सोमवार, 10 मार्च 2014

ज़िंदा सपनों, उम्मीद और संघर्ष का लेखा जोखा

आजकल डेरा अहमदाबाद में अपनी बहन के यहाँ डाला हुआ है...अजीब सनक है मुझे....कुछ दिन बाहर न निकलूं तो लगता है ज़िन्दगी थम गयी है....सब कुछ नीरस, रुका हुआ, बेजान, उदास...यूँ तो अपने शहर से मुझे बेइंतहा मुहब्बत है और जो सुकून मुझे वहाँ मिलता है वो कहीं और नहीं मिलता फिर भी ऐसी स्थितियां हो जाती हैं जिन्हें  दुरुस्त करने का बस एक ही इलाज होता है...बैग पैक करो और निकल पड़ो....कुछ लोग अपने खानाबदोश जीवन से परेशान रहते हैं पर मेरे साथ उलट है...कुछ कुछ दिनों में बदलाव नहीं हुआ तो अजीब उदासी घेर लेती है....पर शायद ऐसा होना ज़रूरी भी है वरना प्राथमिकताओं की लम्बी लिस्ट के चक्कर में बाकी सबकुछ तो हो रहा है...घर, बाहर, ऑफिस की सारी जिम्मेदारियां....सांसें भी चल ही रही हैं...बस ज़िन्दगी जीना कहीं दूर पीछे छूट गया है....कम से कम इस बहाने अपनी कोफ़्त या सनक के चलते ही सही मैं ज़िन्दगी जीने और कुछ रिश्तों में प्यार का कलफ लगाने का जुगाड़ कर ही लेती हूँ...घुटन की इन स्थितियों में मेरे दोस्त और मेरी बहन मेरे लिए ऑक्सीजन का काम करते हैं.

मज़े की बात ये कि जिस आवासीय सोसाइटी में मेरी बहन का घर है वहां मेरा स्वागत ऐसे होता है जैसे वहां की  सारी महिलाएं मेरी बहनें हों....शुरू शुरू में तो इस आत्मीयता को समझने में भी वक़्त लग गया था...पर फिर समझ आया कि ये मेरी बहन के कर्मों का बोनस है जो मुझे मिलता है....मेरी बहन बचपन से ही बड़ी व्यवहारकुशल रही है....खटपट दोस्ती करने में और रिश्ते जोड़ने में उसका कोई सानी नहीं....दूसरों के सुख दुःख को उसने हमेशा ख़ुद में महसूस किया है....इसलिए वो जब भी जिस भी शहर गयी है उसने अपने आसपास एक परिवार सा माहौल बना लिया है....बस तो दीदी, भैया, आंटी, अंकल से भरा एक परिवार यहाँ भी बन चुका है....और उस परिवार में मुलाक़ात से पहले ही मेरा नाम भी दर्ज हो चुका था.

इसी परिवार में एक दीदी हैं जो कि किसी गैर सरकारी संगठन से जुड़ी हुई हैं इसलिए उन्हें सब एनजीओ वाली दीदी के नाम से जानते हैं...दीदी ऐसी सख्त हैं कि सारे उनसे डरते हैं....उनका प्यार भी डांट के लहजे में तब्दील होकर निकलता है....इस चक्कर में छोटे बड़े सब दहशत में रहते हैं...यूँ लगता है जैसे उनको देखते ही सबकी जुबां हलक की जगह पेट में कहीं चली जाती है पर हाँ जितनी वो सख्त हैं बच्चों के साथ उतनी ही मस्त...बच्चे उनसे बड़े खुश...कोई बच्चों को कुछ कह दे तो मोर्चा खोल देती हैं...बच्चो की माएं उनसे ख़ासी दूरी बनाकर रखती हैं....क्यूंकि उनका और मेरा कार्यक्षेत्र मिलता जुलता है तो अक्सर बात हो जाती थी...वो शाम को घर पर बच्चों को ट्यूशन पढ़ाती हैं और इस वक़्त यहाँ वार्षिक परीक्षाएं चल रही हैं सो उनसे मिलना जुलना कम ही हो पाया...एक दिन दो तीन मिनट को बात हुई और किसी बात पर महिला दिवस का ज़िक्र आया...उनकी प्रतिक्रिया निराशा, गुस्से और झुंझलाहट से भरी हुई थी...उनका कहना था कि क्या बदला इतने सालों में...स्थितियां बद से बद्तर होती जा रही हैं....हर गली नुक्कड़ में महिला दिवस मनाया जा रहा है....महिला दिवस के मायने बदल गए हैं और महिलाएं आगे बढ़ने की जगह पीछे हो गयी हैं...सोसाइटी की बाकी महिलाओं की ओर इशारा करते हुए उन्होंने कहा कि देखो क्या बदलाव आया है इनमे...इनकी चर्चा के विषय आज भी वो कपडे लत्ते और गहने ही हैं... उनकी ये निराशा विकास से जुड़े हर पहलू पर थी...विकास के मुद्दे पर नरेन्द्र मोदी पर अपनी भड़ास निकल कर और उसे कोस कर वो चली गयीं....पूरी बातचीत के इस आखिरी हिस्से से मुझे बड़ी तसल्ली हुई थी...उनकी इन बातों से काफी हद तक तो मैं भी सहमत हूँ पर उनके जाते ही मैंने ख़ुद से सवाल किया कि क्या वाकई हम इस क़दर पिछड़ गए हैं?? क्या वाकई कोई बदलाव नहीं आया और क्या वाकई हम इस तरह हिम्मत हार सकते हैं??? इस वक़्त पीछे मुड़ कर संघर्ष के एक लम्बे इतिहास के साथ बहुत कुछ देखने समझने की ज़रूरत महसूस हुई कि आखिर कहाँ पहुंचे हैं हम और क्या वाक़ई पूरी तरह से भटक चुके हैं..तो सोचा क्यूँ न एक लेखा जोखा ही कर लिया जाए.

