शुक्रवार, 14 अगस्त 2015

कभी न भूलती वो एक जोड़ा कजरारी आंखें


अपनी लाडली संग नानी
चौक में लगे नीम के नीचे चारपाई पर बैठी बड़े ही विस्मय और कौतुहल से मैं उसकी कजरारी आँखें देखती और मन में सोचती कि नानी ने कितना सुन्दर काजल लगाया है इसके...सुबह सुबह ही लगा देती हैं क्या कि कभी देखा ही नहीं...फिर फुदकते हुए नानी के पास पहुँचती और पूछती कि गाय के काजल उन्होंने लगाया क्या...वो बालमन के सवाल पर हंस देतीं और मेरे आगे के सवालों से बचने के लिए कह देती हाँ....पर इससे तो और सवाल उपज जाते...कब लगाती हो, कैसे लगाती हो, रोज़ लगाती हो, सब लोग अपनी अपनी गाय के लगाते हैं, इससे क्या होता है...ऐसी झड़ी कि नानी खीझ जातीं...मैं वापस चारपाई पर आती और फिर उतने ही ध्यान से उन बड़ी बड़ी सुन्दर कजरारी आँखों को निहारने लगतीउसकी पूँछ के काले सफ़ेद बाल देख नानी को बताती कि देखो ये बुड्ढी हो रही है...

फिर कुछ समय बाद एक बछिया हुई....सफ़ेद, छोटी सी, छोटा सा मुंह, छोटे छोटे खुर और नन्ही सी पूंछ...वो गाय के आगे पीछे घूमा करती...और मैं उसके आगे पीछे...ऐसे मचल उठी थी मैं उसे देखकर...कित्ती प्यारी है ये....अरे इसकी आँखों पर भी काजल लगा है और ये तो गाय से भी ज़्यादा सुन्दर है...अपनी नन्ही मुट्ठियों में भर कर मैं बार बार उसको चारा देती...नानी से कहती उसे प्यास लगी होगी चलो पानी पिलाते हैं...बचपन में काम करने का कुछ ज़्यादा ही चाव होता है..बड़े लोगों जैसा....मेरे लिए एक छोटी बाल्टी रख दी गयी थी...तो बस उसमे भर कर बछिया के लिए पानी लाना...इस घर में अब एक नयी दोस्त आ गयी थी और अब मुझे बाहर जाने की ज़रूरत नहीं थी...मैं सबको चहक चहक कर बताती कि पता है हमारे घर में सुन्दर सी बछिया आई है...अब भला गाँव के बच्चों के लिए इसमें क्या नया था...वो मेरी नादानी पर हंस देते और मैं मुंह बना लेती...हाँ मामी लोग मेरी ही तरह चहक कर पूछतीं...अच्छा क्या सच में?? कब आई? कैसी दिखती है? हमें भी दिखाओगी? और बस मेरी ख़ुशी का ठिकाना नहीं...   

जो काम नानी करती वो मुझे भी करना होता....मैं कोई छोटी बच्ची थोड़े ही न थी...पानी लाया जाता तो एक छोटी बाल्टी मेरी, चारे का गट्ठा (बिठुग) होता तो एक छोटी बिठ्गी मेरी, तसले में गोबर उठता तो छोटा तसला मेरा भी होता, चौक की लिपाई होती तो नन्हे नन्हे हाथ भी गीली मिट्टी और गोबर संग फिसल रहे होते और रात को रोटियाँ सिकतीं तो छोटी छोटी टेढ़ी मेढ़ी रोटियां मैं भी बनाती...नानी गाय के लिए बनाती तो मैं बछिया के लिए...वो बर्तन धोतीं तो मैं धुले बर्तन अन्दर रखती...बस फिर खाट में उनसे चिपके, तारों, जुगनुओं को निहारते और नानी की कहानियां, लोरियां सुनते सो जाती...

जब बड़ी हुई तो बछिया एक बड़ी तंदुरुस्त गाय में तब्दील हो चुकी थी, ये बड़े बड़े सींग, सबको मारने को आती, उसे बस मेरी नानी ही खिला पिला सकती थीं या एक से दूसरे खूंटे में बाँध सकती थीं...हाँ लाठी लेकर नानाजी भी ये काम कर लेते थे...जब नानी दूध दोने को बैठतीं तो कई बार वो इधर उधर करने लगती...तो पहले उसे डांट पड़ती.... “गौड़ी...देख ले हां”...वो मज़े लेती और तब भी न सुनती तो नानाजी लाठी लेकर खड़े हो जाते...उसके बाद वो एकदम शरीफ बच्चे की तरह सीधी रहती.. बचपन में मैं ये प्रक्रिया बड़े ध्यान से देखती थी और वो दूध के ऊपर उठता झाग देखकर कितना खुश होती थी...गुड़ के साथ गरम दूध मिलता था, गुड़ वाली खीर बनती थी, छांछ, मक्खन, गरम गरम घी और घी के बाद बचा वो सुनहरे रंग का महियर...चीनी मिलाकर खाने में क्या तो स्वादिष्ट लगता था..रोटी के अंदर रोल बनाकर...वाह..जैसे अभी अभी जैसे जीभ में स्वाद घुल गया हो...

ये गाय बड़ी नखरीली थी...या यूँ कहें कि नानी ने नखरे उठाये तो वो ऐसी होती गयी...ऐसी लाडली...ज़रा देर धूप न लगे, ज़रा बौछार पड़ी नहीं कि गौशाला में बाँध दो, हैण्ड पंप का पानी पिलाओ, किसी का जूठा नहीं...उसकी अपनी बछिया का भी नहीं...सिर से मारकर गिरा देती थी बाल्टी....सारे गाँव के गाय भैंस नहर जाते पानी पीने और इनके लिए बूढ़े नानी नाना हैंडपंप से पानी लाते, ताज़ा चारा, दाल चावल रोटी सब्जी, आटा गुड़...सब चाहिए होता था...गुड़ तो अलग से इनके लिए बनवाया जाता था...कई बार नानी उसके बगल में बैठी बतियाया करती, उसे ज़रा सहलातीं तो वो गर्दन को लम्बा कर आगे बढ़ा देती और आँखें मूँद लेती...नानी बातें करती और उसे सहलाती रहती...वो आँख मूंदे तसल्ली से सब सुना करती...

मेरी मां और इस गाय में शिकायत भरा रिश्ता रहा...जैसा दो बहनों में होता है न..कि मां तुम मुझसे ज़्यादा प्यार उसे करती हो...बिलकुल वैसा...होना लाज़मी भी था...मेरी नानी कभी हमारे पास यहाँ रहने नहीं आयीं क्यूंकि गाय थी, कभी आराम नहीं करती थीं, क्यूंकि गाय की सेवा करनी होती थी...पिछले साल ही जब दोपहर को उनके बगल लेटी थी तो वो कह ही रही थीं...“मि त रात दिन बुलुद कि म्यार रैंदी रैंद चल जांद न ये त मि अपर समण खड्या दीन्द...ये गौड़ थे कैल नि रखण...पाणी भि नि दीण”...उन्हें रात दिन ये ही फ़िक्र सताती थी कि उनके बाद इस गाय का क्या होगा...एक बार दोनों बिछड़े थे तो दोनों ने खाना पीना छोड़ दिया था...गाय को कोई कुछ कह देता तो बढ़िया वाली फटकार मिलती...मेरी नानी का जीवन पूरी तरह से गाय और नानाजी के इर्द गिर्द था...गाय उन्हें उनके ब्याह के गौदान में मिली बछिया की पीढ़ी थी...तो 70-71 सालों का साथ था इस पीढ़ी के साथ...फिर तो ये लाड़ दुलार भी लाज़मी था और अपनी जगह मेरी मां की शिकायतें भी..

पर क्या खूब साथ प्यार और साथ निभाया तुम तीनों ने...नाना गए तो हम लोगों की तमाम कोशिशों के बाद भी तुम नहीं रुकी और आहिस्ता से हाथ छुड़ाकर यूं गयी कि आज भी तुम्हारी ठंडी हथेलियों का अहसास बिलकुल ताज़ा है मेरे हाथों में मेरे ज़हन में...अभी जैसे कल की ही बात हो कि तुम मेरी गोद में थी...बचपन से लेकर बड़े होने तक का फ्लैशबैक है कि थमता ही नहीं...इतना ताज़ा कि यहाँ कुछ ब्लैक एंड व्हाइट नहीं...सब एकदम साफ़ रंगीन...तुम्हारी तस्वीर पर उँगलियाँ फेरते वक़्त आज भी आँखें और दिल भर आता है और एक सिहरन सी दौड़ जाती है उँगलियों के रास्ते पूरे जिस्म में...नाना को गए तीन महीने हो गए और तुम्हे होने वाले हैं...जाने यकीन क्यूँ नहीं होता...जब तुम गयी थी तब ही लोग कहने लगे थे अब ये गाय न रह पाएगी....कैसी खामोश हो गयी थी वो...उसकी खामोशी देख रोना आने लगता था...कल तक जो किसी को पास फटकने नहीं देती थी आज उसे कोई भी बाँध ले रहा था, खिला ले रहा था....वो सब समझ गयी थी...मां की चिंताएं अब अलग हो गयी थीं कि कैसे रह पाएगी गाय उनके बिना...वो ये सोच सोचकर रो देतीं...पड़ोसियों ने पहल की और अपने यहां ले गए...मां पापा को आये 10 दिन ही तो हुए थे कि पापा लौट गए थे वहां...उसी दिन उसकी तबियत बिगड़ गयी थी...और ऐसी बिगड़ी कि सुधरी नहीं..मानो इंतज़ार कर रही हो अपनों का...खाना पीना छोड़ा तो कमज़ोर हो गयी...गिर गयी तो घाव हो गए...पापा अपने घर ले आये थे...महीने भर से रात दिन सेवा करते...थोड़ा थोड़ा करके खिलाते पिलाते रहते...दवाइयां करते, चोटों पर मरहम लगाते, अब कुछ दिन से छोटे बच्चों की तरह बोतल से पानी पिलाने लगे थे...वो उठ नहीं पाती तो बगल वाले मामाजी की मदद से उसको खिसकाकर उसके नीचे का पुआल बदलवाते...बारिश ऐसी कि रुकने का नाम न ले...खेतों में मेढ़ें टूट गयीं...बारिश ने दिक्क़तें और बढ़ा दीं...वो फैल कर लेट गयी थी इसके लिए गौशाला घुटन भरी हो जाती...बाहर ही शेड बनाया गया...5 दिनों से खाना पीना बंद कर दिया था...एक दिन थके हारे पापा अपने लिए चाय बनाकर लाये और साथ में रस्क...जाने क्या दिमाग में आया कि क्या पता गाय भी खा ले...एक दिया तो उसने खा लिया...बेचारे बगल से फ़ौरन एक पैकेट खरीद कर लाये...उसे खिलाया बोतल से पानी पिलाया तब ख़ुद चाय पी...अब पापा के रात दिन उसके इर्द गिर्द होते...वो कहते मां ने जीवन भर इतनी सेवा की है...इतना लाड़ प्यार से पाला है ऐसे कैसे छोड़ दें...गाय की जगह इंसान होती तो क्या छोड़ देते...परिवार की सदस्य है ये भी...जाने क्या चलता रहता था दिमाग में कि गर्दन लम्बी कर लेटकर सारा वक़्त रसोई की तरफ़ ताका करती...मन बांवरा होता है जैसे सब कुछ जानते हुए मैं उम्मीद पाले बैठी थी कि तुम बोल पड़ोगी, लौट आओगी...वो तो फिर मुझसे कहीं बढ़कर थी...वो तुम्हारी राह तकती रहती कि तुम अभी रसोई से निकलो और फिर उसे सहलाओ...तुम न आयीं और तुम्हारी बाट देखते देखते वो ही तुम्हारे पास चली गयी...कल की रात उसकी हम इंसानों के बीच आख़िरी रात थी.

मैं कभी तुम तीनों की एक दूसरे के बिना कल्पना नहीं कर पाती थी...कैसे करती कभी अलग अलग देखा ही नहीं था...दीदी की शादी में तुम आई थी और विदाई होते ही रट पकड़ ली थी लौटने की....ऐसा जुड़ाव एक दुसरे से कि अलग रह ही नहीं पाते थे....मुझे खूब याद है घास के गट्ठे लिए अभी हम दूर होते थे...पर जाने ये गाय कैसे जान जाती थी कि पुकारना शुरू कर देती थी...हम लोगों तक उसकी आवाज़ पहुँचने लगती...उस घर में तुम्हारे और नाना के बाद परिवार की वो ही एक सदस्य रह गयी थी जिसमें मैं तुम्हारी कल्पना करती...पर भला वो भी इस सदमे और बिछोह को कैसे सहती...मैं जब जब उसके कष्ट के बारे में सोचती थी तो आँखें भर जातीं...पर आज सुबह फ़ोन पर जब उसके जाने की ख़बर मिली तो दिल धक् से हो गया...जैसे एक पल को सब रुक गया हो....हम इसे भी नहीं रोक पाए...बचपन की यादों की जिस किताब को सीने से चिपकाए रहती हूँ...उसके पन्ने ये कैसी कैसी कहानियाँ समेटते जा रहे हैं...मैं इसे और कसके थाम लेती हूँ...कि कोई पल न बिखरे....अलविदा मेरी एक और साथी....याद आ रही है बचपन की वो दुपहर...छोटी बाल्टी में मेरा तुम्हारे लिए पानी लाना...नन्ही हथेलियों में चारा बटोर लाना...फिर खाट पर बैठना और विस्मय से तुम्हारी कजरारी आंखें निहारना...नानी तुम कितना अच्छा काजल लगाती हो!!              


मंगलवार, 9 जून 2015

क्यूंकि... तू नहीं थी तेरे साथ एक दुनिया थी...

