...उनमें अनपढ़ भी हैं और कान्वेंट से पढ़े हुए भी...झुग्गी में रहने वाले हैं और बड़े अधिकारियों के बेटे भी.... ये जिस ‘भौकाल’ की ख्वाहिश और नशा है देखिएगा वो आपके समाज को बना क्या रही है....हिंसा को ख़त्म करने के लिए पहले सहमती और असहमति की संस्कृति के लिए जगह बनाइये...किसी लड़की का चरित्र सिर्फ़ इसलिए संदिग्ध नहीं हो जाता क्यूंकि वो आपकी ‘अच्छी लड़की’ की परिभाषा से फर्क है.  


और लड़कियों...बिना वजह शर्मिंदा होने की ज़रूरत नहीं बल्कि सबकी बातों पर तो ध्यान देने की भी ज़रूरत नहीं...पर अपने जैसी रहो....किसी समूह विशेष में शामिल होने या उनकी स्वीकार्यता पाने के लिए भला क्यों ख़ुद को बदलो...हमारी ज़िन्दगी हमारी दुनिया भला कोई और क्यों तय करे....ख़ासतौर पर वो जिसके लिए हम उपभोग की वस्तु से इतर कुछ हुए ही नहीं...तुम्हारे लिए नियम क़ायदे कानून भला वो क्यों बनाएं, तुम्हारे फ़ैसले वो क्यों लें...कुछ करो तो इसलिए करो कि तुम्हारा दिल किया...किसी भेड़चाल में शामिल होने के लिए नहीं...बस दिमाग की खिड़कियां खुली रखो...और हां किसी के साथ कुछ ग़लत होने पर बन सको तो उसकी हिम्मत बनो परेशानी नहीं...ये कहने से बचो कि ‘हम भी तो बाहर जाते हैं हमारे साथ तो कभी ऐसा नहीं हुआ’...क्यूंकि ‘ये’ किसी घोषणा के साथ नहीं होता...और करने वाले ज़्यादातर जान पहचान के होते है....बाकी...फिल्म तो अच्छी थी ही...लोगों का मनोरंजन हुआ और वीकेंड की एक शाम सार्थक साबित हुई. 

मंगलवार, 26 अप्रैल 2016

बराबरी की लड़ाई में बेनकाब होते चेहरे


सब कुछ ठीक ठाक सा ही चल रहा था...लोग मोदी विरोधी बातें लिख रहे थे... दक्षिणपंथी रवैये पर सरकार की बखिया उधेड़ रहे थे...कोई भी भेदभाव वाला, पिछड़ा, गैरबराबरी वाला, दमनकारी फ़ैसला आता और पूरी मजबूती के साथ एक पूरा वर्ग विरोध में खड़ा हो जाता...कसके एक दूसरे का हाथ थामे, हौसला देते हुए...नए दोस्त बनते गए, उनकी बातों से लोग प्रभावित होते और फिर और लोगों से जुड़ते जाते...ऐसा करते करते दक्षिणपंथी व्यवस्था के ख़िलाफ़ एक भरा पूरा वर्ग जिसमे छात्र- छात्राएं, बुद्धिजीवी, प्रोफेशनल्स, गैर सरकारी संगठन, सामाजिक कार्यकर्ता जैसे तमाम लोग एकजुट हो गए...पर ज़रा एक बुर्के- परदे नाम का झोंका क्या आया पल भर न लगा इस समूह को औरत और मर्द में विभाजित होने में (सब ऐसे नहीं हैं ये भी सच है, पर बड़ी आबादी ऐसी ही निकली)... इस मसले को धार्मिक रंग भी खूब दिया गया.