बात की शुरुआत स्व. राजेंद्र यादव जी के शब्दों में करूँ तो “स्त्री हमारा अंश और विस्तार है. वह हमारी ऐसी जन्मभूमि है जिसे हमने अपना उपनिवेश बना लिया है. हमारी सोच और संस्कृति के सारे सामंती और साम्राज्यवादी मूल्य उपनिवेशों के आधिपत्य और शोषण को जायज़ ठहराने की मानसिकता से पैदा होते है...दलित हमारे घरों और बस्तियों से बाहर होता है. स्त्री हमारे भीतर है, इसलिए उसका संघर्ष ज्यादा जटिल है. उनकी मुक्ति स्वयं हमारी मुक्ति है. यानी गुलाम बनाये रखने वाली मानसिक गुलामी से मुक्ति है.” (‘आदमी की निगाह में औरत’ से साभार)

अर्थात ये तो स्पष्ट है कि मौजूदा परिवेश में स्त्री एक संघर्ष और जटिलता का जीवन लेकर ही पैदा होती है....हालांकि बराबरी के उस समाज के लिए कोशिशें बदस्तूर जारी हैं. अपने जीवन के ही फ्लैशबैक में जाऊं को बहुत सारी यादें हैं...ईमानदारी से कहूँ तो अपने बचपन की बहुत खुशहाल तस्वीर नहीं हैं मेरे दिमाग में...एक दब्बू खामोश अंतर्मुखी और बेहद संवेदनशील बच्ची जिसने बचपन से ही अपने आस पड़ोस में हिंसा के अलग अलग रूप न सिर्फ देखे बल्कि महसूस भी किये...सच कहूँ तो परिवार से पहले शायद लोगों का ये व्यवहार ही था जिसने मुझे एहसास दिलाया कि मैं एक लड़की हूँ... मैं लड़कों से अलग हूँ और यौनिकता (ये शब्द तब पता नहीं था) जैसी कोई चीज़ होती है जिसके बारे में किसी से कुछ नहीं कहना चाहिए....मेरी स्मृतियों में आज भी बचपन के वो अनचाहे स्पर्श ताज़ा हैं जो कि ज़्यादातर नन्ही अबोध बच्चियों को कभी बहला फुसलाकर या कभी डरा धमका कर किये जाते हैं....ये सिलसिला जारी रहता अगर बड़े होने पर मैं मुखर न हुई होती और तथाकथित तौर पर बदतमीज़ या मुंहफट न हुई होती ..लखनऊ के जिस पुराने मुहल्ले में मैं रहती थी वहां कई परिवारों में पति द्वारा शराब पीकर रात को पत्नी की पिटाई करना आम बात थी....पति द्वारा सारी संपत्ति शराब में लुटाये जाने के बाद उन सहृदय बुज़ुर्ग महिला जिन्हें पूरा मुहल्ला मामीजी कहता था, का सिलाई करके एक एक दिन की रोटी जुगाड़ने की जद्दोजहद....बहुत कुछ है और शायद बचपन की इन सब बातों ने ज़रूरत से पहले बड़ा कर दिया...मैंने अपने जीवन का एक लम्बा हिस्सा गुपचुप रहके बिताया है...शायद बचपन की वो अप्रिय स्मृतियाँ थी जिनकी वजह से मैंने अपने चारों ओर एक दायरा बना लिया और लोगों से दूरी...दुनिया के अच्छे पुरुषों को मैं अपनी ऊँगली पर गिन सकती थी और उसमे सबसे पहले मेरे पापा आते थे....मार तो दूर की बात है पापा से डांट भी नहीं पड़ती थी....पर चर्चा करने का खुलापन उनके साथ भी नहीं था..भाई 10 साल बड़े थे तो उनके लिए तो मैं बच्ची थी..आज इस बात को सोचती हूँ कि कैसा माहौल मिलता था मेरे जैसी बच्चियों को बचपन में...हमारे घर में हमारा कोई दोस्त नहीं होता था..मेरा तो नहीं था/ थी...ऐसा दोस्त जिससे खुल कर किसी भी तरह की बात की जा सके...जीवन किताबों तक सीमित...इसके अलावा दिलचस्पी, शौक या कला जैसी भी कोई चीज़ होती है ये बड़े होकर पता चला...क्यूंकि पापा शांत थे तो सख्ती करने की ज़िम्मेदारी मां की थी...उन्होंने अपने जीवन में जिस किस्म की कठिनाइयों का अनुभव किया था उस वजह से एक अलग किस्म का गुस्सा और कड़वाहट थी उनके व्यवहार में ...पर ये बातें मैं अब समझती हूँ...तब उनकी सख्ती ने हमारे मन में सिर्फ डर भरने का काम किया था....पापा ने पढाई के लिए बहुत संघर्ष किया था इसलिए वो हम भाई बहनों को अच्छी शिक्षा देना चाहते थे...जाने क्यूँ उम्मीदों का बोझ मुझपर थोड़ा ज्यादा था तो मेरे खेल भी पढाई लिखाई से जुड़े ही होने लगे....जो भी हो पर ऐसे बचपन को खुशहाल और अच्छा बचपन कतई नहीं कहा जा सकता....मैं कभी नहीं चाहूंगी कि मेरे घर के बच्चों का बल्कि किसी भी बच्चे का बचपन ऐसा हो.

7 वीं कक्षा में बेहतर शिक्षा के उद्देश्य से मेरा दाख़िला अंग्रेजी माध्यम स्कूल में करा दिया गया...मुझे यहाँ पहुँचाने में मेरी बहन का सबसे बड़ा योगदान रहा...अंग्रेजी के बढ़ते चलन की वजह से बढ़ते भेदभाव और हिंदी माध्यम के छात्रों के लिए अवसरों की कमी को उसने महसूस किया था...पर इस विद्यालय में आकर नंबर लाने का एक नया संघर्ष शुरू हुआ...भेदभाव के तमाम आयाम मुझे यहाँ आकर पता चले...पढने में तेज़ व कमज़ोर बच्चों के बीच भेदभाव, आर्थिक रूप से मज़बूत और कमज़ोर परिवारों के बच्चों के बीच भेदभाव, और भी कई यादें हैं ऐसी...पर ये भी सच हैं कि कुछ समय बाद आत्मविश्वास भी आया हालांकि उसके लिए भी 3 साल संघर्ष करना पड़ा....पर एक बार मुखर होने के बाद पीछे लौटने की नौबत नहीं आई...जब 11 वीं में थी तो बहन वीमेंस स्टडीज पढ़ रही थी....बहन में आये बदलाव को देखकर मैं उस विषय से इस कदर प्रभावित हुई कि तभी ठान लिया कि  मुझे भी आगे जाकर यही विषय पढना है....स्नातक तक कमोबेश जीवन यूँ ही था...हिम्मत आई विश्वास भी आया पर किसी अपने के बढ़ते ग़लत हौसलों पर प्रतिक्रिया देना अभी भी नहीं आया था...ऐसी बातें मुझे तब भी सन्न कर देती थी और उस व्यक्ति को कोसते हुए मैं फिर अपने बनाये दायरे के अन्दर दुबक जाती.