1

“उठ ल्यो रे अफार लोग कबती पूड़ों म चल गीं” (उठ लो रे, वो देखो लोग कब का खेतों में चले गए)....नानी के यहां की सुबह अक्सर इसी डांट से होती...हम लोग अलसाए करवट बदलते हुए कहते कि उन्हें तो खेत में जाना है हम भला क्यूँ जल्दी उठें...और फिर सो जाते...ये अलग बात है कि इतनी चहल पहल में नींद फिर आना मुमकिन नहीं होता था....अन्दर से उठकर आते और बाहर अलसाकर मोढ़े में बैठ जाते...जहां से अपनी वो दुबली पतली छोटी सी नानी कुछ न कुछ काम करती दिखती रहती...अगर बाहर सोये होते तब तो उजाला अपने आप सुबह उठा देता था....नानी हर मौसम में ठीक चार बजे उठ जाती थीं....उधर गुरुद्वारे में गुरबानी शुरू होती इधर नानी बिस्तर छोड़ देतीं....मैं पिछले 32 सालों से ये ही क्रम देख रही थी...वो उठतीं...चाय बनातीं, पीतीं, पूरे आँगन में झाड़ू मारतीं, कूड़ा जलातीं, गाय का गोबर उठातीं, उसे चारा डालतीं और फिर चाय की केतली दुबारा चूल्हे पर चढ़ जाती...चाय की ऐसी शौक़ीन कि क्या कहिये...मेरे ननिहाल में नाश्ते में लोग रोटी सब्ज़ी या चाय रोटी जैसा कुछ खाकर खेतों पर निकल जाते हैं...नानी भी रोटी खातीं...चूल्हे पर दाल चढ़ातीं, गाय को छांव वाले खूंटे पर बांधतीं, दरांत उठातीं और मुंडेड़ा बांधे खेत के लिए निकल पड़तीं. 

मैं भी उनके साथ जाती थी...हमारे लिए ये घूमना भी होता था और इसका चाव भी बहुत होता...छोटी नहर के बगल बगल उनके साथ साथ चलती...उचक कर नहर देखती तो नानी डांटतीं...बड़ी नहर के ऊपर वाला संकरा पुल पार करते...मैं तो डरते डरते करती...नानी आराम से...और उसके बाद आगे फिर छोटी नहर के बगल बगल खेतों से होते हुए अपने खेत पहुँचते....नानी अपना मुंडेड़ा कसतीं और चरी के बीच जाने कहां गायब हो जातीं... 

मैं खेत में इधर उधर फुदका करती... ढों के पेड़ के नीचे बैठ जाती...ननि ननि करती उन्हें ढूंढती फिर उनके पीछे पीछे रहती...वो चारा थोड़ा थोड़ा काटकर आगे बढती रहतीं और मैं अपनी नन्ही हथेलियों से उन छोटी छोटी गड्डियों को एक जगह पर इकठ्ठा करती जिसका बाद में बड़ा गट्ठा बनाया जाता...नानी एक छोटा गट्ठा मेरे लिए भी बनातीं...जब ज़रा बड़ी हुई तो ख़ुद ही काट लेती थी...

बचपन में लौटते में कभी बोरिंग तो कभी नहर में नहाकर आती...घर आकर मशीन में कुटी (चारा) कटवाती...वैसे आमतौर पर ये काम शाम को होता था...जब मशीन में चारा ज़्यादा लग जाता तो एक तरफ नानाजी और एक तरफ मैं पकड़कर मशीन चलाते...बाद में नानाजी नहीं कर पाते थे...जिन दिनों नानी अस्पताल में भर्ती थीं गाँव के लोग कहते थे कि इतने समय में तो जाने कितना गन्ना छील देतीं...मैं अपनी नानी की कार्यक्षमता देखकर हैरान रह जाया करती थी...

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इस घर को पहली बार बिना नानी के देख रही हूँ...पहली बार यहाँ ताला लगा देखा है...दिल धक् से बैठ गया...कुछ वैसा मानो आप कई दिनों बाद अपने घर लौटें और घर का सब कुछ चोरी हो गया हो...मन अभी भी नहीं मान रहा कि नानी अब हमारे बीच नहीं हैं...घर के कोने कोने में तलाश रही हूँ और हर एक शय से वो झांकती दिख रही हैं...कभी लगता है पीछे के आँगन में चरी काटती होंगी...कभी लगता है अभी छन्नी (गौशाला) से भूसे का टोकरा उठाये निकलेंगी...लगता है कभी रसोई में शाम की चाय बना रही होंगी और अगर कहीं भी नहीं दिख रहीं तो खेत से अभी लौटती होंगी...उनकी गाय मायूस सी खामोश लेती है...उसे सब पता है...उसे पालनेवाली उसे इतने दिनों से नहीं दिखी...जिस गाय के दूर दूर तक कोई नहीं फटकता था अब वो किसी को नहीं मारती...कोई भी चारा डाल ले रहा है पानी पिला ले रहा है, दूसरे खूंटे में बाँध दे रहा है...इन जीवों के पास हमारी भाषा नहीं पर संवेदनशीलता, भावनाओं, प्रेम और रिश्तों को निभाने में इनका कोई सानी नहीं...

कहां कहां तलाशूँ तुम्हे नानी...ख़ुद तुम नहीं जानती थी अचानक ऐसा कुछ होने वाला है...बरसात के मौसम की पूरी तैयारियां कर रखी थी तुमने...लकड़ियाँ काट के सुखा रखी हैं...उपले बना रखे हैं...देखो तो उनसे भी तुम्हारी उँगलियों के निशान कैसे झांकते हैं...कितना सारा प्याज़ हुआ तुम्हारी क्यारियों में इस बार, लहसुन भी और सब बता रहे थे कि थैले भर भर के तुमने बैंगन भी बांटे  थे...

आज सुबह सुबह उठी तो पहली बार तुम मुझे नहीं दिखी...गुरबानी भी आज नहीं भा रही थी...पहले तो जैसे ही सुबह उठकर करवट बदलती थी जाली वाली खिड़की के पार या तो तुम मुझे चाय पीती दिख जातीं या अपनी गाय से जुड़ा कोई काम करते...आज दिख ही नहीं रही थी...मैं रो पड़ी...तुम्हे ऐसे नहीं जाना था….

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बीती बातें कैसे याद आती हैं...कुछ दिन पहले तक तुम मेरे साथ थी...पिछली बार जब यहाँ से लौटी थी तो लिपट के किस कदर रोये थे...नाना का जाना एक बड़ा सदमा था...मैं समझाने की एक नाकाम कोशिश भर ही कर सकती थी...तुमसे वादा किया था कि जल्दी आउंगी...अपना ध्यान रखना...मैं तो जल्दी आ गयी पर तुमने वादा कैसे तोड़ दिया...नहीं पता था कि अगली बार तुम्हें यूँ बिस्तर पर पड़े, ज़िन्दगी मौत के बीच जूझते देखूंगी...किस क़दर कमज़ोर हो चुकी थी तुम...पीली पड़ती जा रही थी...बल्कि उस दिन भी ये तो पता था कि तुम बीमार हो पर मैं पूरी तरह आश्वस्त थी कि तुम ठीक हो जाओगी और घर साथ लौटोगी....उस एक हफ़्ते तुम्हारे सिरहाने बैठे, तुम्हारा हाथ थामे, तुम्हारा सिर सहलाते यादों वो 32 साल मेरी आँखों के आगे से गुज़र रहे थे...तुम्हारा यदा कदा बातें करना या फिर गुस्साना भी मन को मज़बूती दे रहा था कि तुम ठीक हो रही हो...उस दिन जब तुम बैठ पायी थी तो जी कैसा ख़ुश हो गया था...लगा था कि बस दो चार दिन और फिर तुम घर पर होगी हमारे साथ.....तुम्हारी वो बच्चों जैसी बातें हिम्मत बाँध रही थीं...पर जाने अचानक ये क्या होता गया...तुम्हारा कराहना, तुम्हारा दर्द से तड़प जाना भीतर तक तोड़ दे रहा था...ज़रा आराम मिलता तो फिर तुम इशारों में जवाब देती...तुम्हारा बोलना इशारों तक सीमित हो गया था...मैं तिल तिल टूट रही थी पर जैसे लग रहा था तुम्हें जाने नहीं दूंगी...किस कदर डर गयी थी मैं कि लगता था एक पल के लिए भी पलकें न झपकाऊं...दर्द, थकान कुछ नहीं था बस ये लग रहा था किसी तरह तुम दुबारा उठ खड़ी हो....मैं इतनी कमज़ोर कभी नहीं हुई और सच कहूँ तो इससे पहले कभी ख़ुद मुझे भी ये अहसास नहीं हुआ था कि मैं तुम्हें इतना ज्यादा प्यार करती हूँ....मैं तुम्हारा हाथ कसके थामे हुए थी...तुम्हे एकटक देख रही थी न...फिर तुम कब और कैसे चली गयी कि मुझे खबर तक नहीं हुई....कैसे टटोल रही थी मैं तुम्हारी उंगलियाँ कि शायद कुछ हरकत हो जाए...शायद दर्द से ही सही तुम एक बार कुछ कहो और ये सारे के सारे लोग झूठे साबित हो जाएँ....तुमसे लिपटी तुम्हारा हाथ थामे मैं तुम्हे पुकार रही थी पर तुम कोई जवाब ही नहीं दे रही थी...ये सब लोग जब तक तुम्हे ले नहीं गए मुझे लगा तुम कुछ तो बोल पड़ोगी....इंसान प्यार में कैसा हो जाता है नानी...मैं तुम्हारे होने की उम्मीद अब भी पाले हुए थी जबकि तुम तो कहीं दूर जा चुकी थी...


तुम्हारी उन खुरदुरी हथेलियों का का स्पर्श अभी तक ज्यूं का त्यूं है...गांव के हर व्यक्ति के पास कितने किस्से हैं सुनाने को...और मैं सब कुछ सुनती हुई अपनी कल्पनाओं में उन किस्सों को जीवंत देखती जा रही हूँ....जब इन लोगों को यकीन नहीं हो रहा तो मुझे भला कैसे होता...हर एक सामान को छू छूकर उसमें तुम्हारा स्पर्श ढूंढ रही हूँ...आज तुम नहीं पर तुम्हारी खटिया, गद्दी में तुम्हारी खुश्बू लपेटे लेटी हूँ....रात आसमान के तारों को ताकती तुम्हारी लोरी याद कर रही हूँ...डेगची को छूकर तुम्हारे हाथ की दाल का स्वाद मुंह में घोल रही हूँ...कैसी ज़िद रहती थी मेरी कि जब तक मैं यहाँ हूँ दाल तुम ही बनाओ....विस्मित होकर तुम्हें छांछ छोलते देखती थी तो ख़ुद भी करने की ज़िद करती थी और आख़िरकार वो हांडी फोड़ ही देती थी... तुम्हारे बक्से से सामान निकाल रही हूँ और उससे जुड़ी एक एक याद में खोती जा रही हूँ...तुम्हारी धोतियाँ...ये नीली वाली कितने चाव से भिजवाई थी मैंने कि तुम पर कितनी अच्छी लगेगी...बचपन में कितने ध्यान से देखती थी कि ये गत्ती धोती तुम बांधती कैसे हो...छोटी सी काया वाली मेरी नानी..घर के चप्पे चप्पे, एक एक चीज़, दर ओ दीवार...छत और आँगन...पेड़ पौधे...चूल्हा चिमटा, डोलची फुकनी, उपले लकड़ी, अनाज फल, मिट्टी के ज़र्रे से लेकर पेड़ों की छांव और हवा के बहाव में तुम खुश्बू बनी बह रही हो...तुम्हारी गाय...कितना लड़ती थी तुम सबसे इसके लिए...कितने लाड़ से पाला इसे और इसके पुरखों को तुमने...सब छूट गया न..आकर देखो ज़रा किस कदर उदास हो चली है ये...खाना पीना सब कुछ छूटा...वो किसी तरह जी रही है क्यूंकि समझ गयी है कि उसकी वो मां नहीं है अब...मां बाप छूटे और अब तो उसका वो घर आंगन भी छूटा...

सिर्फ़ एक बात जिसका अफ़सोस हमेशा रहेगा कि तुमने आराम का एक दिन भी नहीं देखा...13 साल की उम्र में इस घर में ब्याह के आई तुम बच्ची ही तो थी...सारा जीवन घर के कामों में...नाना की...गाय की, सेवा में...खेती बाड़ी में लगा दिया...कितना थक गयी होगी तुम....कैसे कहते हैं ये लोग कि अँधेरे ही खेतों में पहुँच जाती और दिन ढले ही लौटती...कुछ तो नहीं देखा तुमने...कहीं भी नहीं गयी और...एक दिन मजबूरी में बैंक गयी तो लोगों की भीड़ देख कितना असहज हो गयी थी...मामाजी बता रहे थे कैसे डांटा था तुमने उनको...तुम्हें थोड़ा तो आराम मिलता...ऐसी ही छोटी सी ख्वाहिश भी थी तुम्हारी कि कुछ दिन तुम हम सब के साथ बिता सको...पर हम लोग कुछ कर ही न सके...समझ ही नहीं पाती कि मां को अब क्या समझाऊं और कैसे समझाऊं   

मैं लौटते लौटते तक उन क्यारियों, घर के कोनों में तुम्हे तलाश रही थी...तुम होती तो ख़ुश होती कि ये लमडेर बच्चे आज कितनी सुबह उठकर तैयार हो चुके हैं....तुम हमें तब तक देखती रहती थी जब तक हम लोग आँखों से ओझल नहीं हो जाते थे पर आज तुम यूँ ओझल हुई कि ढूंढें नहीं मिल रही....नहीं पता था जिसका हाथ इतने दिन कसके थामे हुई थी वो साथ छोड़कर यूँ जायेगी...दीवार पर तुम्हारी तस्वीर लगता है अभी बोल पड़ेगी...उसपर उंगलियाँ फेरती हूँ तो मन भर आता है...रोक ही नहीं पाती...मेरे पास कितना कुछ है याद करने को...वो पल याद करते हुए मैं आज भी तुम्हारे साथ ही जी रही हूँ...तुम्हे छेड़ रही हूँ, तुम्हारे साथ हंस रही हूँ, तुमसे लिपट कर सो रही हूँ...काश तुम्हें जाने से रोक पाती...काश कुछ और वक़्त साथ बिता पाती...पर यहीं आकर हम लाचार होते हैं...और यहीं आकर हम समझ पाते हैं कि अपनी लापरवाहियों के चलते क्या कुछ खो दिया हमने...अब तुम मेरे भीतर हो नानी और हमेशा हमेशा रहोगी...बस एक बार कसके तुम्हारे गले लगने का दिल कर रहा है....   