जिसने बुर्के के विरोध में कुछ कहा उसे गालियाँ मिलीं, चरित्र प्रमाणपत्र जारी हो गए, धमकियाँ मिलने लगीं और क्या कुछ नहीं कहा गया...ध्यान दें ये वो ही लोग हैं जो अभी तक साथ चल रहे थे...तरक्कीपसंद ख़याल ज़ाहिर कर रहे थे... ऐसी बड़ी बड़ी बातें कि आपके पास प्रभावित होने के अलावा कोई चारा न हो...पर ये ही वो लोग हैं जो अब मां बहन की गालियाँ दे रहे थे...रंडी से लेकर रंडी की औलाद तक का तमगा लगा रहे थे...शैतान की उपाधि दे रहे थे एंटी मुस्लिम या एंटी हिन्दू होने की बात करने लगे थे....आख़िर हक़ की आवाज़ उठाने वाली औरत "रंडी" क्यूं? वैसे सच कहूँ तो मुझे बहुत ज्यादा हैरानी नहीं हुई क्यूंकि ये बात मैं पहले भी कह चुकी हूँ कि मैंने जेंडर से जुड़े मुद्दों पर बड़े बड़े तरक्कीपसंदों का गला बैठते और उन्हें बगले झांकते देखा है...तो भई एक झटके में कइयों का मुखौटा उतर गया...ये भी क्या ज़बरदस्त टेस्टिंग हुई.

कुछ बेहद मूलभूत बातें...और इन्हें यहाँ दर्ज करने से पहले ये साफ़ कर दूँ कि मेरे हिसाब से बराबरी किसी भी धर्म में औरतों को नहीं मिली इसलिए यहाँ इसे किसी एक विशेष धर्म के लेंस से देखना आपकी आँखों और दिमाग की कमज़ोरी होगी जिसपर मुझे कोई सफ़ाई नहीं देनी.

1-      लड़की लड़का पैदा हुए, न बुर्के में हुए न बिकनी में न घूंघट में न धोती कुरते या कुरते पायजामे में....जी हाँ वो नंगे पैदा हुए...कैसे हुए ये भी जानते ही होंगे...नहीं जानते तो गूगल कीजिये लेख से लेकर वीडियो तक सब उपलब्ध है....वे औरत मर्द के बीच उन्ही शारीरिक संबंधों का नतीजा थे जो आपके लिए शादी से पहले पाप और शादी के बाद पुण्य होते हैं. 9 महीने भ्रूण बनकर उसी औरत के गर्भ की गर्मी में पले बढ़े जिससे जुड़ी बातें खुलकर करना शर्म की बात हैं...और उस भ्रूण के विकसित होकर एक शिशु बनकर दुनिया में आने का रास्ता वो ही था जिसे आपके यहाँ नरक का द्वार कह दिया गया है...पैदा होते ही मां बच्चे को उसी छाती से दूध पिलाती है जिसे आप आमतौर पर बाकी लड़कियों के क्लीवेज झांकते वक़्त देखते हैं...तो बात साफ़ है कि सब कुछ जुड़ा तो शारीरिक संरचना से है...बस लड़की और लड़के में ज़रा फ़र्क है.  

2-      पैदा होने के बाद दोनों को कपड़े में लपेटा गया...बच्चे को पता नहीं था कि वो क्या है...वो बस टुकुर टुकुर विस्मय से ये नयी दुनिया देख रहा था...बच्चा बड़ा होता है उसका नाम रखा जाता है, उसकी परवरिश होती है, खेल तय होते हैं, काम तय होते हैं, मिज़ाज तय होते हैं, व्यवहार तय होते हैं और कपड़े भी तय होते हैं....ये सब उसके जीवन में इतने आहिस्ता से शामिल किया जाता है जैसे उसका खाना बदलना या उसके कपड़ों की माप बदलना कि सबकुछ बदलता भी जाए और पता भी न चले...नतीजा लड़के माचो मैन बनते हैं और लड़कियां डेलिकेट डार्लिंग...दोनों के लिए उनकी डील डौल बेहद ज़रूरी हो जाती है पर एक को मजबूती दिखानी होती है तो दूसरी को अपने शरीर के उतार चढ़ाव और नाज़ुक- गोरी चमड़ी...एक अपने मज़बूत बाजुओं पर इतराता है तो दूसरी अपनी गोरी कलाइयों में खनकती चूड़ियों पर...एक को चौड़ी छाती ताननी होती है तो दूसरी को अपना वक्ष छुपाना होता है...कहीं कुछ दिख न जाए....कहीं कोई शॉर्ट्स टी शर्ट में होता है तो दूसरी ओर कोई अपना दुपट्टा और कमर से नीचे लटकती चोटी संभाल रही होती है...टांगे दिखना, झीना कपड़ा पहन लेना, या बाकी छोड़िये जीन्स टी शर्ट पहनने पर भी त्योरियां चढ़ने लगती हैं...गांव देहात में पल्ला सिर से सरकना नहीं चाहिए और बुर्के की तो खैर कोई उम्र ही नहीं होती. यहाँ ध्यान दीजिये कि कपड़े तय करने से पहले कतई पूछा नहीं गया...विकल्प नहीं दिए गए...लड़की के सामने चार तरह के परिधान रखकर ये नहीं कहा कि अपनी पसंद का पहनावा अपनी सहूलियत से चुन लो...हाँ चार एक ही तरह के परिधान भले रख दिए गए हों...साथ ही दिमागी परवरिश ऐसी कि वो इस सब को सही मानकर चले.