मेरे जीवन में असली बदलाव एमए के समय से आया...घर के विरोध के बावजूद मैंने वीमेंस स्टडीज विषय चुना...तब से आत्मविश्वास, बदलाव और सोच में जो तरक्की होनी शुरू हुई वो आज भी जारी है जिसके लिए मैं कई सारे लोगों की शुक्रगुजार हूँ जिसमे मेरी अध्यापिका, मार्गदर्शक और बेहतरीन दोस्त प्रो रूप रेखा वर्मा के साथ साथ मेरे दोस्त और मेरी बहन शामिल हैं. सबसे अच्छी आदत जो पड़ी वो थी सवाल करने और तर्क ढूंढने की....इस चक्कर में धर्म और पाठ पूजा के बोझ से भी ख़ुद को हल्का कर लिया क्यूंकि जिन भगवान को मानते आ रहे थे सवालों और तर्कों के इम्तिहान को वो पास न कर सके. 
                 
खैर, मेरे जीवन की ये झलक बहुत थोड़ी है पर इन कुछ बातों का ज़िक्र मैंने इसलिए किया ताकि शुरू में ख़ुद से किये सवाल का उत्तर के एक सिरे तक पहुँच सकूँ...कि क्या वाकई कुछ नहीं बदला है.    
आज के परिवारों में बच्चों को देखती हूँ तो पाती हूँ बच्चियां कहीं ज्यादा मुखर हैं...हाँ यौनिक हिंसा को आज भी हर घर में चर्चा का विषय नहीं बनाया गया है...बच्चों के साथ यौनिक हिंसा आज भी बड़े पैमाने पर होती है पर पहले के मुकाबले ज्यादा घरों में इस विषय को लेकर जागरूकता आई हैं..अभिभावक चौकन्ने हुए हैं...हालांकि इस बात से भी मेरा कोई इनकार नहीं कि ज़रुरत इससे कहीं ज्यादा होने की है.

शिक्षा के स्तर से लेकर अवसरों की उपलब्धता और अन्य कलाओं को प्राथमिकता देने का चलन भी बढ़ा है....फोटोग्राफी, अभिनय, कला, लेखन, विज्ञान, खेल जैसे और कई तकनीकी क्षेत्रों में लड़कियों की भागीदारी बढ़ी है...इन क्षेत्रों को भी करियर के विकल्प में देखा जाने लगा है जो कि अच्छी बात है...लड़कियों का घर से बाहर निकलना बढ़ा है...महिलाओं की राजनीति में रूचि व भागीदारी बढ़ी है... अभी अभी हिंदुस्तान टाइम्स की एक खबर पढ़ रही थी जिसमे कहा गया था कि उत्तर प्रदेश में 2009 में हुए आम चुनावों और 2012 में हुए विधान सभा चुनावों में महिला मतदाताओं की भागीदारी के प्रतिशत में लगभग 16% की वृद्धि हुई थी...2009 में महिलाओं की 44% भागीदारी दर्ज की गयी थी जो कि 2012 में बढ़कर 60 % हो गयी थी. तो ये बात तो साफ़ है कि बदलाव तो यकीनन आये हैं पर हाँ इतना काफी नहीं है... और ये भी सच है कि इन अच्छे बदलावों के साथ प्रतिकूल व स्थितियों को बिगाड़ने वाले बदलाव भी भारी मात्रा में आये हैं.

मसलन, अभी राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो की वर्ष 2012 की रिपोर्ट देख रही थी ...महिला के प्रति हुई हिंसा के आंकड़े तकलीफ और चिंता देने वाले हैं...यहाँ ये बात फिर जोर देकर कहूँगी कि ये वो आंकडें हैं जो सरकारी दस्तावेजों में दर्ज हुए हैं....अधिकांश घटनाओं में शिकायत दर्ज नहीं की जाती है इसकी वजहें कई हैं...ये कथित तौर पर घर की इज्ज़त से जुड़ा मसला होता है, ‘भले’ घर की औरतें थाने या कोर्ट कचेहरी नहीं पहुँचती (ये अलग बात है कि  इन भले घरों में औरतें मारी, पीटी, सताई और यहाँ तक की जला दी जाती हैं पर इससे घर की इज्ज़त पर कोई आंच नहीं आती) और साथ ही पुलिस का असंवेदनशील रवैया और कोर्ट कचेहरी की कमरतोड़ लम्बी और खर्चीली प्रक्रिया उनके हौसले पहले ही पस्त कर देती है...असंवेदनशीलता मानसिकता में इस कदर घुसी होती है कि रवैये, कार्य प्रक्रिया और नतीजे हर जगह ये साफ़ नज़र आती है....अगर इन घटनाओं का भी कोई आंकड़ा मिलता तो कुल आंकड़ों में जो उछाल आता वो इस तथाकथित सभ्य समाज की जो तस्वीर पेश करता उसकी कल्पना करना संभव नहीं...खैर बात करते है दर्ज शिकायतों के आंकड़ों की..
वर्ष 2012 में महिलाओं के प्रति हुई हिंसा के 2,44,270 मामले दर्ज किये गए..2011 की तुलना में ये आंकड़ा 6.4% की वृद्धि दिखाता है...2008 से इन आंकड़ों में 24.7 % की वृद्धि दर्ज हुई है...2008 में ये संख्या 1,95,856 थी. देश के 10 राज्यों में इन घटनाओं की संख्या 10,000 से ऊपर है...3 राज्यों में 5001 से 10000 के बीच है और बाकी राज्यों में इससे कम है......राष्ट्रीय स्तर पर अपराध की दर 41.74 है और असम में ये सबसे ज्यादा 89.5 आंकी गयी है...बलात्कार के 24,923, अपहरण के 38,262, दहेज़ हत्या के 8,233, पति व अन्य रिश्तेदारों द्वारा हिंसा के 1,06,527, महिलाओं के शीलभंग करने के उद्देश्य से किये गए हमलों के 45,351, महिलाओं की अस्मिता और शील (modesty) को अपमानित करने के 9,173 और विदेशों से की गयी लड़कियों की तस्करी/ आयात के 59 मामले दर्ज हुए हैं...ये सभी मामले भारतीय दंड संहिता के अंतर्गत आते हैं....इन अपराधों में 2011 की तुलना में 6.1% की वृद्धि हुई है...इसके अलावा मानव तस्करी के 2,563, महिलाओं की अभद्र अथवा आपत्तिजनक छवि बनाने/ दिखाने के 141 और दहेज निरोधक कानून के अंतर्गत 9,038 मामले दर्ज हुए हैं....विशेष और स्थानीय कानून के अंतर्गत आने वाले इन अपराधों में 23.5% की वृद्धि हुई है. एक आंकलन करने के लिए अगर कुछ अपराधों की सज़ा की दर पर नज़र डालें तो आंकड़े हताश करने वाले हैं. उदाहरण के तौर पर बलात्कार के मामलों में ये दर 24.2, अपहरण में  21.2 , दहेज हत्या में 32.3 और महिला का शीलभंग के उद्देश्य से की गयी हिंसा के मामलों में 24.0 दर्ज की गयी है.                         
                  