(शीर्षक फ़राज़ साहब से माफ़ी के साथ)

सोमवार, 11 मई 2015

यादों की दीवार पर टंगी मुस्कुराती वो तस्वीर...


मेरे नानाजी को रोटी और जैम बहुत पसंद था....मुझे याद नहीं पिछले कितने सालों से उनका रात का भोजन ये ही था...सब्जियां उन्हें नापसंद थीं...सब्ज़ी रोटी लेकर जाने पर फ़ौरन कह देते मुझे भूख नहीं है...मनाया जाता, डांटा जाता कि कुछ तो खा लीजिये...नहीं मानते...बड़ी मान मुनौव्वल के बाद जैम रोटी पर राज़ी होते थे...उनकी रोज़ की न न पर मेरी नानी झुंझला जाया करती थीं...और दोनों में बराबर के झगड़े होते...

पिछले साल इन्ही दिनों मैं अपने ननिहाल में थी...अपना बचपन दुबारा जी कर आई थी...ख़ुद से ये कहा था कि अब यहाँ जल्दी जल्दी आया करूंगी...यूँ सालों में नहीं...पर हम आजकल के लोग....रिश्तों को निभाने में बहुत पिछड़े होते हैं...अपने शहर में पैर पड़ते ही हमारी प्राथमिकताएं फिर बदल जाती हैं, दफ़्तर, मीटिंग, असाइनमेंट, घर, यहाँ वहां और दुनिया जहान के काम...एक एक पायदान करके ख़ुद से किया वो वादा फिर नीचे खिसकता जाता है...हम कुछ दिनों बाद जायेंगे का कह कह कर अपने आपको जवाब देकर बचना चाहते हैं और एक दिन पता चलता है कि इन बहानों ने वो दूरी खींची जो कभी पाटी नहीं जा सकेगी और वो अफ़सोस जो दिल से कभी नहीं निकलेगा.. 
  
मैं आज किसी बेहद क़रीबी और बेहद अपने को खोकर आई हूँ....भारी मन, तकलीफ़, दुःख और अफ़सोस के साथ...मेरी आंखों के आगे जैसे ज़िन्दगी की तस्वीर का एक फ्रेम टूटकर गिरा हो...हर टुकड़े से एक याद एक क़िस्सा झांक रहा है और मैं उन बिखरे टुकड़ों को कहीं कहीं समेटती चल रही हूँ....मेरे नानाजी हम सब से बहुत दूर जा चुके हैं  

बचपन से अपने नानाजी को देखती थी..वो एक बुज़ुर्ग थे और धीरे धीरे कुछ कुछ काम करते रहते...पर बहुत सक्रिय नहीं होते थे...गाँव के बाक़ी लोग बताते हैं कि वो एक ज़बरदस्त किसान थे...बहुत कर्मठ...मिट्टी फेंकें तो कहो ज़मीन सोना उगले...उनके चचेरे भाई बताते थे कि भाई जी के बैल थक जाते थे पर वो न बैठते थे....गली से जब निकलते तो जो बच्चा बाहर दिखता उसे स्कूल छोड़ आते...जिसको पैसे की तंगी होती उसकी फ़ीस जमा कर आते...सारे लोग डरते...वो सबके बाडाजी (ताऊजी) थे. न ख़ुद ख़ाली बैठते न किसी को बैठने देते...पर उसके बाद उन्हें न्यूरो की कुछ दिक्क़त हुई...कहते हैं दिमाग़ की कोई नस सूख गयी...ऑपरेशन हुआ पर उसके बाद वो पहले जैसे सक्रिय न रह सके...झड़ से गए....ये उन दिनों की बात है जब मैं बिलकुल अबोध थी...इसलिए मैंने नानाजी को खेती करते नहीं देखा...नानी के कामों में मदद कर दिया करते...गाय को पानी पिला देना...नानी के साथ मशीन में कुटी (चारा) कटवाना, गाय को अलग अलग खूंटों पर बाँध देना...बाज़ार से सब्ज़ी-फल ला देना वगैरह...मेरी नानी के घर पर हैंडपंप नहीं था...पड़ोस से पानी लाना होता था...एक अजीब सी समझ थी ये कि एक अगर पानी ला रहा होता था और जैसे ही वो घर के पास पहुँचता दिखता तो दूसरा फ़ौरन उसका बोझ हल्का करने पहुँचता और वहां से आगे एक बाल्टी ख़ुद लेकर आता...और हाँ बिना नागा नानी नाना का एक दुसरे से नोक झोंक करना. वक़्त के साथ साथ एक एक करके इन सब कामों की संख्या कम होती चली गयी और अब पिछले कुछ समय से उन्हें आँगन पार करने के लिए भी सहारे की ज़रुरत पड़ती...उनकी उम्र उनसे उनकी ताक़त छीनती जा रही थी...और अब तो वो बात भी बहुत धीमी आवाज़ में करते थे

नानाजी हमेशा मुस्कुराते रहते...मैं उनसे बहुत लडती थी उन्हें डांटती थी...तो वो कई बार मां से कहते इसको मत लाया करो बहुत डांटती है....उन्हें गुदगुदी लगती तो हम खूब परेशान करते...गाल नोचते, खूब छेड़ते...और वो हमें प्यार से डांटा करते...अभी पिछली बार ही मैंने उनसे कहा था “ननाजी सच सच बतयां तुम सबसे ज्यादा प्यार कैथे करदो”....तो नानाजी ने अपने चिरपरिचित अंदाज़ में जवाब ईमानदारी से दिया और कहा “बेटी सबसे ज्यादा प्यार त मि कैलाश थे ही करूद”...कैलाश मेरे भाई का नाम है जो कि भयानक तरीके से नानाजी का सिरचढ़ा रहा है...उसकी हर ग़लती माफ़...मैंने उनका जवाब सुनते ही कहा “अच्छा इन बात च हैं?” तो फिर हंसने लगे...उनके जवाब में मानो उनकी बेचारगी रही हो...

उस कमरे में घुसते ही दाहिनी तरफ़ उनकी चारपाई लगी होती...बाक़ी लोगों के बिस्तर समेट लिए जाते थे पर नानाजी का हमेशा लगा रहता...कमरे में घुसते ही हमें उनको देखने की आदत थी...पहुंचने की देर होती थी और में उन्हें छेड़ना शुरू कर देती...पर हाँ वो आइसक्रीम बर्फ़ वाला आता तो उसके लिए या फिर वो लालझीभ टॉफ़ी या ऊँगली में फंसाने वाले पापड़ के लिए भी पैसे नानाजी से ही लिए जाते...हाँ नानी का इमोशनल ब्लैकमेल भी खूब होता था. नानाजी समय के साथ साथ भावनात्मक रूप से भी कमज़ोर हो गए थे...हम लोगों को या किसी भी मेहमान को देखते ही मारे ख़ुशी के रोने लगते थे...     
   
बाहर आँगन में वो अपने मोढ़े पर बैठे होते...गन्ने के बड़े शौक़ीन...दांत एकदम दुरुस्त....नियम के भी पक्के...सुबह नहा धोकर और हर शाम हाथ मुंह धोकर प्रार्थना का नियम पक्का था...चाय कभी बिना बिस्कुट के नहीं पी...कुछ साल पहले तक बीड़ी पीते थे...और इसी बात पर मैं उनके लिए हमेशा विलेन बनी रहती...किसी को भी डपट देते पर वो गांव के सबसे बुज़ुर्ग लोगों में से थे और अपने वक़्त में सबकी इतनी मदद की थी कि आज पूरे गांव की अगली पीढ़ी उनके बच्चों की ज़िम्मेदारियाँ निभा रही थी...कोई कभी कुछ ख़ास बना लाता, कोई बाज़ार से फल सब्ज़ी या घर का बाक़ी सामान ले आता, गांव के डॉक्टर बेवजह डांट खाने के बाद भी मुस्कुराते रहते...नानाजी की तबियत बिगड़ने पर ईद के दिन अपने मेहमानों को बैठा छोड़ नानाजी को देखने पहुँच जाते.. 
   
रेडियो के कैसे तो शौक़ीन थे...उन्हें कुछ और नहीं चाहिए होता था...बस रेडियो की फ़रमाइश होती जिसमें उन्हें ख़बरें सुननी होतीं...यूँ तो उनकी याद्दाश्त धुंधला रही थी पर बुलेटिन उन्हें सारे याद रहते...नानाजी एकदम बच्चे सरीखे थे...जब उन्हें पता होता कि उनकी किसी बात या काम पर उन्हें डांट पड़ सकती है तो फ़ौरन मुकर जाते... “न बबा मिल नि कार” (न बच्चा मैंने नहीं किया)...’बबा’ बच्चे के लिए दुलार का शब्द हैं... “ननाजी झूठ बुना छो?”... “न बबा अछें भगवान जाणी” (न बच्चा सच में भगवान जनता है)...साथ में यूँ मुस्कुराते रहते कि कोई छोटा बच्चा भी समझ जाए कि वो काम नानाजी ने किया है...और उसके बाद हंस पड़ते..

मैंने नानाजी को उनके कर्मठ अवतार में कभी नहीं देखा बस गाँव वालों से किस्से सुने हैं...उन्होंने मुझे बड़ा होते और मैंने उन्हें वक़्त के साथ साथ और कमज़ोर होते देखा...उन्हें यूँ देखना तकलीफदेह होता था...पर हम सब अपने मन को समझाते कि ये बुढ़ापे का शरीर है...अब वो पहले जैसे कोई काम नहीं कर पाते थे...मेरी नानी ने इस लम्बे वक़्त में उनकी सेवा की...माँ पापा यहाँ आते जाते रहते थे...पापा ने सेवा में कभी कोई कोर कसर नहीं छोड़ी....पर नानाजी ख़ुद जानते थे कि जो काम उनकी जीवनसाथी कर रही है वो और वैसा कोई न कर पाए शायद...ये ही वजह थी कि पिछले दिनों जब नानी की तबियत बिगड़ी तो एक दिन नानाजी रात में दो बजे उठकर बैठ गए...मां ने पूछा क्या हो गया कोई परेशानी है...तो बोले इसे कुछ हो गया तो मैं क्या करूँगा और फिर मुझे कौन देखेगा...नानी नाना की ज़िन्दगी एक दूसरे के इर्द गिर्द थी...डांट फटकार नोंक झोंक झगड़े सब कुछ...इस बार देख के आई हूँ कि कैसा था वो रिश्ता कि एक के जाने पर दूसरे के लिए जीवन बेमानी हो चला है...

नानी कहती हैं अब मैं किससे बात करूंगी झगडा करूंगी हर वक़्त इस कमरे में एक साथ था...एक ठौर था...कुछ भी नहीं रहा सब ख़ाली हो गया...हम इसे सेवाभाव से अलग करके देखें तो शायद समझ सकें...नानी 13 साल की उम्र में ब्याह कर आई थी...नाना उस वक़्त 16 साल के थे...दोनों का ये साथ 71 साल का था...उनकी प्रतिक्रिया समझी जा सकती थी...जिस तरह नानाजी के मृत शरीर की वो उंगलियाँ सीधी कर रही थीं कि देखो कैसे ऐंठ रही हैं...दर्द होता होगा...या जैसे उनके चेहरे को सहलाती थीं तो कलेजा मुंह को आता था...ऐसी स्थिति में कुछ भी समझाना बुझाना बेमानी होता है...4 बजे गुरुद्वारे में गुरबानी बजते ही बोलीं चाय बनानी है हम दोनों का चाय का समय हो गया है....हम सब आज कुछ अलग क़िस्म के रिश्तों की दुनिया में जीते हैं...पर इन रिश्तों को समझने की कोशिश करें तो इनकी इज्ज़त करने लगेंगे...नानी ने बड़ी तकलीफें देखी जीवन में, झगड्तीं तो कहतीं कि परेशान कर दिया है...पर आज उनके चले जाने पर वो अपने जीवन की कल्पना ही नहीं कर पा रहीं...रात भर मैं उनके साथ बैठी रही...वो खाना पानी सब छोड़े बैठी थीं...किसी तरह खिलाया पिलाया...रात भर मुझे अपनी यादों की गलियों में साथ घुमाती रहीं...और मैं किस भावना से भरती जा रही थी उसके लिए मेरे पास शब्द नहीं हैं...

मुझे नाना नानी से मिलने जाना था...पर टालती जा रही थी क्यूंकि प्राथमिकताओं में ऊपर दफ़्तर और बाक़ी के काम काज आ गए थे...लगता था बस अगले हफ्ते पक्का चली जाउंगी...मैं ख़ुद अपनी नज़रों में शर्मिंदा होती और ख़ुद ही अपने को व्यस्त होने की दलील देती...शनिवार सुबह पौने पांच बजे जब नानी ने रोते हुए कहा कि नाना कुछ बोल नहीं रहे चले गए तो लगा ये कैसे मुमकिन है...अभी तो मुझे मिलने जाना था...वो एकदम ठीक थे कुछ नहीं हुआ था पर 5 मिनट के अन्दर ये सब...ऐसा कैसे हो सकता है...पूरा परिवार सब कुछ छोड़ छाड़ के चल पड़ा वहाँ...वहां मेरे नाना सचमुच अब मुझसे बात नहीं कर रहे थे...कुछ नहीं बोल रहे थे...न हंस रहे थे न रो रहे थे....वो अब जा चुके थे...

10 घंटे के उस रास्ते में मैं जाने क्या क्या याद करती रही...कितना कुछ है...इस फ्रेम के बिखरे टुकड़े समेटना मुमकिन नहीं...उनकी यादें पहाड़ों सी विशाल और समंदर सी गहरी हैं...कहां समेट सकूंगी...हम वक़्त बीतने के बाद ख़ाली घरों की दीवारों, बड़े आँगन, वहां के पेड़ों और बाकी निशानों से यादें बटोरते फिरते हैं लेकिन जब सही वक़्त होता है तब हम व्यस्त होते हैं....ये नहीं सोचते किसी को हमारा इंतज़ार है...आंखों की रौशनी के साथ न देने पर भी कुछ लोग हैं जिनकी आँखें हमारी राह देखती हैं...हमसे बात करना चाहती हैं, कुछ वक़्त बिताना चाहती हैं, आज भी हमारे नखरे उठाना चाहती हैं...      