3-      हम उस समाज में बढ़ने लगते हैं जहाँ जिस लड़की का शरीर दिख जाए तो वो बदचलन हो जाती है और उसके साथ कोई अप्रिय घटना होने पर वो खुद ज़िम्मेदार होती है क्यूंकि वो सही लड़की नहीं थी...भीषण गर्मियों में देखिये अपने घरों में कि किस तरह मर्द अधनंगे टहलते हैं कि गर्मी बहुत है और औरत के पास विकल्प नहीं...गाउन पहन कर किसी बाहर वाले के सामने नहीं आ सकती मानो इसकी गिनती कपड़ों में है ही नहीं. मज़े की बात है आज तक कभी ऐसी कोई चर्चा होते नहीं सुनी कि मर्दों को शरीर ढंक कर रखना चाहिए ताकि वो औरतों की बुरी नज़र का शिकार न हों...मतलब आप ये मानते हैं कि बुरी नज़र सिर्फ मर्द की होती है बल्कि बातों से तो यूँ लगता है कि सारे मर्दों की बुरी ही होती है...तो भैया अगर रोग तुम्हे है तो इलाज की ज़रूरत भी तुम्हे ही है न...ऐसा तो है नहीं कि बुखार तुम्हे आएगा तो दवा अपने पडोसी की कराओगे.

4-      यहाँ एक और रिवाज़ चल निकला कि भई गुस्सा कहीं का भी और कैसा भी हो उसे निकालो औरत पर और अगर ज्यादा ही रंजिश है तो उसकी यौनिकता से बेहतर कोई विकल्प नहीं...वहीँ प्रहार करो क्यूंकि ये न सिर्फ़ उसकी बल्कि पूरे खानदान की ‘इज्ज़त’ है...मतलब ये कि दिमाग, समझ, व्यवहार, काम, या दिल, जिगर, गुर्दा, हाथ, पैर, आँख, कान, मन भर नसों और हड्डियों से भरे पूरे शरीर में आपको दिखा क्या- योनि...अब भई जब बच्ची हुई थी तब उसने तो कहा नहीं था कि खानदान की इज्ज़त को उसकी योनि में फिट कर दो...तो ये माजरा क्या है...कुछ भी नहीं आपकी मानसिक बीमारी का एक लक्षण मात्र है...और इसमें आप अकेले शामिल नहीं हैं...हर वो व्यक्ति इसमें शामिल है जिसके लिए शर्म हया लड़की का गहना हो जाते हैं...मर्दानगी की परिभाषाओं में तो शर्म का ज़िक्र होता ही नहीं...और न ही हमारे समाज में लड़कियों को विरोध करना सिखाया जाता है...उसे बताया जाता है त्याग, करुणा, सहनशक्ति, ममता, शर्म, सुन्दरता (जिसकी परिभाषाएं भी कोई अच्छी नहीं)...तो भई कुल मिलाकर औरत हुई सामान और मर्द को बनाया गया उसका मालिक.