ज़ाहिर है तस्वीर बेहद विचलित कर देने वाली है...और ये तस्वीर किसी एक वर्ग, धर्म, जाति, आयु, पेशे या क्षेत्र तक सीमित नहीं...औरत या लड़की का अपने हक के लिए आवाज़ उठाना हमारे समाज में परवरिश का हिस्सा ही नहीं होता है...इस दुनिया में आने से पहले से लेकर जाने तक एक लड़की भेदभाव और हिंसा को अनगिनत रूपों में झेलती है...स्थिति अब सिर्फ चिंताजनक न होकर भयावह हो चुकी है और ये दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र को शर्मसार कर देने वाली बात है....ज़िम्मेदारी सरकार, पुलिस, न्यायपालिका, मीडिया से लेकर आमजन तक की है...जागरूकता एक बड़ा विकल्प होता है लेकिन अब सिर्फ इतना काफी नहीं...कड़े कानून और उनका क्रियान्वयन अब सबसे बड़ी ज़रुरत बन चुका है....कानून व्यवस्था और न्यायप्रणाली को संवेदनशीलता का परिचय देते हुए इन शिकायतों का जल्द निपटारा करने की ज़रूरत है..बल्कि अब तो ज़रूरत एक ऐसी व्यवस्था की भी हो गयी है जो इनकी निरंतर निगरानी करे...स्थितियां अब वो नहीं रहीं जब हम ये कह सकें कि ख़ुद को बदलने से ही सुधार आएगा...जागरूकता का यह स्तर आवश्यक है पर अब उससे कहीं ज्यादा आवश्यक है कड़े कानून होना और उनका क्रियान्वयन सुनिश्चित किया जाना...पीड़िताओं का भरोसा न्यायप्रणाली से उठने लगे और शिकायतकर्ता के दिल में पुलिस की दहशत बैठी हो, ये स्थितियां सरकार और कानून व्यवस्था को भद्दा मजाक साबित करती हैं लेकिन अफ़सोस की बात ये है कि स्थितियां ऐसी ही हैं बल्कि लगातार और भी बुरी होती जा रही हैं.    
  
वैश्विक स्तर पर देखें तो यूएन वुमन के शोध के अनुसार अनुसार, विश्व भर में 66% कार्य महिलाओं द्वारा किया जाता है, 50% खाद्य सामग्री का उत्पादन महिलाओं द्वारा किया जाता है लेकिन इस कार्य के बदले महिलाओं की आय का हिस्सा सिर्फ 10% होता है और दुनिया भर में महिलाओं को सिर्फ 1% संपत्ति पर ही स्वामित्व प्राप्त है...एक बड़ी खाई सदियों से बनी है जो गहरी और चौड़ी होती जा रही है...वो काम के घंटों की हो, समान कार्य के लिए असमान वेतन की हो, कार्यक्षेत्र में होने वाले भेदभाव की हो या संपत्ति पर अधिकार की हो.

उदाहरण के लिए भारत में ही देखें तो आज भी लोग संपत्ति पर अधिकार देने की जगह लड़कियों को शादी में दहेज  देते हैं...ऐसा करके वो एक कुरीति के साथ साथ कभी न ख़त्म होने वाले लालच और इसके नतीजे में मिलने वाली हिंसा को बढ़ावा देते हैं. ये सोच ही बेहद हास्यास्पद होती है कि अधिक दहेज दिए जाने पर ससुराल में बेटियों को खुश रखा जायेगा....आये दिन की घटनाओं से ये स्पष्ट है कि शादी नाम की संस्था के चरमराने की एक बड़ी वजह ये रवैया भी है...इसके अलावा ये चलन ग़लत उदाहरण पेश करते हुए आर्थिक रूप से अक्षम लोगों पर बोझ बढ़ाने का काम करता है और विवाह को रिश्तों की ऐसी दुकान बनाता है जहाँ बोली तो लड़कों की लगती है पर सारे इम्तिहान लड़की को देने पड़ते हैं.....साथ ही ऐसी संपत्ति से लड़की का कोई सशक्तिकरण नहीं होता...पर ख़ुद माता पिता का ये मानना होता है कि अचल संपत्ति (जिसका मूल्य अधिक होता है) पर बेटे का अधिकार होता है...कानूनी हक होने के बावजूद अगर बेटी संपत्ति पर अपने हिस्से की मांग कर ले तो उसे तीखे ताने देने से कोई पीछे नहीं हटता...इसके साथ एक बात और कहना ज़रूरी लगता है...बेहद क़ाबिल और अच्छी लड़कियों को भी आज के समय में एक असफल विवाह का दंश झेलना पड़ रहा है...ऐसे में सबसे पहले लड़की को और उसकी महत्वाकांक्षाओं को ही ज़िम्मेदार ठहराया जाता है...लड़की से ही त्याग की न सिर्फ उम्मीद लगायी जाती है बल्कि विवाह को सफल बनाने की सारी ज़िम्मेदारी उसके ऊपर ही डाल दी जाती है...ऐसा करने में लड़की के मां बाप और अन्य रिश्तेदार बढ़ चढ़कर हिस्सा लेते हैं...अत्यंत विषम परिस्थितियों मे यदि ससुराल से अलग होने की नौबत आये तो मां बाप और भाइयों की हवाइयां उड़ने लगती हैं जैसे एक बड़ा बोझ आ गया हो...उसे हौसला दिए जाने की जगह ‘एडजस्ट’ करने की सलाह दी जाती है..घर से डोली और ससुराल से अर्थी उठने की मानसिकता आज भी उतनी ही मज़बूत है...ऐसे में या तो महिला ऐसे जीवन को नियति मानकर बर्दाश्त करे, या फिर अगर हिम्मत रखती है और सक्षम है तो ससुराल और मायके दोनों से अलग रहकर नए सिरे से ज़िन्दगी की जद्दोजहद शुरू करे...अपनी जान देने का विकल्प भी कई महिलाएं अपनाती हैं...मैं किसी ऐसी महिला को नहीं जानती जो ऐसी स्थितियों में पूरे हक से अपने मायके जाकर संपत्ति पर अपने हक की मांग की हो.....मेरी ही एक सहेली 8 साल से अपने ससुराल में यूँ ‘एडजस्ट’ करने को विवश है....जब उसके पिता को मैंने समझाने की कोशिश की तो उन्होंने मुझसे कहा हमारे यहाँ ऐसा नहीं होता, दो बच्चे हो गए हैं अब दोबारा शादी भी नहीं होगी....मेरी मौसेरी बहन का असफल प्रेम विवाह तलाक पर ख़त्म हुआ पर उसके माता पिता ने उसको इस मानसिक तकलीफ से निकालने की बजाय साल भर के भीतर उसकी दोबारा शादी करवाने को अपना उद्देश्य बनाया और ऐसा करवाकर ही दम लिया....ख़ुद मुझसे ही मिलने वाले हर दूसरे इंसान का पहला सवाल और चिंता मेरी शादी से जुड़ी होती है..मतलब ये कि लड़की के जीवन में विवाह एकमात्र और आखिरी उद्देश्य होता है......उसके सपने, पहचान, अस्मिता, काम, क़ाबिलियत और प्राथमिकताएं शादी तक ही सीमित होती हैं.... इसके बिना उसका जीवन निरर्थक है. 
                      