हम सबके यूँ हर काम को अचानक छोड़ कर चले आने से हमारी निजी जिंदगियों में कुछ नहीं बिगड़ा...कहीं कोई काम नहीं रुका...तो क्यूँ मैं पहले नहीं आ गयी...क्यूँ नहीं समझा कि ये पल दुबारा नहीं मिलेंगे...ये साथ कब तक के हों पता नहीं...एक न एक दिन सब बिछड़ जायेंगे तो क्यूँ न आज इन रिश्तों का हाथ मजबूती से थाम कर चलें...क्यूं न उनके जीवन का ख़ालीपन मुस्कुराहटों से भरते रहा करें जिनकी गोद में जाने क्या क्या शैतानियाँ कीं, कितनी तकलीफें दीं, कैसी कैसी मांगें कर दीं...और जिन्होंने हमेशा मुस्कुराकर मजबूती से थामे रखा...बहुत छोटी छोटी बातें हैं पर यकीन मानिए बहुत ज़रूरी हैं...प्राथमिकताओं की लिस्ट में संशोधन बहुत ज़रूरी है...आंखें मूंद के एक पल उन ख़ास लोगों को याद करिए...ये ही हैं जो ज़िन्दगी को ज़िन्दगी बनाते हैं...कब बिछड़ जायें नहीं पता...लिस्ट में सबसे ऊपर इन रिश्तों को लिख डालिए...और कुछ यूं लिखिए कि इसमें कोई बदलाव न हो


अपनी नानी से लिपटकर उनकी खुश्बू और नानाजी का मुस्कुराता चेहरा साथ लायी हूँ....मन में अफ़सोस है और अपराधबोध भी...कुछ वक़्त की ही तो उम्मीद थी और मैं वो भी न दे सकी...इस बार हल्दी चावल की फिटाई लगाने, सिर पर हाथ फेरने और दस रुपये का नोट पकड़ाने वाला कोई नहीं था....भीतर तक तोड़ गया आपका यूँ चले जाना...मुझे माफ़ कर दीजियेगा!!     

सोमवार, 2 मार्च 2015

बेटी भला कोई क्यूँ चाहे

अचानक चारों तरफ से बेटियों को बचाने की अपीलें सुनाई पड़ने लगीं हैं...इतना तो इतने सालों में नहीं सुना....गली नुक्कड़ की समितियों से लेकर देश के प्रधानमंत्री तक सब जाग गए हैं...बेटियों को तो बचाना ही है....पर जाने क्यूँ इनकी ऐसी पहल पर ख़ुशी से ज्यादा इनकी सोच पर अफ़सोस हो रहा है...बल्कि ज़्यादातर जगहों पर तो इस दोगलेपन पर ग़ुस्सा आ रहा है....और एक अजीब सा चलन भी तो चल निकला है...ख़ुद को फेमिनिस्ट कहना और ऐसी अपीलें जारी करने का फैशन...ये वो लोग हैं जिन्हें बराबरी, अधिकार, स्वतंत्रता, आत्मसमान, अस्मिता के मुद्दों से कोई लेना देना नहीं...बस झम्म से कूद पड़ेंगे कि बेटी बचाओ बेटी बचाओ....महिला सशक्तिकरण का मतलब सिर्फ़ पढ़ाई तक सीमित करने वालों के लिए जींस शर्ट पहन लेने, अंग्रेज़ी में बात कर लेने और पेज थ्री पार्टियों में शिरकत कर लेने तक ही सीमित है....इस क्षेत्र में पढ़ाई करने के बाद जुड़े रहने का मौका मिला पर अपने आस पास की/ के इन पढ़े लिखे नारीवादियों को देखती हूँ तो जी में आता है कह दूं कि आधे से ज़्यादा बंटाधार तो तुम लोगों ने ही कर रखा है...इससे पहले मैं जिस संस्था में कार्यरत थी मुझे अच्छे से याद है की मेरी ही एक सहकर्मी ख़ुद को बड़ी बड़ी फेमिनिस्ट कहती थीं...पर महिला सशक्तिकरण पर उनके विचार जानकार मुझे उनपर सिर्फ़ तरस ही आ पाया था...हमारे आस पास अचानक से ये जो खेप खड़ी हो चली है जिसका बच्चियों को बचाने का औचित्य बस इतना ही है कि बेटी नहीं होगी तो बहू कहाँ से आएगी और फिर वंश कैसे चलेगा को कैसे समझाया जाए कि नारीवाद इससे कितना जुदा है.... ये वो लोग हैं जिनके लिए बराबरी का मतलब सिर्फ़ बेटी की पढ़ाई तक सीमित है...उन बेटियों की परवरिश और ज़िन्दगी से जुड़े तमाम और मसलों तक इनकी सोच कभी नहीं पहुँचती...करवाचौथ, तीज, छठ पर बाज़ार की ग़ुलाम बन जाने वाली इन महिलाओं और सीता, सावित्री (और अब जशोदाबेन) को आदर्श महिला बताने वालों को क्या बताइयेगा कि बात सिर्फ़ पैदा करने तक सीमित नहीं बल्कि बराबरी और अधिकार की है...आज भी ज़्यादातर लोगों के हिसाब से त्याग, ममता, करुणा, दया, लज्जा और भी बाकी के कमज़ोर बनाने वाले केमिकल प्राकृतिक और आवश्यक रूप से महिलाओं में पाए जाते हैं और ये उनके गहने हैं और ऐसा ही होना चाहिए....आज तक समझ नहीं आया मुझे कि गर्भ में ही गुणों का ये बंटवारा कैसे हो जाता है...आज तक तो किसी विज्ञान की किताब में पढ़ा नहीं...जाने ये कहाँ से पढ़ के आये हैं...फ़िलहाल तो इस पूरे अभियान के खेवनहार बने व्यक्ति की संवेदनशीलता ही देखें जिनकी अपनी पत्नी ने जीवन गुमनामी, अकेलेपन और तमाम अभावों में बिताया और वो कल भी ऐश से रहे और आज भी ऐश से हैं...मंच पर जाकर या कैमरे के सामने बेटी बचाओ का हल्ला कर देने से क्या वो सारी बातें भुला दी जायेंगी...उनके नारों पर बांवरे होते लोग ज़रा एक बार तो सोच का स्तर देखें...लड़की के पैदा होने पर एक पेड़ लगाओ ताकि उसकी लकड़ियाँ बेचकर शादी की जा सके...जिस व्यक्ति की सोच से व्यवहार तक रूढ़ीवाद से बुरी तरह ग्रस्त है वो भला क्या ख़ाक महिला सशक्तिकरण करेगा....सुनने में शायद बुरा लगे पर ख़ुद को प्रगतिशील दिखाना भी आज के समय में मजबूरी हो चली है...इन नारीवादियों को विदेशी फंडिंग वाले प्रोजेक्ट और इन नेताओं को सरकारों की नज़र में उठाना भी तो है....क्या हम नहीं जानते महिला दिवस की शुभकामनायें भेजने, उस दिन लेखों से तमाम वेबसाइटों, ब्लॉग, चैनलों के साथ अखबारों को रंग देने वालों में से कितने लोग वाक़ई बराबरी की बात करते हैं, चाहते हैं और अपनी कही बातों के वाकई करीब होते हैं...दुनिया दोगले लोगों से भरी पड़ी है अगर आप जवाब देना नहीं जानते तो घुट जायेंगे....आप चाहे कितना भी हल्ला मचा लें ‘बेटी बचाओ’ का या कितने भी अभियान चला लें...हक़ीक़त ये है कि मौजूदा हालातों में कोई भी...और कोई भी मतलब कोई भी...नहीं चाहेगा कि उसके घर बेटी पैदा हो....कोई मां बाप अपनी ज़िन्दगी इस दहशत में नहीं बिताना चाहेंगे कि वो बच्ची सुरक्षित कैसे रहे..कब उनकी बेटी के साथ क्या हो जाए नहीं पता..घर, परिवार, स्कूल, सड़क, दफ्तर, थाना..कहीं भी तो वो सुरक्षित नहीं....माहौल आप दे नहीं पा रहे तो बेटी बचाना तो भूल ही जाइए          

गुरुवार, 25 सितंबर 2014

periodic शराफ़त वाले उन धार्मिक दिनों का उत्सव

चलिए भाई साब अंगड़ाइयां लेती हुई माता रानी जाग गयी है, बाज़ार सज गए हैं, मंदिरों में रौनक हो गयी है मतलब नवरात्रे शुरू हो गए हैं...अब देखिएगा आप कमाल...ये नौ दिन महिलाएं एकदम सुरक्षित...कोई ज़रा हाथ लगा के या नज़र उठा के तो देखे माता रानी के प्रकोप से नहीं बचेगा...इस बीच अब महिला हिंसा या उत्पीड़न जैसी कोई घटना देखने सुनने को नहीं मिलेगी (कहीं दर्ज हो रही होगी या मीडिया में आ रही होगी तो वो ग़लत होगी) वो जो या देवी सर्वभूतेषु जपते हुए पांडेयजी, दूबे जी, शर्मा जी और भी कई सारे लोग कलश स्थापना कर रहे हैं...अब न तो ये अपनी बीवी पर चिल्लायेंगे या हाथ उठाएंगे, न अपनी बेटी पर दुनिया भर की पाबंदियां लगायेंगे और दफ्तर में सहकर्मी की तरफ़ उस नज़र से तो कतई नहीं देखेंगे....ऐसे वैसे छूने या इस तरह की फ़रमाइश करने की बात तो भूल ही जाइये..माँ बहन वाली गालियों का तो नाम भी न लीजिये....इस बीच कोई औरत दहेज के लिए नहीं जलाई जाएगी, कोई बच्ची कोख में नहीं मारी जाएगी, कोई लड़की नहीं छेड़ी जाएगी और बलात्कार...आप भी क्या मज़ाक कर रहे हैं साहब...नवरात्र चल रहे हैं...

विचित्र स्थितियां हैं...ये जो periodic शराफ़त वाली पूजाएँ या दिन होते हैं वो मेरी समझ से परे हैं...वो चाहे नवरात्र हों, पितृ पक्ष या रमज़ान...मतलब आप हमें ये समझाइये कि इतने दिन ये न करो वो न करो...दुनिया भर के नियम और उसके बाद?? उसके बाद हर प्रकार के कुकर्म करने का लाइसेंस मिल जाता है क्या...इतने दिन दया करो, दान करो, पुरखों को याद करो, उपवास रखो, दिमाग में कोई विचलित करने वाला ख़याल न आने दो...और उसके बाद साल भर एकदम छुट्टा घूमो...जी हमें ये बताइए कि सोम, बुध, और शुक्र को शराब का सेवन और मांसाहार की अनुमति कैसे है जब मंगल, बृहस्पति और शनिवार को वो एकदम ग़लत और प्रतिबंधित है...मुझे याद है मेरी एक सहेली जो कि सिंधी थी वो बृहस्पतिवार को कपड़े नहीं धोती थी...शनिवार को तेल या लोहा नहीं लिया जाता...और रमज़ान में तो नियम कानून की एक लम्बी लिस्ट होती है...ठीक है रखिये आप उपवास पर हमें ये बताइए कि आपका धर्म या मान्यताएं आपको सिर्फ़ उतने ही दिन शरीफ़ रहने को क्यूँ कहता है...उतने ही दिन दान पुण्य करने को क्यूँ कहता है....और हाँ उन दिनों में भी ज़रा याद कर लें कि जब खाया जाता है तो कैसे खाया जाता है...नवरात्रि के दिनों में दिन भर व्यंजन ही बना करते हैं...कुट्टू के आटे की पूड़ी, सिंघाड़े के आटे के व्यंजन, साबूदाने की टिक्की...मखाने की खीर...आलू देशी घी का हलवा, फलाहार और भी न जाने क्या क्या और ऐसे ही नज़ारे होते हैं रोज़ा इफ्तार के भी...तसवीरें देखी हैं हमने...काहे का उपवास....इन सबके पीछे की सोच जो भी रही हो ऐसी तो कतई नहीं रही होगी...रोज़ा इफ़्तार की पार्टियाँ किसी शादी के आयोजन से कम नहीं लगती हैं कई जगह...मैं जानती हूँ सब जगह ऐसा नहीं है पर आप भी जानते हैं की ज़्यादातर जगह सोच और practices का क्या हाल है.

मैं भगवान् को नहीं मानती, किसी धर्म को नहीं मानती पर मुझे उन लोगों से कोई निजी दिक्क़त भी नहीं जो मानते हैं...ये उनका अधिकार है ठीक वैसे ही जैसे न मानना मेरा अधिकार...पर ये ज़रूर सोचती हूँ कि क्या चलता है इन लोगों के दिमाग में...क्या एक बार भी सवाल नहीं उठता कि हम जो मान रहे हैं या कर रहे हैं वो किसलिए...क्या अगरबत्ती जलाने, नारियल फोड़ने, हवन करने, सजदा करने से आप एक अच्छे इंसान बन जायेंगे? आपका भला हो जायेगा? उपरवाले की आपके और आपके परिवार के ऊपर कृपा हो जाएगी?? आपके वो सारे पाप या कुकर्म धुल जायेंगे या justify हो जायेंगे जो आपने पूरे होशो हवास में सोच समझ के किये होते हैं...ज़रा भी अजीब नहीं लगता? जैसा मैंने कहा धार्मिक लोगों से मुझे कोई निजी दिक्कत नहीं पर ये सोच कि धर्म में आपका विश्वास आपको एक अच्छा इंसान बनाता है ऐसा मुझे दिखता तो नहीं...बड़े बड़े धार्मिक व्यक्तियों को, हाथ में रंग बिरंगे पत्थरों की अंगूठी पहने हुए लोगों को मैंने निहायत ही गिरी हुई सोच रखते हुए और हरकतें करते हुए देखा है...बल्कि कई बार ये ठीक वैसा होता है जैसा ये कहना कि हर पढ़ा लिखा व्यक्ति ज्ञानी/ समझदार/ जागरूक/ तरक्कीपसंद हो ऐसा कतई ज़रूरी नहीं.