5-      धर्म हुए, नियम कानून हुए, व्यवस्थाएं बनी, काम तय हुए...बात ये, कि ये सब किये किसने...कौन शामिल था जब ये सब तय हुआ...जब पुरुष घर का मुखिया और बेटा घर का चिराग हो गया...जब सती और जौहर के रिवाज़ तय हुए...जब पति स्वामी हो गया, जब औरत घर की चार दीवारी में सीमित कर दी गयी...जब उसके हिस्से धीरे धीरे सिर्फ सुनना, आदेश का पालन करना, बच्चे जनना और उनका पालन पोषण करना आ गया...उसे बुरा न लगे तो उसे देवी बना दिया...उसके क़दमों में जन्नत होने की बात कर दी...इस तरह एक लॉलीपॉप पकड़ाया और कहा गया बस इसमें ही खुश रहो. शरीर के हिस्सों को शर्म से जोड़ दिया और ज़िन्दगी भर उनकी हिफाज़त करने की हिदायत दे दी...पायल चूड़ी झुमके हार की खनखन और असहज कर देने वाले कपड़ों की भव्यता को तड़कीला भड़कीला बनाकर उसकी मोबिलिटी पर कण्ट्रोल कर दिया...उसने इन कैद की जाने वाली जंजीरों का मतलब न भांपा या यूँ कहें आपने चकाचौंध के साथ साथ ऐसा डर का माहौल बनाया कि उसके पास दूसरा विकल्प नहीं था...सिन्दूर न लगाया तो पति की जान ख़तरे में, व्रत न रखा तो बेटे की...अरे शादी से पहले ये मर्द कैसे जीवित था बिना औरत के सिन्दूर लगाए, मंगलसूत्र पहने...और बहन बेटियों के लिए व्रत का तो कोई कांसेप्ट मैंने आज तक न सुना न देखा

6-      कहां हैं आपके इतिहास में औरतें...बस ऋषि मुनि जैसे विद्वान् हैं...जिन्होंने रचा क्या गैरबराबरी से भरी पूरी किताबें...औरतें कहां थीं उस वक़्त...ऐसा नहीं था उनके पास दिमाग नहीं था...बात ये थी कि उनके पास मौका नहीं था...आज देखिये....कहीं भी किसी भी परीक्षा के नतीजे उठा के देख लीजिये...तमाम संघर्षों के बाद भी लड़कियां जब मैदान में उतरती हैं तो सैलाब बन जाती हैं...मुस्लिम साथी बात करते हैं कि उस वक़्त हमारे यहाँ इतनी तरक्की पसंद खयालात थे कि महिलाओं की ज़बरदस्त प्रतिभागिता थी...हर काम में उनका दखल था...व्यवसाय हो या युद्ध उनका दखल सब जगह था...तो भैया अब क्या हो गया...ज़रा अब अपने व्यवहार को देखो...अब देखो कितना आज़ादख़याल या खुला माहौल मिल रहा है लड़कियों को...कितने मौके मिल रहे हैं...इस्लाम के नियम, उनकी ‘मर्ज़ी’ और उनकी सुरक्षा के नाम पर उन्हें बुर्के के पीछे ढकेला हुआ है...अपने पहनावे में भी बदलाव न करते...और जब तुम शॉर्ट्स पहने टहला करते हों सड़कों पर, क्यूँ तब तुम्हारा इस्लाम खतरे में नहीं आता, तब तुम कूल कैसे हो जाते हो. ठीक ये ही बात घूंघट पर जाती है.

ये कैसी व्यवस्था या सोच है तुम्हारी कि लड़कियां तुम्हे वो पसंद आती हैं जो मॉडर्न हों, अक्लमंद हों...आज मिलें, कल डेट करें, देर रात साथ घूमें और परसों बिस्तर पर पहुँच जायें...न पहुंचे तो पिछड़ी हुई...पर हाँ अक्लमंद कितनी भी क्यों न हों बहस न करें...प्रेम के मायने कितने फ़र्क कर दिए गए... और ये ही परिभाषाएं बदलते देर नहीं लगती जब बात घर की औरतों की हो...उनका घर से बाहर आना जाना, पहनना ओढ़ना, व्यवहार, काम काज सब परम्परागत...बाकी छोड़िये कल तक जो मॉडर्न गर्लफ्रेंड थी वो भी अगर बीवी बन जाए तो उसे भी अपनी सीमाएं समझ लेनी चाहिए...और अगर कभी इसपर बात छेड़ी जाए तो कहा जायेगा हम तो मना करते हैं पर वो अपनी मर्ज़ी से ऐसा करती हैं...अगर वो अपनी मर्ज़ी से ऐसा करती भी हैं तो क्या आपकी ज़िम्मेदारी नहीं की आप उन्हें जागरूक करें...आप उन्हें विमर्श में शामिल करें...उन्हें दुनिया भर में हो रहे बदलाव और उसकी ज़रूरत के बारे में बताएं...पर नहीं आप उनकी हाँ में हाँ मिलाते हुए बुर्के या ऐसी किसी भी बात को उनकी पहचान या सुरक्षा से जोड़ देते हैं और अपने तरक्कीपसंद दोस्तों के बीच आकर बेचारे बन जाते हैं.    