ज़ाहिर है हक और हुक़ूक़ की लड़ाई में महिलाएं दुनिया भर में पीछे हैं... कभी धर्म, कभी जाति, कभी कर्त्तव्य, कभी परंपरा तो कभी संस्कारों के नाम पर महिलाओं को पीछे धकेलने की कोशिशें लगातार जारी हैं....साथ ही बाज़ार ने खूबसूरत जाल बिछा कर अधिकाँश महिलाओं को अपनी गिरफ्त में लेकर उन्हें वस्तु में तब्दील करने में कोई कसर नहीं छोड़ी है...अब उसका काम करना ज़रूरी है पर उसका गोरा दिखना भी उतना ही ज़रूरी है...वो डॉक्टर हो पर घर आकर फर्श पर पोंछा कैसे मारा जायेगा, बच्चे किस साबुन से हाथ धोयेंगे और बर्तन धोने के लिए कौन सा साबुन आएगा ये भी वो ही देखेगी....ये निर्णय लेने में भागीदारी नहीं है बल्कि बाज़ार के चालाक और कुटिल दिमाग ने उसे दोगुने कार्यबोझ के नीचे दबा दिया है..मीडिया ने इसे पूरी तरह से मज़बूत करने का काम किया है...अधिकाँश अखबार व न्यूज़ चैनल अब खबर का माध्यम न होकर बाज़ार के हाथों की कठपुतली बन चुके हैं और दुकानों में तब्दील हो चुके हैं....मीडिया की भूमिका पर विस्तार से बात फिर कभी होगी.

तो हमारा धर्म, मान्यताएं रिवाज़ तो तस्वीर को बेहतर बनाने से रहे...रुढियों, पिछड़ी मान्यताओं और हर उस व्यवस्था को खुली चुनौती देना बेहद ज़रूरी है जो किसी भी तरह पितृसत्ता या गैर बराबरी के सामाजिक ढाँचे को मज़बूत करती हो....तस्वीर अच्छी तो बिलकुल नहीं और बदलाव के जिस दौर में हम हैं उसमे भटकाव की ज़बरदस्त गुंजाईश और डर है....पर उम्मीद का साथ नहीं छोड़ा जा सकता यहाँ तक लाने में भी जाने कितने लोगों का सदियों का संघर्ष शामिल है..उनकी हिम्मत और जज्बों ने तस्वीर में बड़े बदलाव किये हैं जो आजादी, हक और सशक्तिकरण के किसी न किसी रूप में आज हमारे सामने हैं और सबसे बड़ी बात तो ये की इस विषय को मुद्दा बनाया है....इतिहास पर नज़र डालें तो कई मामलों में हम यकीनन एक बेहतर माहौल में हैं...हम यहाँ से वापस नहीं पलट सकते इसलिए हम संघर्ष और उम्मीद दोनों को साथ लेकर चलेंगे....ये सच है कि इस भटकाव की वजह से कई बार आन्दोलनकारियों का मजाक बना दिया जाता है पर ये उस संघर्ष का ही एक हिस्सा है और कहीं न कहीं ये पितृसत्ता और रुढ़िपंथियों की खिसियाहट को दिखाता है...ये संघर्ष बराबरी के समाज के लिए है...इसमें पुरुषों की भागीदारी उतनी ही ज़रूरी है जितनी महिलाओं की क्यूंकि इस ढाँचे ने कर्त्तव्य और परम्पराओं की बेड़ियों में उन्हें भी ठीक उसी तरह कसा है जैसा कि महिलाओं को...मज़बूत और सख्त बनाने के चक्कर में उनकी मानवीय भावनाएं छीन ली हैं. मैं नकारात्मक सोच के साथ आगे नहीं बढ़ सकती और ये समय स्थितियों के आगे घुटने टेकने का नहीं बल्कि उनसे और भी उत्साह और मजबूती के साथ लड़ने का और अपनी कोशिशों को निरंतर जारी रखने का है...हम संख्या में भले कम हैं पर हम अकेले नहीं और ये मुद्दा किसी अकेले का नहीं....तस्वीर हर पल बदल रही है....मेरा विश्वास है कि इस लड़ाई से ये और बेहतर होगी....ये तो नहीं कह सकती कि कब लेकिन मुझे पूरा विश्वास है कि वो सुबह कभी तो ज़रूर आएगी....ऐसी स्थिति में हौसलों को जिंदा रखने के लिए ही पाश बरसों पहले ये पंक्तियाँ कह गए थे:

मेहनत की लूट सबसे ख़तरनाक नहीं होती
पुलिस की मार सबसे ख़तरनाक नहीं होती  
गद्दारी, लोभ की मुट्ठी सबसे ख़तरनाक नहीं होती

बैठे बिठाये पकडे जाना बुरा तो है
सहमी सी चुप्पी में जकड़े जाना बुरा तो है
पर सबसे ख़तरनाक नहीं होती

सबसे ख़तरनाक होता है
मुर्दा शान्ति से भर जाना
ना होना तड़प का
सब कुछ सहन कर जाना
घर से निकलना काम पर
और काम से लौटकर घर आना
सबसे ख़तरनाक होता है
हमारे सपनो का मर जाना 

रविवार, 23 फ़रवरी 2014

घोंसला हौसलों का..