आपके भगवान् धर्म और भूगोल में भी बंटे हुए हैं और क्या तो आपसी समझ और राजनीति है इनकी...धार्मिक स्थल धर्म के साथ साथ जाति और लैंगिक असमानता का पालन करते चलते हैं...पुजारी आपको सवर्ण पुरुष ही मिलेंगे (अपवाद को कृपया अपवाद में ही गिनें), कई जगहों पर तथाकथित नीची जाति वालों का, महिलाओं का प्रवेश वर्जित होता है, प्रवेश कर गए तो विपदा आ जाएगी, ये छूत जैसा है...तब तो बड़े ही अजीब हैं ये ऊपरवाले ईश्वर...ये सर्वशक्तिमान हैं पर दुनिया में सबसे मज़े में वो लोग हैं जो ग़लत हैं, भ्रष्ट हैं, ज़ालिम है..काहे के शक्तिमान जी कुछ भी तो कण्ट्रोल ना कर पाते...एक युद्ध तो रुकवा न पाते...नफ़रत पर कोई नियंत्रण ही नहीं..आपके प्रभु कुछ ग़लत नहीं होने देंगे पर ये क्या ग़ाज़ा में तो इतने मासूम बच्चों और लोगों की जाने चली गयीं, दुनिया भर में लोग गरीबी, भुखमरी, ज़ुल्म और अन्याय के चलते मर रहे हैं, दुखी हैं....क्या इनकी शक्तियां यहाँ काम नहीं करतीं...या ये वाला विभाग गड़बड़ है कुछ?? क्या कहा आपने...सब इनकी मर्ज़ी से ही होता है?? हाँ ऐसा कुछ बचपन में मैंने भी महाभारत सीरियल में देखा था...लोग भी कहते हैं सब ऊपर वाले की मर्ज़ी से होता है...पर माफ़ कीजियेगा फिर तो वो ऊपरवाला बड़ा ही ज़ालिम है कि इस क़दर दुनिया में नफ़रत, ज़ुल्म, तकलीफें फैलाये हुए है...पिछले जन्म का फल??? अरे भाई साहब उसको कौन पिछला जन्म याद है...मेमोरी में कोई फ़्लैश बैक थोड़े ही न है पिछले जन्म का...इनके पास भी इतने लंबित मुक़दमे हो गए हैं क्या हिन्दुस्तानी न्यायपालिका की तरह कि उस जन्म का फैसला उसी जन्म में नहीं हो पाता...सारी मेहरबानियाँ ज़ालिमों पर ही होंगी तो ऊपरवाले की समझ और नीयत पर शक तो होगा ही न...उस पर से आप देखिये मजबूरियां भी हैं हम अपने धर्म और अपने देश वालों को ही बचायेंगे...अब ईरान में कुछ होगा तो भोलेनाथ और हनुमान तो जा न सकेंगे...यहाँ भी कोई वीसा व्यवस्था होगी शायद या कुछ आपसी सहमति बनी होगी...पर फिर भी एक दूसरे की मदद तो करनी ही चाहिए...अब वो बेचारा मक़सूद अगर शेर के बाड़े में गिर गया और अल्लाह मियां किसी और ज़रूरी काम में व्यस्त थे तो क्या माता रानी जिनका वाहन ही शेर है वो उसे बचा नहीं सकती थीं?? भाई इतनी तो आपसी सहमति होनी चाहिए..कुछ इंसानियत भी रखनी चाहिए या नहीं...

एक तो इतने अस्त्र शस्त्र से लदे फंदे देवी देवता जो किसी न किसी बेचारे जानवर को वाहन बनाये ज़ुल्म ढा रहे होते हैं, उनकी करुणा, ममता, दया वाली कल्पना संभव नहीं हो पाती मेरे लिए...अब गणपति को ही लीजिये..भगवान हैं वो भी इतने दिन उनका भी उत्सव चलता है...पहली बात तो ये कि बचपन में बेचारे माँ की बात मानने के चक्कर में अपना ही सिर नहीं बचा पाए, दूसरे ये कि भोले भाले कहे जाने वाले कैसे गुस्सैल और ज़ालिम वो भोले नाथ कि पूरे बात जाने बग़ैर एक बच्चे का सिर ही उड़ा दिया और उसके बाद देखिये शिकार बना तो कौन वो बेचारा हाथी...अब कहिये कि इसकी बदौलत तो लोग हाथी में भगवान देखने लगे हैं तो क्या भैया अब ये ही तरीका रह गया है...उसपे से बैठा दिया उनको उस बेचारे निरीह नन्हे से चूहे पे...इन सब उपरवाले लोगों के साथ इतना उलझा हिसाब किताब है कि पूछिए मत...क्या लगता है आपको वो माइक पे हल्ला मचाने वाले जागरण, रामचरित मानस ऊंची आवाज़ में होंगे तो सीधे उपरवाले तक पहुँच जायेंगे...ग़ज़ब है....ईमानदारी से कहूँ तो ये वो समय होता है जब दिल से ये मनाया करती हूँ कि बिजली चली जाए...ज़रा शांति रहे.

इस बात को समझें कि मेरा सवाल या आपत्ति जो भी कहिये वो उस आस्था पर नहीं पर उसके तरीकों पर है...ये जिस क़िस्म की सोच और उससे उपजा फैशन और बाज़ार है उससे है...और ये उस तरीके से भी है जिसने ईश्वर की छवि एक लालची दुकानदार जैसी बना दी है...कि तुम ये दो तो मैं ये करूँगा या तुम ये करो तो ये फल मिलेगा...ताज्जुब है कि वाकई आपको ऐसा लगता है कि ईश्वर के नाम पर पैसा खर्चा करने से वो आपकी नाजायज़ इच्छाएं पूरी करेगा या फिर आपके ऐसे काम justify हो जायेंगे...मेरी आपत्ति इससे भी है कि ऐसे आयोजन आपकी professional dealings, स्वार्थ, भृष्टाचार, चापलूसी या किसी को बरगलाने के लिए भी होते हैं. 

इस सोच और मानसिकता ने जाति, धर्म, लिंग, उम्र, जगह जैसी तमाम सीमाओं को तोड़ते हुए सबके ऊपर सामान रूप से अपना असर दिखाया है...एक बात तो तय है कि ये आमजन जिसकी खुद से सवाल करने या अपनी ही आस्था पर सवाल करने की न आदत है न हिम्मत इसके चलते कई सारे लोगों का खूब फायदा हो रहा है...इनकी बदौलत कई लोगों के घरों के चूल्हे जल रहे हैं तो कई लोग ऐश से जिंदगी बिता रहे हैं..मंदिरों और बाबाओं की संपत्ति का टर्न ओवर देखा है कभी?..ज़रा एक नज़र अपने अन्दर डालिए, सवाल करिए और खुद को ईमानदारी से जवाब दीजिये कि क्या आप असल में वो ही व्यक्ति हैं जो लोगों को दिखाते हैं, जो सोचते हैं या करते हैं...क्या वो वाकई सही है, एक अच्छे इंसान का गुण है? कुछ ऐसे बेहद सीधे सवाल...करके ज़रा देखिये तो सही...और हाँ साथ ही ज़रा एक नज़र आस पास भी दौड़ाइए और ज़रा देखिये आपकी इन मान्यताओं के चलते किनकी दुकाने चल रही हैं, किनको फायदा पहुँच रहा है, किस सोच को बल मिल रहा है और कैसे कामों को बढ़ावा मिल रहा है....जिस राह पे चलने की उम्मीद कर रही हूँ वो मुश्किल होती है...पर जब साथ हो तो मुश्किलें भी आसान होती है...आइये चला जाए...क्या सब उपरवाले के भरोसे छोड़े बैठे हैं...कुछ काम ख़ुद भी करिए

(ये लेख किसी की धार्मिक भावना को ठेस पहुंचाने के लिए नहीं हैं...फेसबुक स्टेटस लिखने की सोची थी पर जब कहने को और बातें निकलने लगीं तो यहाँ लिख दिया)           

बुधवार, 23 जुलाई 2014

यूँ लौटना बचपन के गलियारों में

बड़ी हसरत से इंसाँ बचपने को याद करता है
ये फल पक कर दोबारा चाहता है ख़ाम हो जाए (नुशूर वाहिदी)

बालकनी में बैठी हूँ....सामने पार्क में पेड़ पौधों के चटख हरे पत्ते देख रही हूँ जो तेज़ बारिश के बाद धुल कर और खिल आये हैं.....आसमान फिर काले बादलों से घिर गया है....ठंडी हवाएं छूकर निकल रही है...आँखें बंद करती हूँ तो एकदम चौंक जाती हूँ...जैसे एक फ़्लैश बैक सा कुछ हुआ....दोबारा बंद करती हूँ....हाँ ये तो कुछ जाना पहचाना सा है....वो सौंधी मिटटी की ख़ुशबू, चारों तरफ़ सब कुछ भीगा, नहाया और पत्तों और फूलों के रंग और भी खिल गए हैं....घरों में गाय, भैंस, बैल सब थोड़े भीगे भीगे एकदम सीधे खड़े हैं....रह रह कर गर्दन झटकते हैं तो घंटियाँ बज उठती हैं गले की.....वो एक छोटे बच्चों की टोली हल्ला मचाती दौड़ती, पानी में कभी छप छपाक करती तो कभी बचती बचाती दौड़ी जा रही है....वो दूर से एक बुज़ुर्ग महिला,  दुबली पतली छोटी सी, गढ़वाली शैली की गत्ती धोती बांधे आवाज़ देती हैं...और इस टोली से एक 7- 8 साल की बच्ची, गुलाबी फ्रॉक पहने चल पड़ती है उनकी  तरफ़....पीछे से साथी कुछ कहते हैं तो पलटती है और चंचल आँखों से कुछ इशारा करती है....अरे ये तो मैं हूँ....और वो सब मेरे बचपन के साथी...कैसे लग रहे हैं सब...कोई निकर बनियान पहले निकल पड़ा तो कोई सिर्फ़  पैंट में...और रिंकी को तो देखो इसकी फ्रॉक तो अभी आम की टहनी में फंस कर फट गयी थी और वो ऐसे ही आ गयी...सब भीगे भागे....पैर मटमैले पानी से सने....इशारा समझने की कोशिश करती हूँ...मैंने शायद ऐसा कुछ कहा कि अभी थोड़ी देर में आती हूँ....आगे बढ़ती हूँ उन महिला की तरफ़ जो अब थोडा साफ़ दिखने लगी हैं.....ये तो नानी हैं...अरे हाँ...गोशाला से अपनी गाय को बाहर लाती मेरी नानी..और उतनी बूढ़ी भी नहीं दिख रहीं....कैसे डपट रही हैं भीगने पर...और ज़रा देखो मुझे मैं हँसे जा रही हूँ...और कितनी मासूमियत से कह रही हूँ....बंटी, सुरेश, रज्जो, नित्तू, रिंकी और संजू भी तो थे साथ में...नानी मेरे कपड़ों और पैरों की तरफ़ इशारा करती हैं कि किस क़दर गन्दा कर दिया है मैंने इन्हें...तो मैं मौके का फ़ायदा उठाती हूँ और कहती हूँ....नहर चली जाऊं नहाने... पर नानी तो सुनती ही नहीं...मना कर दिया...मैं चिपक गयी उनसे....कि हाँ कहो तभी छोडूंगी...उनके कपड़े भी भिगा दिए...फिर से एक प्यार भरी डांट के साथ इजाज़त मिल जाती है नहर पर जाने की...और ज्यादा देर नहीं लगानी...मैं फिर दौड़ पड़ती हूँ सड़क की तरफ़जहाँ घर के कोने पर लगे जंगली जलेबी और बाड़ के लिए लगाई गयी काँटों वाली झाड़ के पीछे छुपे मेरे साथी मेरा इंतज़ार कर रहे हैं....मिलने पर एक बार फिर हल्ला और दौड़ पड़े छोटी नहर की तरफ़ नहाने...लो बंटी फिसल भी गया..फिर सबकी हंसी छूट पड़ती है..ये कितना गिरता रहता है...कोई बात नहीं अभी नहायेगा तो साफ़ हो जायेगा...और ये शुरू हुई नहर में बच्चों की छप छपाक...आँखें खोलती हूँ...मुस्कुरा रही हूँ पर आँखें डबडबाई हुई हैं....क्या कुछ है जो छूट गया...जिससे दूर निकल आये...रिश्तों कि गर्माहट से, खुशियों से, शरारतों से, हंसी ठिठोलियों से और शामिल हो गए इस बनावटी दुनिया में 
           
वक़्त के साथ हसरतें बहुत तेज़ी से बढ़ती हैं....बहुत कुछ पाना होता है, हासिल करना होता है और उसके लिए सबसे पहले उसके लायक बनना होता है...फिर दुनिया की लगभग गला काट प्रतियोगिता में कूद कर ख़ुद को साबित करना होता है....दो ही तरीकों से लड़कियों के घरवाले उनके भविष्य की कल्पना करते हैं....या तो मतलब भर का पढ़ा लिखा कर शादी कर देना या फिर करियर बनने के बाद शादी....शादी नॉन नेगोशिएबल है....मेरे घर के लोग अपवाद नहीं है ये अलग बात है कि मैं ज़रुरत से ज़्यादा ज़िद्दी निकल गयी....इस मशीनी ज़िंदगी, बनावटी रिश्तों और माहौल में जब दम घुटने लगता है तो आज भी नानी की गोद याद आती है....हम किस क़दर स्वार्थी होते हैं...रिश्ते भी हमें तब याद आते हैं जब हमे ज़रुरत होती है...अपना दिल हल्का करने बचपन की उन गलियों में मैं पूरे 3 साल बाद जा रही थी....क्या कुछ बदला होगा इन 3 सालों में...और मेरी नानी...वो अब और भी बूढ़ी दिखने लगी होंगी...माँ बताती है पहले से भी दुबली हो गयी हैं