बातें बराबरी की होनी चाहिए...हर पीछे छूटे व्यक्ति को मुख्यधारा में लाने की होनी चाहिए और सिर्फ बातें नहीं कोशिशें और काम होने चाहिए....कभी संपत्ति में अधिकार की बात हो तो दिक्कत हो जाए, वो हक के लिए आवाज़ उठाये तो बुरी हो जाए...एक बेचारे बेसहारा को तरस खाकर जितना दिया जाए वो उसी में खुश रहे- कुछ ऐसी ही सोच है इस व्यवस्था की...वो ढंकी रहे और सिर्फ तब दिखे जब आप देखना चाहें, तब नहीं जब वो दुनिया देखना चाहे...अपने हिसाब से...धूप में तपना चाहे, बारिश में भीगना चाहे...बाहें फैलाए और भर ले भीगी मिट्टी की खुशबू अपने भीतर...आप सोच भी कैसे पाते हैं कि आप दूसरे के जीवन को कंट्रोल करें...आप तय करें उसके लिए...और धर्म को सबसे बड़ा हथियार बना लें...नहीं बनना वो कमसिन हूर परी...हमें क्या बनना है ये हम तय करेंगे...न तुम न तुम्हारा धर्म...जिस धर्म में बराबरी न हो...जिसकी पहचान जालीदार टोपी, दाढ़ी मूंछ, बुर्के, तिलक, और चार मंत्रो तक हो, हम उसे खारिज कर देंगी...जाओ कर लो शिकायत उस ख़ुदा और भगवान् से जिसे तुमने मंदिर के घंटों, मूर्तियों, और मस्जिद की सीढ़ियों तक सीमित कर दिया है...तुम्हारा ईश्वर फ़र्क है        

तुम दस लड़कियों से सम्बन्ध बनाओ तो कुछ नहीं पर अगर लड़की के एक से ज्यादा सम्बन्ध रहे तो उसका चरित्र खराब...इस तरह की और तमाम सारी बातें हैं जो तुम्हारे व्यवहार और तुम्हारी सोच के साथ साथ इस व्यवस्था की चालाकियों का खुलासा करती हैं...तभी तो कल तक बेहद अक्लमंद लगने वाली लड़की रंडी या रंडी की औलाद हो जाती है...जिसे आपने रंडी कहा उसके साथ जुड़ने वाले मर्दों या उसके रंडी होने का कारण बनने वाले मर्दों को आप क्या कहते हैं...बाप दादा भाई की यौनिकता पर हमले वाली गालियाँ क्यूँ नहीं...उनके लिए नामर्द होना गाली है...हमे हर वो शास्त्र और साहित्य जलाना है जो बराबरी को कहीं भी किसी भी रूप में रोकता है, गलत बताता है...और जिस योनि को गालियाँ देते हो, याद रखो तुम्हारा वो अंग जिस पर इतना गुरूर है तुम्हे वो क्या तुम भी इस दुनिया में न होते अगर ये योनि न होती...व्यवस्था गलत है, उसका विरोध करो...जहाँ गलत है, वहां विरोध करो...सही गलत को सहूलियत के हिसाब से नहीं चुना जाता...गर तुम ऐसे स्वार्थी हो तो दूसरों को किस मुंह से गलत कहते हो, उनके दमनकारी व्यवहार के ख़िलाफ़ क्यूँ बोलते हो...खुद के भीतर झांको और खुद को जवाब दो हम तो असलियत देख चुकीं....आखिरी बात...तुम्हारे कहने से आज तक न हम देवी हुईं न हमारे क़दमों में जन्नत आई...तो भैये तुम्हारे कहने से रंडी भी न होने की....तुम खुद को संभालो तुम्हारे लिए वही बड़ा काम है.