अहमदाबाद. यह शहर मेरे लिए अनजाना नहीं लेकिन कुछ ख़ास जाना पहचाना भी नहीं....यहाँ के चटख रंग, ऊर्जावान और मेहनती लोग, साधारण जीवनशैली और गरबे का संगीत...बहुत कुछ है जो किसी को प्रभावित कर देता है पर एक संवेदित नागरिक के तौर पर सोचूं तो गुजरात के साथ काले अध्याय भी जुड़े हुए हैं जिनका असर आज भी ज़िन्दा है.....ख़ैर...इस बार यहाँ आने की वजह पारिवारिक थी...अभी तक बाहर निकलना ज्यादा हुआ ही नहीं पर घर बैठे ही कुछ देखा महसूस किया वहीँ यहाँ साझा करुँगी.

कहते हैं प्रेरणा लेने के लिए दुनिया, लोग, समय, उम्र, क्षेत्र इत्यादि की कोई सीमाएं नहीं होती पर बात यहाँ उससे एक क़दम आगे जाकर जब आपको ये एहसास अपने आस पास के जीव जंतुओं को देख कर हो जाये....ज़रुरत बस ख़ुद को उनसे जोड़कर महसूस करने की होती है.....मसलन कभी झूमकर नाचते हुए मोर को देखिये, जी करेगा कि दुनिया भूलकर उसके साथ झूमें नाचें...ख़ुद के अन्दर के सोये हुए बेपरवाह इंसान को फिर ज़िन्दा कर दें...जंगल में चौकड़ी भरते हिरणों के झुण्ड को देखिये, आप याद करने लगेंगे कि वो आख़िरी बार कब था जब आप दोस्तों के साथ यूँ ही किसी दिन सड़क पर निकल पड़े थे या वो कब था जब आप खुल कर कुछ यूँ हँसे थे कि आँखें गीली हो गयी थीं....सड़क पर या मिट्टी में लोटते उन नन्हे मुन्ने शावकों को देखिये आपको अपने बचपन के दिन याद आ जायेंगे जब खेलते हुए धूल मिट्टी में गिरना पड़ना आम बात होती थी या ज़िद में सड़क पर लेट जाना ब्लैकमेल करने का सबसे आसान तरीका.

ज़िन्दगी उम्मीदों का नाम है और उम्मीदें ज़िन्दा रखने के लिए मज़बूत हौसलों का होना बहुत ज़रूरी है....एक दिन यूँ ही जब आसमान बादलों से घिरा था और कमरे में बैठकर कॉफ़ी की चुस्कियां लेते हुए नज़र बाहर बालकनी में पड़ी तो कबूतरों का एक जोड़ा दिखा...बेहद प्यारा पक्षी होता है ये, जो इस शहर में बेइंतहा पाया जाता है....यहाँ सुबह अलार्म की आवाज़ से न होकर कबूतरों की गुटरगूं से होती है...मेरी बहन का घर ऊंची इमारतों वाली जिस सोसाइटी में हैं वहां अक्सर महिलाएं इसी कोफ़्त में बडबडाती दिख जाएँगी कि इन कबूतरों ने तो जीना दूभर कर दिया है...हर वक़्त शोर...खिड़की या दरवाज़ा खुला छोड़ दो तो अन्दर घुस आते हैं...बालकनी में फिर घोंसला बना दिया है वगैरह वगैरह....कबूतरों के साथ इनकी ऐसी नोकझोंक से दो बातें बहुत याद आती हैं...एक, हर किसी के बचपन में एक ऐसा बुज़ुर्ग (नानी, नाना, दादी, दादा या कोई और भी) ज़रूर होता था जिसे परेशान करना बच्चों का पसंदीदा शगल होता था. ये बुज़ुर्ग परिवार, मोहल्ले, गाँव, कहीं के भी हो सकते थे...बच्चों की शैतानियों से गुस्साए ये बुज़ुर्ग उनको डपटते, भगाते, उनके मां बाप से उनकी शिकायत करते या छड़ी लेकर उनको दौड़ाते कभी भी देखे जा सकते थे....पर किसी दिन अगर ये ही बच्चे उन्हें नहीं दिखते तो सबसे ज्यादा बेचैनी भी इनको ही हो जाती..या किसी दिन माता पिता बच्चों को डांट रहे होते तो बचाने भी सबसे पहले ये ही पहुँचते क्यूंकि डपटने का हक़ सिर्फ इनका ही होता था...एक अलग क़िस्म का रिश्ता होता था इन बुजुर्गों और बच्चों में....कुछ ऐसा ही रिश्ता है यहाँ मंडराते इन कबूतरों और इन महिलाओं में....दूसरी जो बात बहुत याद आती है वो है टॉम एंड जेरी कार्टून....बिलकुल वैसा ही युद्ध छिड़ा रहता है दोनों में...  
    