ट्रेन लेट थी....अच्छा ही हुआ...5 बजे के अँधेरे में मुझे इस स्टेशन पर डर लगता....धामपुर...जी..वही शुगर मिल्स वाला धामपुर...नहीं मेरा ननिहाल यहाँ नहीं...यहाँ से लगभग 38 किमी दूर है..यहाँ पहुँचने के दो रास्ते हैं.. या तो धामपुर या काशीपुर..काशीपुर का रास्ता लम्बा है और सही समय पर पहुँचाने वाली ट्रेनें सीमित हैं इन दोनों स्टेशनों पर..अब सीधी बस तो नहीं मिलेगी...बदल बदल कर जाना पड़ेगा...सुबह सुबह प्रेस की गाड़ियाँ जाती हैं पर अब देर हो गयी है..पापा ने बताया स्टेशन से रिक्शा कर लूँ नगीना तिराहे तक वहां से बस मिल जाएगी...बाहर आती हूँ, सर पर टोपी, कंधे पर गमछा और हिना की हुई दाढ़ी वाले एक मुसलमान बुज़ुर्ग ख़ुद ही दौड़े आते हैं कि गुड़िया कहाँ जाओगी...मैंने बताया नगीना तिराहा...मेरा सूटकेस रिक्शे पर रखने लगे...मुझे अच्छा नहीं लगा...मैं खुद रख सकती हूँ...वो बुज़ुर्ग थे...बोले अरे बिटिया तुम क्यूँ रखोगी...देखती हूँ सड़क गीली है...जगह जगह पानी भी भरा हुआ है...पता चला कि सुबह सुबह बारिश हुई हैं...उनके पूछने पर मैंने बताया लखनऊ से आ रही हूँ....वो बोले अच्छा नखलऊ...राजधानी...वो तो बड़ा शहर है...मैं मुस्कुरा भर दी...यहाँ की जुबान में बिजनौर की खड़ी बोली का असर है और लखनऊ को यहाँ नखलऊ ही कहा जाता है...उन्होंने पूछा कहाँ जाना है मुझे...कालागढ़?? अरे बिटिया बस थोड़ी सी देर पहले ही सीधी बस छूटी है अब तो अफ़ज़लगढ़ तक ही मिलेगी वहाँ से टेम्पो में जाना होगा...तिराहे पर पहुँचते ही उन्होंने मेरा सामान उतरा, मेहनताना लिया और रिक्शा किनारे लगा कर खड़े हो गए...मुझे बताया कि बस कहाँ से मिलेगी...मैंने उनका शुक्रिया अदा किया और आती जाती बसों में पता करने लगी की किसमें जा सकती हूँ...वो दोबारा मेरे पास आये...एक दुकान की तरफ़ इशारा कर मुझसे वहां बैठने को कहा और बोले मैं बता दूंगा कौन सी बस जाएगी वहाँ...मैं उन्हें परेशान नहीं करना चाहती थी और वैसे भी इतने सालों में अपने सारे काम ख़ुद करने की आदत भी हो गयी है...मैंने उनसे कहा कि वो परेशान न हों...बोले कैसी बात करती हो गुड़िया...तुम्हे सही बस में बैठा कर ही जायेंगे....मैं हैरान थी ये देखकर कि आज भी ऐसे लोग होते हैं...बस आई उन्होंने मेरा सामान उसमे रखा और परिवार के बुज़ुर्ग की तरह हिदायत दी कि ध्यान से जाऊं और मुस्कुराते हुए हाथ हिला कर विदा ली..        
ये एक सुखद एहसास था...सालों बाद ऐसा महसूस हुआ था...एक अजनबी साथ जो कुछ मिनटों में अपना सा हो गया...वैसा प्यार वैसी ही फ़िक्र...हम कितनी फ़र्क दुनिया में जीते हैं...वहां तो अपने भी अजनबी हो जाते हैं...खैर..ये हिमांचल रोडवेज़ की बस है जिसमे मैं सवार हूँ...भीगे मौसम में बाहर का नज़ारा लेते हुए चल रही हूँ....खेत ज़्यादातर ख़ाली पड़े हैं...गेहूं कट चुके हैं...बस चरी लगी हुई है...अब जुलाई में धान लगेंगे....कोटद्वार से आने वाली खो नदी पर बना है ये शेरकोट का पुल....पिछले साल के मानसून में पानी भर गया था तो ये रास्ता बंद कर दिया गया था....नानी के गाँव से भी कई लोग घर ख़ाली करके कालागढ़ चले गए थे...रोडवेज़ की बस आधे घंटे में ही अफ़ज़लगढ़ पहुंचा देती है..प्राइवेट बसें देर लगाती हैं.... अफ़ज़लगढ़...ये यहाँ का बड़ा बाज़ार है...उधर के गांवों में अगर कोई सामान कालागढ़ में नहीं है तो यहीं मिलेगा और अगर यहाँ भी नहीं है तो धामपुर या काशीपुर ही जाना पड़ेगा....सुबह का वक़्त है दुकानें खुल ही रही हैं...पर फलों के ठेले और चाय के होटल खुल गए हैं...ये बसों के रास्ते में पड़ता है न इसलिए.....मैं नानी नाना के लिए कुछ फल लेती हूँ और फल वाला ही मुझे बताता है कि पेट्रोल पंप के आगे टेम्पो मिलेगा....मैं उधर ही बढ़ चलती हूँ...सुबह सुबह स्कूल के बच्चे चहकते हुए रिक्शों और बसों में जाते दिखते हैं...कुछ मदरसे की तरफ़भी जा रहे हैं...ये मुझे सुभान नाना ने बताया जो अभी अभी दिखे मुझे....वो फल बेचते हैं...कितने बुज़ुर्ग हो गए हैं अब और कमज़ोर भी...सालों बाद यूँ देखकर कितना अच्छा लगा...बचपन से ही देख रही हूँ इन्हें...सर पर फलों का टोकरा लिए, आँखों में ऐनक चढ़ाए, कुरते और तहमत में सुभान नाना फल लाते थे...मेरी नानी में और इनमे बड़ी नोंक झोंक हुआ करती थी...नानी कहतीं तुम पैसे ज़्यादा लेते हो तो वो बोलते पंडितानी तू पैसे ही मत दे बच्चे साल में एक दो बार ही तो आते हैं...एक और भी तो थे उमर नाना...वो बड़े शांत थे...वो भी बहुत प्यार करते थे पर वो अब नहीं रहे....हम दोनों को एक ही टेम्पो में जाना था...ये सजे धजे रंगीन बड़े वाले टेम्पो...जिन्हें हम लोग बचपन में गणेशजी कहते थे...आज भी यहाँ वही चलते हैं....खूब ठूंस ठूंस के लोग बैठाए जाते हैं..और चारों तरफ़ खड़े भी होते हैं और अगर कालागढ़, कादराबाद, विजयनगर या भिकावाले के साप्ताहिक बाज़ार का दिन हो तो सब्जी के बोरे और फलों के टोकरे भी लद जाते हैं...आज एक तरफ़ एक साहब की साइकिल बाँधी गयी है....ये सब यहाँ बहुत नार्मल है...रफ़्तार धीमी और आवाज़ तेज़ ये इस वाहन का स्टाइल है
कादराबाद का विद्यालय...मेरी माँ यहीं पढने आती थी...बस में...टिकट कुछ पैसों का हुआ करता था...अब तो इस इलाके में कई स्कूल खुल गए हैं...अंग्रेजी माध्यम वाले...ज़ाहिर है लोग वहीँ भेजना बेहतर समझते हैं...अपनी नानी और आस पास के गाँव के बारे में ये जानकारी साझा करती चलूँ...यहाँ 14 कॉलोनियां  हैं....कॉलोनियां क्या गाँव समझिये....भिकवाला, चूड़ीवाला, कादराबाद, जामनवाला वगैरह...आज़ादी के बाद सरकार ने...भूतपूर्व सैनिकों, आज़ाद हिन्द फ़ौज के स्वतंत्रता सेनानियों को 50 – 50 बीघा ज़मीन और मकान निःशुल्क दिए थे...गाँव में मकान थे और उससे लगे खेत....नहीं मेरे नाना इन दोनों में से कोई नहीं थे...उनके चाचा थे...और बाद में नाना ने यहाँ ज़मीन और मकान ले लिया था...वो तो ख़ालिस किसान रहे..

जामनवाला में जिस जगह उतरना होता था उसे वहां अड्डा बोला जाता था....वहां एक उजड़ा हुआ मकान हुआ करता था...उसी से पहचान कर उतर जाते थे पर आज टेम्पोवाले ने जहाँ उतारा वहां तो ऐसा कुछ नहीं...सड़क किनारे नयी नयी दुकाने खुली हुई हैं..एक बड़ी चक्की भी बन गयी हैं...अरे इन्हें तो मैं पहचानती हूँ ये बलजीत मामाजी के बेटे हैं...हाँ पापा भी दिख गए...मतलब सही जगह पहुंची हूँ...दूर तक फैले खेतों से लगे कालागढ़ के पहाड़ी जंगल दिखाई दे रहे हैं....एक सड़क अन्दर गाँव की ओर जाती है..इस गाँव का नाम जामनवाला क्यूँ पड़ा ये मुझे आज तक समझ नहीं आया....गाँव थोड़ा आगे से शुरू होता है अभी थोड़ी दूर तक खेत ही हैं...बायीं तरफ़ महिंद्र मामाजी का कोल्हू है...उनका बेटा उसकी देख रेख करता है....इस गाँव की ख़ुशबू आज भी वही है...कितना आज़ाद सा महसूस हो रहा है....मानो कहीं बेड़ियों में जकड़ी हुई थी और वह से जान छुड़ाकर आई हूँ....इस गाँव में गढ़वाली, सरदार, हरियाणा के जाट व हरिजन लगभग लगभग बराबर गिनती में रहते हैं...सब एक दुसरे की भाषा आराम से समझते और बोलते हैं....एक दूसरे के सुख दुःख में काम आने से लेकर रंजिशों में क़त्ल ए आम सब कुछ यहीं हो जाता है....जातिवाद का पूरा पालन किया जाता है पर आत्मीयता बनी रहती है....गाँव शुरू होता है..दाहिनी तरफ़ मंदिर और उसे बगल में प्राथमिक पाठशाला जिसके मैदान में अब लड़के शाम को वॉलीबाल खेलते हैं....पुरानी इमारत उजड़ चुकी है बगल में नए कमरे बनाये गए हैं..और वो पुराना विशाल बरगद का बूढा पेड़ आज भी घनी छाया दे रहा है....सड़क के बायीं तरफ़ तो बड़ी सारी दुकानें खुल गयी हैं...कितना बदल गया है...पर इस सड़क के हाल ख़राब हो गए हैं...आगे बढ़ने पर एक चौराहा आता है...एक रास्ता पुराना जामनवाला, एक सरदारों के मोहल्ले को और एक नया जामनवाला की ओर....यहाँ भी कुछ दुकाने हैं...बिष्ट मामाजी की और खान भैया की क्लिनिक....माँ पापा की ग़ैर मौजूदगी में खान भैया नानी नाना का पूरा ध्यान रखते हैं..उनकी ख़बर लेते रहना ज़रुरत पड़ने पर दवाइयां देते रहना बल्कि मेरे नाना तो कभी कभी उन्हें दांट भी देते हैं पर वो कभी बुरा नहीं मानते...बुज़ुर्ग एकदम बच्चे हो जाते हैं...एक बार एक नानी को ये भैया दवा देने पहुंचे तो उन्होंने ज़िद पकड़ ली कि पहले समोसा खिलाओ तब दवा खाऊँगी....ऐसा गाँव में ही हो सकता है...बेचारे खान भैया समोसा लाके दिया तब मानी वो नानी....हमें अब दाहिनी तरफ़ बढ़ना है....ये खड़ंजे नए बिछे हैं...अच्छा पिछले प्रधान ने सड़क बनवाई है ये वाली...बायें हाथ पर सतपाल मामा की दुकान....ये दुकान तो बचपन से देख रही हूँ...और बड़ी सारी चीज़ें खायी हैं यहाँ से लेकर...तब तो कुछ पैसों में ही मिल जाती थी...आज भी कुछ ख़ास महंगी नहीं...जीभ लाल कर देने वाली वो खट्टी मीठी टॉफी...लालजीभ कहते थे उसे...वो गोल लम्बे पापड़ जिन्हें उँगलियों में फंसा कर खाते थे...चूरन की गोलियां और भी न जाने क्या क्या....आगे बढ़ती हूँ...हमे बायें जाना है...सीधा वाला रास्ता कुएं की तरफ़ और वहां से चक्की मोहल्ले को मुड़ जाता है...एक ज़माने में वहां चक्की हुआ करती थी.

इस वक़्त ज़्यादातर लोग खेतों पर होते हैं...इसलिए मोहल्ले में ज़्यादा चहल पहल नहीं...मैं देखती चलती हूँ कि क्या कुछ बदला आर क्या कुछ पहले जैसा है...ये सड़क एक झटके से बचपन के दिनों में वापस ले जाती है...आंधी आती थी तो सब नित्तू के घर पर इकट्ठा हो जाते थे आम के पेड़ों के नीचे आम बीनने...लुका छुपी और डंडा चूस पसंदीदा खेल हुआ करते थे...छुपने की जगह खूब थी...पेड़ों के पीछे, ट्रैक्टर के पीछे या गौशाला जिसे छन्नी कहा जाता है...गर्मियों की भरी दुपहर को भी घर में चैन नहीं मिलता था...लड़के वो पुराने टायर को डंडी से मारकर दौड़ाते रहते थे...और हम लोग कुछ और खेल खेला करते थे...वो आइसक्रीम वाला आता था तो उसके पीछे पीछे उसको चिढ़ाते सारे बच्चे दौड़ लगा देते थे...थोड़े गेहूं या किसी और चीज़ के बदले मिल जाती थी आइसक्रीम जिसे कई लोग बर्फ़ भी कहते थे...बेचनेवाला भी आइसक्रीम बर्फ़ ही कहता था...एकदम अलग ही होता था उसका स्वाद...फिर शाम को सब लोग एक दूसरे से पूछते थे तुम्हारे यहाँ दोपहर के खाने में क्या बना कुछ बचा है क्या...सब लोग अपने अपने यहाँ से खाना लाकर इकठ्ठा करते और फिर पार्टी होती...कई बार कुछ बनाने की कोशिश भी की जाती थी घरवालों के सहयोग से...

स्मृतियों से लौटती हूँ सामने पड़ोस की नानी मिल गयीं सर पर हाथ फेर कर उन्होंने हरियाणवी में कुछ कहा...बस इतना समझ आया कि आशीर्वाद दे रही थीं....घर पहुँचती हूँ...वो बड़ा आँगन...नानी की गाय जो मारने को आज भी वैसे ही आती है...और वो नीम के पेड़ के नीचे कुर्सी डाले नानाजी बैठे हैं...नानी रसोई से निकल रही हैं...कितनी बूढ़ी और दुबली हो गयी हैं मेरी नानी...झुर्रियां और उभर आई हैं...बाल और भी सफ़ेद हो गए हैं...देह कैसी ढीली हुई जाती है...हम दोनों लिपट जाते हैं एक दूसरे से और जाने क्यूँ रो पड़ते हैं और फिर थोड़ी देर बाद हंस भी पड़ते हैं..मेरी नानी की वो जानी पहचानी ख़ुशबू जो हमेशा ज़हन में ताज़ा रहती है....नानाजी के पास जाती हूँ और देखिये ज़रा उन्होंने एक बार में पहचाना ही नहीं...जब अपने चिर परिचित अंदाज़ में मैंने डांटा तब बोले अच्छा आ गयी ये अब कुछ दिन हल्ला होता रहेगा घर पर

मैं चारों तरफ़ नज़र दौड़ाती हूँ...आधे आँगन के फ़र्श पर सीमेंट लगा दिया गया है...मिट्टी के आँगन की लिपाई अब नानी नहीं कर पाती थी...और बरसात में फिसलन भी हो जाती थी...घर के काम काज से फ़ारिग होकर मैं और नानी पेड़ के नीचे खाट डाल कर बैठ जाते हैं...हमारे और पड़ोसियों के घर के बीच में बरगद का एक बड़ा पेड़ हुआ करता था...नानी ने तो लगभग पूरा ही कटवा दिया....गर्मियों की दोपहर में खूब सारे लोगों का जमावड़ा लग जाता था यहाँ....और ये आँगन का दूसरा नीम और जामुन और वो गौशाला के पीछे वाला जामुन...ये किनारे वाला डेकन और बायीं तरफ़ क्यारियों के पास वाला जामुन....इतने सारे पेड़ क्यूँ कटवा दिए नानी??? मुझे लग रहा था मेरे दिल दिमाग़ की बचपन वाली किताब से किसी ने कुछ पन्ने फाड़ दिए हों...मैं दुखी थी...इन पेड़ों की छाँव, फल, झूले मुझे सब याद आ रहे थे.... “बड़े पत्ते गिरते थे बेटा मुझसे अब इतनी सफ़ाई नहीं हो पाती थी...आंधी में लगता था किसी तार पर न गिर जाएँ....बस इसीलिए कटवा दिए”...बुढ़ापा किस क़दर लाचार कर देता है इंसान को...अपने ही हाथों बसी उन चीज़ों से दूरी बनानी पड़ जाती है जो अभी तक ज़िंदगी का हिस्सा हुआ करते थे….मेरे नाना नानी को इस जगह पर रहते हुए शायद 60 वर्षों से ज्यादा हो चुके हैं...ये वजह है कि हम सबकी लाख मिन्नतों के बावजूद भी वो इस जगह हो छोड़ने को तैयार नहीं....अब हम लोग भी ज़िद नहीं करते...उनका इस जगह की हर एक एक शय से जिस तरह का जुड़ाव है वो हम सबके साथ कभी नहीं हो पायेगा...और इन सबसे उनको दूर करना उन्हें ज़िंदगी से दूर करना सरीखा होगा..

मेरी नानी की उम्र 80 वर्ष से ज्यादा है...13 वर्ष की कच्ची उम्र में उनकी शादी हो गयी थी...शादी में गोदान होता है...उसमें गाय या बछिया का दान किया जाता है...मेरी नानी को गोदान में जो गाय मिली थी उसकी पीढ़ी अभी तक चल रही है....ये जो गाय इस वक़्त है न इनके पास...हाँ ये ही जो सबको मारने को आती है...ये उसी पीढ़ी की  है...मेरी नानी की ज़िंदगी इस गाय के इर्द गिर्द ही घूमती है...ठीक वैसे जैसे कि मां की अपने बच्चे के इर्द गिर्द...आँगन में 8 खूंटे लगे हैं...जैसे जैसे धूप अपनी जगह बदलती है वैसे वैसे गाय के खूंटे बदलते हैं...सारे नाज़ नखरे उठाये जाते हैं...ये गाय सिर्फ हैंडपंप का पानी पीती है वो भी किसी का जूठा नहीं होना चाहिए इसकी अपनी बछिया का भी नहीं...दाल चावल सब्जी रोटी इनके लिए सब कुछ बनता है...साल भर के लिए गुड़ अलग से बनवाया जाता है...इसकी ये सेहत यूँ ही नहीं है...पर अब ये बूढ़ी हो गयी है....दूध भी नहीं देती...पर इसकी सेवा बिलकुल पहले जैसे ही की जाती है...हाँ अब नानी थक जाती हैं पर किसी को दे भी तो नहीं पाती और ये भी तो नहीं रहती कहीं...पिछले साल गाँव में ही किसी को मुफ़्त में दे दी थी....दो दिन तक न गाय ने कुछ खाया पिया न मेरी नानी ने...दोनों का रो रोकर बुरा हाल हो गया था....तीसरे दिन पड़ोसी गए और उसे घर वापस ले आये...यूँ लगा मानों दो बिछड़ी आत्माएं मिली हों...साथ जीने मरने की कसमे खायी गयीं और अपना उपवास तोड़ा गया

शाम को गुरूद्वारे में गुरबानी शुरू होती है...हमेशा से देखती आई हूँ उतने वक़्त पेड़ पौधे एकदम सावधान की अवस्था में लगते हैं मुझे...मुझे नानी के यहाँ कि रातें बेहद खूबसूरत लगती हैं....आसमान एकदम स्याह और साफ़ होता है और इतने सारे तारे टिमटिमाया करते हैं...इनको देखना और बस देखते ही जाना बचपन से मेरा पसंदीदा काम हुआ करता है...और हाँ साथ ही उन टिमटिमाते जुगनुओं को देखना...बचपन में इन्हें पकड़ कर दोनों हथेलियों के बीच छुपा लेना फिर धीरे से खोलकर देखने में कितना मज़ा आता था....मेंढक यहाँ बहुतायत में होते हैं...पूरे आँगन में फुदका करेंगे...ध्यान न दिया तो कहिये कमरे में आ जाएँ....तो सन्नाटे को भंग करती मेंढक झींगुरों के शोर और तारों और जुगनुओं से जगमगाती होती हैं यहाँ की रात...घने अँधेरे में ये ज़िन्दा उम्मीद सरीखे होते हैं....बचपन में नानी से चिपक कर सोती थी उनकी चारपाई पर...वो निवाड़ वाली चारपाई...बगल वाले भैया बीन जाया करते थे नानी के लिए...नानी से कहानी सुनती, गाने सुनती, उनके बचपन के किस्से सुनती....और जगमगाते तारों को निहारती जाने कब सो जाती...बड़ी मुश्किल से अटे आज इस चारपाई में दोनों...नानी वैसी ही हैं बल्कि दुबली ही हुई हैं...पर मैं...सारी जगह ही घेर ली...

जाड़ा, गर्मी या बरसात कुछ भी हो गुरबानी सुबह ठीक 4 बजे शुरू हो जाती है और ठीक उसी वक़्त मेरी नानी बिस्तर छोड़ देती हैं....झाड़ू लगाती हैं, कूड़ा जलाती है, गोबर उठती हैं, गाय को चारा और पानी देती हैं और फिर चाय बनती हैं....नानाजी बीमार रहते हैं इसलिए अब वो कुछ नहीं कर पाते...उनकी सेवा भी नानी को ही करनी होती है...जिसमे दोनों बुजुर्गों के झगडे भी खूब होते हैं...पहले इतना सब करने के बाद नानी नाश्ता जिसमे अमूमन रोटी सब्जी बनती थी, बनाकर, हंडिया में दाल चूल्हे पर रखकर खेत चली जाती थी....वहां से चारा लेकर जब तक लौटतीं तब तक धीमी आंच पर दाल चूल्हे पर पकती रहती....क्या स्वाद था वो उफ़...और फिर घर के बने घी के साथ फूल की थाली में मुझे खाना परोसा जाता...ये मेरी पसंदीदा थाली थी क्यूंकि इसका रंग सबसे अलग था...नानी उस बड़ी मथनी से छांछ मथकर मक्खन निकालती थी...उसे छंछ छोलना कहते थे...मैंने भी ये काम करने की कोशिश में बड़ी हांडियां फोड़ी हैं

नीम के नीचे बैठी यहाँ की सुबह देख रही हूँ....सुबह 6 बजे तक सब खेतों को जा चुके होते हैं...लोग अपनी गाय भैंसों को (जिन्हें यहाँ डंगर कहते हैं) नहर पर पानी पिलाने ले जा रहे हैं...हाँ वही छोटी नहर जिसमें कभी हम बच्चे नहाया करते थे...अब तो उसके किनारे बनी सीढ़ियाँ टूट गयीं हैं...अब बच्चे नहीं जाते वहाँ....मेरे नानी नाना गाँव के सारे गढ़वालियों के अघोषित रूप से बोडी बाडा हैं..गढ़वाली में इसका मतलब ताई ताऊ होता है....सड़क हमारे घर के ही सामने से है तो गुजरने वाले सभी गढ़वाली बच्चे और बड़े बोडी बाडा और बाकी लोग दादी दादा या चाची चाचा राम राम करते हुए जाते हैं....वो दूधिया मामाजी अब भी आते हैं गाँव में....सबके यहाँ से दूध ले जाते हैं कालागढ़ की डेरी में...उनके बेटे अलग हो गए हैं इसलिए उन्हें अब भी काम करना पड़ता है...वो ब्रेड, बन और बिस्कुट वाला...भोपू लगा होता है उसकी साईकिल में और शायद हफ्ते में दो ही दिन आता है....वो जो सतपाल मामाजी की दुकान है न वहां डबलरोटी मिलती है...बन को सुखाकर बनती है शायद...मुझे उसका स्वाद बड़ा अच्छा लगता था...आज भी आती हूँ तो बचपन के वो स्वाद दुबारा चखना नहीं भूलती...वो उन गलियों में वापस जो ले जाते हैं  
आज सोचती हूँ शाम को खेत हो आऊँ और वो जो बगल के खेत में दरगाह है वहां भी तो जाना है....मां ने कहा था अपने खेत वाले पेड़ पर भी हो आऊँ...एक डौली का पेड़ है हमारे खेत में..कोई जंगली पेड़ होता है ये....उसकी कहानी ये है कि बहुत पहले यहाँ पीर बाबा का स्थान था...पेड़ के नीचे कच्चा सा कुछ बना हुआ था, आस पास के गाँव वाले आते थे...एक बार बाबा गाँव में किसी के सपने में आये और कहा कि उनके लिए एक स्थान बनवाया जाए...तो फिर बगल वाले खेत में दरगाह बन गयी...ये भी कहा गया कि पुरानी जगह वैसी ही रहेगी और यहाँ आनेवालों को पहले पुरानी जगह ही जाना होगा...माँ बताती हैं एक बार पेड़ की टहनियां बहुत झूल रही थीं तो उनके दिल में आया कि क्या पेड़ कटवा देना चाहिए..नयी जगह तो बन ही गयी है....तो उस रात गाँव में किसी और व्यक्ति के सपने में आकर बाबा ने कहा कि पेड़ कभी न काटना चाहो तो नीचे से झाड़ साफ़ कर लो....ये सब मान्यताएं हैं यहाँ की...पर बड़ी ही मज़बूत हैं...लोग आज भी मानते हैं की दिल में कोई सवाल हो तो बाबा से कहने पर किसी न किसी तरह जवाब ज़रूर मिलता है....जब भी हम आते हैं हमे यहाँ आना ही होता है...बल्कि कोई मन्नत जब मांगी जाती है तो बाकि देवी देवताओं के नाम के साथ साथ लिस्ट में इनका नाम भी होता है...इन्हें खुद ही सब पीर बाबा कहने लगे....नानी की सख्त हिदायत है जल्दी वापस आने की...भूत प्रेतों पर ज़बरदस्त विश्वास यहाँ लोगों को खूब डरा कर रखता है 

खेत तक पहुँचने के दो रास्ते हैं...एक वो जो अड्डे से होकर जाता है पक्की रोड के रास्ते...और दूसरा गाँव के ही साथ साथ बने कच्चे रस्ते से....मैं कच्चे रास्ते पर निकल पड़ी...सोचा लौटते में पक्की रोड होकर आ जाउंगी...नहर के किनारे तो पूरे ही टूट गए हैं....और अब तो लोगो ने खेतों में भी मकान भी बना लिए हैं...पहले गाँव एक तरफ़ था उसके बाद खेत शुरू होते थे...परिवार बढ़ रहे हैं तो शायद जगह की तंगी होती होगी...ये छोटी नहर बड़ी नहर से निकली है....बड़ी नहर रामगंगा नदी से निकाली गयी है....बीच में से उसका एक छोटा रास्ता बनाकर और गेट लगाकर बायीं तरफ़ मोड़ दिया गया है.....ताकि उस तरफ़ के सारे खेतों तक पानी पहुँच सके...और बाकि ज़रूरतों के लिए भी पानी उपलब्ध हो....इस बड़ी नहर के ऊपर एक संकरी सी पुलिया है....याद करती हूँ...बचपन में तो यूँ ही दौड़ जाते थे उसपर..चाहे जितनी गर्मी हो नहर का पानी एकदम ठंडा रहता था....5 -7 मिनट अगर लगातार रह लिए तो बाहर आकर कांपने लगते थे...ये हम शहर के बच्चों के हाल थे वहां वाले तो मज़े में नहाते थे...बल्कि पुलिया के ऊपर से छलांग लगायी जाती थी नहर में...उस जगह पर पानी की गहराई ज़्यादा थी तो ये ही शर्त लगती थी कि कौन वहाँ कूद पायेगा...छोटे बच्चों के लिए छोटी नहर थी और बड़ों के लिए बड़ी...जब और थोडा और बड़े हो जाएँ तो पुरुष तो जाएँ बड़ी नहर में पर महिलाएं घर पर सिमट जाएँ...छुटपन में ये बड़ी नहर हमारे लिए नदी सरीखी थी....बड़ी मुश्किल से आज डरते डरते पार किया इस पुलिया को...जब इस पार पहुँच गई तब जान में जान आई...मेरे इस डर को देख कर बच्चे भी हंस रहे थे मुझपर... 
              