हाँ तो....बालकनी में दिखा कबूतरों का जोड़ा अपनी अपनी चोंच में तिनके दबाये....और उन गोल नारंगी चौकन्नी आँखों से इधर उधर टुकुर टुकुर देखते. कपड़ों का जुगाड़ करने के कार्यबोझ से पंछी अभी बचे हुए हैं पर भोजन  और मकान का सवाल इनके सामने भी होता है...तो आज ये जोड़ा अपने आशियाने की तलाश में निकला था और जगह जो उसे पसंद आई, वो थी दीदी की बालकनी में मोड़ कर खडी की हुई कालीन.....जो भी मापदंड होते होंगे एक अच्छे, सुरक्षित, हवादार आशियाने के, उनमें शायद ये जगह एकदम सही बैठी....बस तब फिर क्या तिनका तिनका जोड़कर घर तैयार करने की कवायद शुरू हो गयी.....पंख फैलाये उड़ान भरते हुए दोनों कभी नीम तो कभी अमलतास के  पेड़ पर पहुँच जाते और चोंच में दबा लाते अपने घर के लिए एक तिनका....मैं सोच रही थी कि  कितना अच्छा और आसान होता है इन पक्षियों के लिए....कोई लोन नहीं लेना, कोई ज़मीन नहीं खरीदनी बस ये तय करो कि कहाँ बनाना है घोंसला और शुरू हो जाओ...मेरी ये ग़लतफहमी को कुछ पलों में ही तगड़ा झटका लगा जब बडबडाती हुई मेरी बहन बालकनी में पहुंची.....”उफ़ इन कमबख्त़ कबूतरों ने तो हैरान कर दिया है....घर के बाकी काम क्या कम पड़ते हैं जो ये चले आते हैं काम बढ़ाने...एक तरफ सफाई कर करके दम निकला जाता है उस पर ये चले आते हैं घोंसला बनाने” और बस ये कहने के साथ ही वो आधा बना घोंसला धराशायी कर दिया गया....मैं उसकी परेशानी और गुस्सा समझ सकती थी पर फिर भी अफ़सोस हुआ जो तब और बढ़ गया जब चोंच में तिनका दबाये कबूतरों का वो जोड़ा बालकनी में पहुंचा और अपना घोंसला वहां न पाकर विस्मय से इधर उधर देखने लगा....उन्हें यूँ देखकर मुझे बहुत तकलीफ़ और मायूसी हुई....ऐसा लगा कि कितनी तकलीफ़ हो रही होगी इन दोनों को अपनी इतनी देर की मेहनत को ज़ाया होते देख कर...उनका उत्साह और हौसला टूटा होगा ....पर अब मेरी इस सोच को झटका देने का काम इन कबूतरों का था....पूरी दृढ़ता (जिसे मेरी बहन ढिठाई कहती है) से उन्होंने अपने तिनके दोबारा ठीक उसी जगह रखे....और उनका नन्हा आशियाना बनाने का सिलसिला फिर शुरू हो गया....अब ये खुली चुनौती थी और अब इस खेल में वास्तव में मज़ा आ रहा था....इधर घोंसला गिराया जाता और उधर अगला तिनका ठीक उसी जगह फिर पहुँच जाता...जैसे कहा जा रहा हो कि आप चाहे जो कर लें घर तो यहीं बनेगा...खुली दबंगई जैसा कुछ.....पर हाँ एक बात गौर देने वाली थी....याद करने की कोशिश करूँ तो बामुश्किल ऐसे चंद इंसानों को ही याद कर पाऊँगी जो अपने अन्दर ऐसी ज़िद, हिम्मत, हौसला और मज़बूत इरादे रखते हों...इंसानों को जीवन की चुनौतियाँ और हार इन जीवों की तुलना में जल्दी तोड़ती हैं या कमज़ोर तो कर ही देती हैं और अगर मसला किसी बुनियादी ज़रुरत से जुड़ा हो तो भावनाएं और भी जल्दी आहत होती हैं....मैं हैरान भी थी और बेहद प्रभावित भी...जो सबक मुझ तक पहुंचना था वो अब तक पहुँच चुका था...मैं मुस्कुराकर देख रही थी अपने इन नए जिद्दी बेख़ौफ़ दोस्तों को....6–7 बार तो गिराया ही जा चुका था पर उसी ऊर्जा से बदस्तूर जारी है सिलसिला बनाने का....एक घोंसला हौसलों का !! 

सोमवार, 13 जनवरी 2014

उन 'आधुनिक' पुरुषों से मुख़ातिब हम 'पिछड़ी' लड़कियां



इस तथाकथित डेवलपमेंट सेक्टर से जुड़े हुए लगभग 8 साल पूरे हो चुके हैं....पढाई को भी जोड़ दूँ तो 10 साल. वक़्त बहुत तेज़ी से गुज़रा. पढाई के दिनों में एक ख़ास छवि थी इस क्षेत्र की मेरे दिमाग में. कि ये क्षेत्र उन जुझारू, बहादुर, संवेदित और जानकार लोगों का है जो वाकई में समाज को बदलने की न सिर्फ नियत और इच्छा रखते हैं बल्कि विरोध और कठिनाइयों से निपटने की कुव्वत भी. उस ख़ास बुद्धिजीवियों की जानकारी का भंडार और जूनून देख कर चकित भी होती थी और प्रभावित भी. ऐसा महसूस होता था की काश हम भी कभी इन जैसे बन सकें. ये ही वो लोग हैं जो बराबरी का समाज लाने का माद्दा रखते हैं. पर इतने सालों में ये छवि न जाने कितनी बार टूटी, कितनी बार बदली और इस क्षेत्र का एक असली और बेहद अलग चेहरा एक दु:स्वप्न की तरह झकझोर कर चला गया. मैं यहाँ ये बात साफ़ कर दूँ कि मैं शिद्दत से इस बात को मानती हूँ कि अच्छे लोग कम हैं पर वे हर जगह मौजूद हैं बल्कि शायद उनकी वजह से ही उम्मीदें आज भी जिंदा हैं. साथ ही इस लेख का आशय ये कतई न निकाला जाय कि मैंने हर पुरुष या लड़के को एक ही वर्ग में लाकर खड़ा कर दिया है. चूँकि बीते कुछ दिनों में एक के बाद एक घटनाएं मेरे आस पास के लोगों के साथ साथ मेरे साथ भी घटीं इसलिए इस तरह के लोगों के ख़िलाफ़ बोलना ज़रूरी हो गया है. अब इस बात में कोई संदेह नहीं कि अन्य क्षेत्रों की भांति ये क्षेत्र भी अत्यधिक प्रदूषित हो गया है. ये प्रदूषण मानसिकता से लेकर आचरण तक हर जगह है. सबसे ज्यादा ख़तरनाक बात ये है कि ऐसा करने वाले बुद्धिजीवी लोग वो हैं जो मंचों पर अपने भाषणों में, अपनी किताबों व लेखों में बड़ी बड़ी आदर्श बातें करते हैं. इन लोगों से युवा खासे प्रभावित होते हैं और इन्हें अपने आदर्श के तौर पर देखते हैं. लेकिन गुस्से, घृणा, नफरत और अफ़सोस से भरा होता है वो पल जब इनकी दुहरी मानसिकता और ओछापन नज़र आता है.