अब मेरे बाएं और दाहिने, दोनों तरफ़ दूर दूर तक फैले खेत थे...मैं उस थोड़े चौड़े पर कच्चे रास्ते पर थी जिसमे बायीं तरफ़ एक छोटी कच्ची नहर बनायीं गयी थी खेतों तक पानी पहुंचाने के लिए....इस नहर से छोटी छोटी नालियां बना कर खेतों को पानी मोड़ लिया जाता था...ये आपसे सहमती होती थी कि ऐसा बारी बारी से हो ताकि सबको पानी मिल सके......ये बोरिंग वाला खेत नारायण सिंह नानाजी का है...वो अब नहीं रहे...बचपन में नानी के साथ खेत पर आते थे और लौटते वक़्त इस बोरिंग में नहा कर जाते थे...उफ़ क्या तेज़ बहाव होता था..

ये दाहिनी तरह रणवीर मामाजी के खेत है इसको पार करके हमारे....आज कटहल तोड़ा जा रहा है पेड़ से...हाल चाल लेने के बाद एक बड़ा कटहल मुझे भी पकड़ा दिया गया मैंने मना किया तो डांट भी पड़ गयी...बताया गया आ गयी हो तो लेती जाओ वरना हम घर पहुंचाने आते...ये गाँव में एक आम बात है...सब्जी हो या फल या कोई और नयी चीज़...लोग एक दूसरे के घर ज़रूर पहुंचाते हैं...मैं उनका शुक्रिया अदा कर खेत की ओर बढ़ चली...ये खेतों के बीचों बीच ढौं का पेड़ हुआ करता था और उससे चिपका यू के लिप्टिस का..जिसे लोग लिपस्टिक कहते हैं...कहाँ गए दोनों पेड़?? ढौं एक फल होता है सेब जितना बड़ा और भीतर से कटहल जैसा...पकने पर बड़ा ही मीठा और उसका पेड़ तो बहुत ही मज़बूत होता है...क्यूँ कटवा दिया गया...कोई वजह ही रही होगी...लेकिन मेरे बचपन की इन यादों का एक एक कर ग़ायब होना मुझे दुख दे रहा था...जहाँ कभी ये पेड़ हुआ करते थे मैं कुछ देर वहां बनी मेंढ़ पर बैठी रही...बचपन के दिन याद करती रही...नानी की तरह मुझे भी सिर पर कपड़ा जिसे गढ़वाली में मुंडेड़ा कहते हैं बाँध कर दंरात से घास काटना होता था...धान लगने के मौसम में वो घुटने तक के पानी में घुस कर धान लगाने होते थे...मुझे बहलाने के लिए आसान काम बताया जाता कि दूसरी क्यारी से पौध के गड्डियां लेकर आओ पर मैं कहाँ सुनने वाली...एक बार तो गुस्से में जो धान लगे थे वो ही निकालने शुरू कर दिए थे....गोविन्द मामाजी जो हमारे बटाईदार हैं वो बुला लेते फिर क्यारी में....कितनी बार उन पानी भरी क्यारियों में गिर जाती...मिट्ठी में पैर फंस जाते और मैं छपाक वहीँ...फिर कोई न कोई उठाने आता कि पंडित जी कि नातिन गिर गयी...और इतने सबके बाद पूरी शान से घास का एक गट्ठा नानी और मां की तरह मुझे भी अपने सिर पर ले जाना होता था...और वो देखने में छोटा नहीं लगना चाहिए...और दंरात मेरे गट्ठे पर ही लगनी चाहिए...ताकि मुझे बड़ेपन का एहसास हो...सब हँसते थे और मुझे बहलाने के लिए आँखे बड़ी बड़ी करके कहते कि अरे बाप रे इतना बड़ा गट्ठा लेकर कैसे जाओगी...बस मैं तो मारे ख़ुशी के फूली न समाती...हम शहर के बच्चों को ये सब बहुत रिझाता था पर वहां सब जानते थे कि हमारे बस का क्या है और क्या नहीं....अब ये सब याद कर कर के हंस रही हूँ और अफ़सोस भी कर रही हूँ कि काश कोई रिमोट होता जो बटन दबाते ही उस वक़्त को वापस ले आता...बचपन में हम बड़े होना चाहते हैं और आज जब बड़े हो गए हैं तो महसूस होता है ज़िंदगी में क्या कुछ दूर हो गया..सादगी, भोलापन, निश्छलता, साफ़गोई, नादानियाँ, खुशियाँ और छोटी छोटी उम्मीदें और भी न जाने क्या क्या...बचपन के साथी भी तो बिछड़ गए...लड़कियों की शादी हो गयी और लड़के भी नौकरी के लिए गाँव से बाहर पलायन कर गए 

बगल के खेत पर बढ़ चली हूँ दरगाह की तरफ....सरदारों के एक बड़े सभ्रांत परिवार के खेत में बनी है ये...यहाँ की भी अजीब मान्यता है...कि अगर ईंटों से भरी कोई गाड़ी यहाँ 5 ईंट गिराए बिना आगे बढ़ जाती है तो या तो ख़राब हो जाती है या कुछ न कुछ बाधा आ जाती है...उन ईंटों को इकठ्ठा कर यहाँ भवन निर्माण करा दिया जाता है...मानने को नहीं कहा बस मान्यता बताई यहाँ की.....अजीब है पर है..साल में एक बार यहाँ भंडारा भी होता है ..यहाँ से होकर घर लौटती हूँ पक्की रोड के रास्ते हल्का अँधेरा हो चुका है....पेट्रोल पम्प के आगे वाले खेत में एक कोल्हू लगा है...मैं उत्सुकतावश चल पड़ती हूँ...ये तो बंत मामाजी का कोल्हू है...वो हमारे दूसरे खेत के बटाईदार हैं...फटाफट कनस्तर झाड़कर उल्टा करके मेरे बैठने के लिए स्टूल तैयार हो जाता है...और एक पत्ते में गरम गरम गुड़ भी आ जाता है...ये मामूली वाला गुड़ नहीं था...यहाँ गन्ना बहुतायत में होता है...परिवार अपने लिए थोड़ा गुड़ ख़ास किस्म से मेवे डलवा कर बनवाते हैं...ये वही था...मज़ा आ गया...थोडा गुड़ घर के लिए भी बाँध दिया गया.....लौटते में रास्ते में एक नानी के हाल चाल लेने लगती हूँ...वो आज पहाड़ के अपने पुश्तैनी गाँव से लौटी हैं...वहां से मंडुए का आटा जिसे यहाँ चून कहते हैं, और झुंगरियाल के साथ गैथ की दाल पकड़ा देती हैं..बताती हैं कि नाती को बस भेज ही रही थी कि बोडी के यहाँ दे आ....पर जो चीज़ मेरे पसंद की थी वो थी अरसा...अरसा एक मिठाई होती है जो चावल को कूट कर गुड़ के साथ पका कर बनायी जाती है...ये ख़ास मौकों जैसे शादी या बड़ी पूजा या फिर बेटी को ससुराल विदा करते वक़्त ही बनती है...कहते हैं यूँ ही अगर खाने के लिए बनाना चाहें तो ये बनती भी नहीं....मान्यताओं से भरा जीवन है...उसमें एक ये भी सही...पर मेरा काम तो बन गया...इतना सारा सामान लेकर घर वापस आई और देर से आने पर नानी से फिर डांट खायी...बचपन की तरह फिर हंसती रही और नानी से लिपट गयी...बेचारी नानी किसी तरह मुझे डांट कर ख़ुद को अलग कर पायीं..

मेरे पास ददिहाल की ज़्यादा यादें नहीं क्यूंकि वहां मैंने ज़्यादा वक़्त ही नहीं बिताया...दादाजी मेरे पैदा होने से पहले ही गुज़र गए थे और दादी की मृत्यु भी तब हो गयी थी जब मैं बहुत छोटी थी...फिर ददिहाल में एक बड़ा परिवार था और ननिहाल में तो सिर्फ हम लोगों का राज था...तो हम लोग सिरचढ़े भी थे... मेरा भाई नानाजी का सबसे लाड़ प्यार का था और आज भी है...मैं उनसे लड़ती रहती हूँ तो उन्हें लगता है मैं कम ही आया जाया करूँ...बहन एकदम सीधी है...तो वो सबकी लाडली है....मेरा मन यहाँ की यादों से भरा पड़ा है...निकालने बैठूं तो जाने कितना कुछ कह दूँ....कैसे इतने दिन गुज़र गए नानी के साथ हंसी मज़ाक करते, उनकी बातें, किस्से कहानियाँ सुनते, मेरी नानी मनमौजी हैं मतलब वो हर बात यूँ ही नहीं मान लेती मसलन भगवान को मानती हैं पर मंगल, बृहस्पति या शनिवार को मांस न खाना उनकी समझ में नहीं आता....सबको डपट देती हैं पर भीतर से उतनी ही कोमल हैं....ज़रा भी पढ़ी लिखी नहीं लेकिन खेती बाड़ी का पूरा हिसाब किताब ख़ुद देखती हैं और ज़रा भी किसी ने इधर उधर करने की कोशिश की तब तो उसकी खैर नहीं...सेवा के नाम पर भला मैंने क्या किया...बालों में तेल देकर चोटी बना दी, खाना बना दिया, 2 – 4 बाल्टी पानी ले आई या बर्तन मांज दिए...बस उसी में निहाल हुई जाती हैं...बुज़ुर्गों की उमीदें और अपेक्षाएं कितनी छोटी छोटी होती हैं और हम उन्हें भी पूरा नहीं कर पाते...अब लगता है कि ऐसा नहीं था कि इन 3 सालों में मैं यहाँ आ नहीं सकती थी पर जाने क्यूँ मैंने यहाँ आने को अपनी प्राथमिकता में नहीं रखा...लगा मां पापा हैं तो वहाँ...अब अफ़सोस होता है और अपराधबोध भी कि उस वक़्त में जो ख़ुशी दी जा सकती थी वो नहीं दी गयी....मेरा अब यहाँ से जाने का जी नहीं करता...यहाँ किसी भी चीज़ में कोई बनावट नहीं...कोई दिखावा नहीं...कोई चालाकी नहीं...बस यहीं यूँ नानी से गप्पें लड़ाऊं, हंसूं, मुझे ये महसूस हुआ कि मेरी नानी हँसना चाहती हैं खुलकर छोटी छोटी बातों पर पर ज़्यादातर वक़्त उनके पास साथ ही नहीं होता...उनकी जो साथी थी भी वो बच्चों के साथ कोई देहरादून तो कोई काशीपुर चली गयीं..जो हैं वो ज़्यादा चलने फिरने में असमर्थ हैं....अगर बाक़ी नानी लोग गाँव में होती हैं तो रोज़ शाम नानियों की टोली आ ही जाती है...मुझे याद है एक बार जब मैं नानी से गांव छोड़ लखनऊ चलने की ज़िद कर रही थी तो दूसरी नानी, नित्तू की दादी ने डपटकर कहा था...अब हम लोग कहीं नहीं जायेंगे...यहीं रहेंगे, यहीं मरेंगे...हमारा दगड़ा (साथ) है...

नानी को देखती हूँ तो सोचती हूँ 13 साल की छोटी उम्र में जो बच्ची ब्याह के आई थी उसके सपने रहे तो होंगे ही...क्या थे, क्या कुछ पूरे भी हुए या सब टूट गए...कभी किसी ने जानने की कोशिश ही नहीं की....एक लम्बी ज़िंदगी अलग अलग तरह के संघर्ष में बिताने के बाद हंसने की ख्वाहिश रखना तो एक बहुत छोटी सी इच्छा है...

आज जाना है...मैं देख रही हूँ नानी कल से ही चुप चुप हैं...दो दिन हमारा जाना स्थगित हो चुका है...इससे सबसे ज़्यादा मैं और नानी ही खुश हुए थे...मेरी नानी की ये आदत है कि एक दिन पहले से ही वो हम लोगों से कहने लगती थीं कि कल इस वक़्त तुम चले जाओगे...कल इस वक़्त ट्रेन में रहोगे...अब इस वक़्त फलां जगह पहुँच जाओगे.....और ठीक इसी तरह सोचते हुए उनका वो दिन बीतता था जिस दिन हम सफ़र करते थे....नानी कल से ही उदास हैं...कभी नीम के पेड़ तले अकेले बैठ जा रही हैं तो कभी गाय से बातें कर रही हैं....कल जब नानी के बाल बना रही थी तो लग रहा था जैसे दिल भरा जा रहा है....कितना कुछ काम कर जाऊं कि कुछ दिन इन्हें आराम मिल जाये...आज नानी अकेले में छुप छुपकर रो रही हैं...और मैं भी अपनी डबडबायी आँखें छुपाने की कोशिश करती फिर रही हूँ...बड़ी मज़बूत बनकर मुस्कुराते हुए उनके सामने जा रही हूँ...उनकी तो आवाज़ भी आज मद्धम है....जानती हूँ मेरी नानी अब कुछ दिन दूसरे कमरों में जायेंगी ही नहीं....हमारे जाने के बाद वहां का सन्नाटा उन्हें बेचैन कर देता है

प्लेट में हल्दी चावल की फिटाई आ गयी है....नानाजी ने कोई मन्त्र पढ़ कर टीका किया और वो नोट थमा दिया...उसकि क़ीमत दुनिया की सारी दौलत से ज़्यादा है....मैं और नानी फिर लिपट कर रो दिए...दोनों एक दूसरे को चुप भी कराते रहे...और इस बार हंस न सके....वो अड्डे तक नहीं आ पाएंगी पर जब तक मैं उस गली से निकल नहीं आई वो भीगी हुई बूढी आँखें मुझे देखती रहीं और हाथ हिला कर मुझे विदा करती रहीं....6:30 सुबह की बस अपने समय पर थी...हम कोटद्वार की तरफ़ निकल पड़े...बड़े भारी मन से मैं अपने बचपन की यादों से विदा ले रही थी...पर इस बार ये वादा ज़रूर किया था कि यहाँ आना अब फिर जल्दी ही होगा