आज मैं इस बात को पूरी मज़बूती के साथ कहती हूँ कि कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि व्यक्ति किस संस्था से जुड़ा हुआ है. उनकी सोच की ये गन्दगी हर स्तर पर है. बात ग्राम, ज़िले या प्रदेश स्तर की संस्थाओं की हो या बड़ी अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं की.....सोच का ये दिवालियापन हर जगह काबिज़ हो चुका है. इसे सोच के खुलेपन से लेकर, फैशन और मौज मस्ती के रूप में देखा जा रहा है. एक लड़की से मुख़ातिब हर दूसरा आदमी उसमें मौका तलाशता हुआ मिलता है. ये सोच रखना कि महिला अधिकारों और बराबरी की बात करने वाले ये पुरुष संवेदित हैं, अक्सर एक भद्दा झूठ साबित होता है. वो पुरुष जानकार, पढ़ा लिखा, अच्छा वक्ता और प्रदर्शनकारी तो हो सकता है पर वो एक संवेदित इंसान हो या अपने उन भाषणों पर अमल करने वाला हो ऐसा कतई ज़रूरी नहीं. ये लोग हमारे आस पास होते हैं, हमारे अध्यापक, बॉस, सहकर्मी या कई बार ये वो भी हो सकते हैं जिन्हें हमने अभी तक अपने आदर्श के रूप में देखा हो. ये हमारे जानने में कोई भी हो सकते हैं इसीलिए ये लोग ज़्यादा ख़तरनाक होते हैं. अपनी पढाई पूरी करके इस क्षेत्र में काम करने आई लड़कियां इनकी सॉफ्ट टार्गेट होती हैं जिन्हें ये आसानी से अपनी बातों से प्रभावित भी कर लेते हैं और फंसा भी लेते हैं. बीते कुछ दिनों में मेरी मित्र के साथ और पिछले कुछ दिनों में मेरे साथ घटी इस घटना ने एक बार फिर झटका दिया. हमारी उस सोच को फिर पुख्ता किया कि कोई फ़र्क नहीं पड़ता वो पुरुष कौन है, क्या है, क्या करता है, उसकी सामाजिक, वैचारिक, शैक्षिक पृष्ठभूमि क्या है, चाहे कुछ हो जाए उस पर भरोसा करने की ग़लती मत करो. उनसे बात भी मत करो, और ये सोच तो भूल के भी मत रखो की चूँकि तुम और वो एक ही क्षेत्र में काम करते हैं या एक ही ऑफिस में काम करते हैं तो औपचारिक शिष्टाचार या एक दूसरे की मदद करना सामान्य बात है. बच के रहो क्यूंकि तुम्हारे इस आचरण का मतलब ये कुछ और ही निकालते हैं. अपनी सोच की सारी हदें पार करते हुए वो तुम्हारे इस व्यवहार का नतीजा ये निकालते हैं कि तुम उनके लिए उपलब्ध हो. और अगर उनके इस व्यवहार पर कोई आपत्ति जताती हो तो इसका साफ़ मतलब ये है कि तुम्हे अपनी सोच और नज़रिया खोलने की ज़रूरत है. उनके हिसाब से तुम्हें उनके भद्दे मज़ाक पर कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए, उनके चाय, कॉफ़ी या उनके साथ घूमने जाने की इच्छाओं को पूरा करना चाहिए, अपनी सोच और मानसिकता को बदलते हुए इस खुलेपन को अपनाना चाहिए जिसमें उनके बेहुदे स्पर्श पर तुम्हे आपत्ति, गुस्सा, या घृणा का भाव आने की जगह मज़ा आये. इसे फैशन और अपनी देह की स्वतंत्रता समझना चाहिए. यही बराबरी है, यही चलन है, यही सशक्तिकरण है और उनके हिसाब से यही सही है.

पर क्या किया जाये. पुरुषों की ऐसी खेप को कैसे समझाएं कि महाशय हम बड़ी ढीठ लड़कियां हैं, और आप जैसे लोगों ने हम लोगों को चालाक भी बना दिया है, सड़क, बस, ऑटो, स्कूल, दफ्तर हर जगह आप जैसे लोग मौका तलाशते मिल ही जाते हैं. कई बार हमारी तेज़ी आपको फ़ौरन आपकी हदें बता देती है और कभी कभी थोड़ी देर हो जाती है....आप उस वक़्त बच निकलते हैं. पर हाँ इतना ज़रूर तय है कि आपके चंगुल में तो हम आने से रहीं और ये भी तय है कि देर सवेर आपको सबक सिखाने में हमे रत्ती भर संकोच न होगा, और उस सबक की भाषा, यकीन मानिए वही होगी जो आप समझते हैं और आप जिसके योग्य हैं. हो सकता है आपके हिसाब से हम बेहद दकियानूसी और सोच से पिछड़ी हों, हम आधुनिकता, तरक्की और खुलेपन के उस मापदंड पर बिलकुल भी फिट न बैठते हों जो आपकी उन तरक्कीपसंद बहुराष्ट्रीय कम्पनियों में हमारी मौजूदगी को सार्थक करे पर क्या करें इन चुनौतियों ने मज़बूत कर दिया है हमें. हम न सिर्फ़ आपकी घटिया हरकतों के दुर्ग को भेदेंगे, आपके क्षेत्र में आपके सामने अपनी मौजूदगी मज़बूती से दर्ज कराएँगे, कहीं कोई समझौता नहीं करेंगे बल्कि वक़्त आने पर आपको सबक सिखाने से भी नहीं चूकेंगे. हर बार आपका वक़्त अच्छा हो और आप बच निकलें ये मौका अब तो आपको मिलने से रहा. मैं हैरान हूँ तुम मर्दों के बढ़ते उस हौसले पर जिसमे अपने इस व्यवहार पर तुम्हें शर्मिंदगी होने की जगह गर्व होता है.

लड़कियों इस बात को जान लो कि न समाज, न समाज का ढांचा और न समाज के ठेकेदार, कोई भी तुम्हारी तरफ़ नहीं है. हर किसी को सवालिया नज़र से देखना यूँ तो सही नहीं पर जो स्थितियां हैं उसमें सिर्फ ये ही सही है. भरोसा सिर्फ खुद पर करो और दूसरों पर जितना भी करो अपनी सारी ग्रंथियां खोल के करो, कोई फर्क नहीं पड़ता सामने कौन है. किसी भी शर्त पर, किसी भी तरह के फ़ायदे के लिए ख़ुद को समर्पित करने से बचो. तुम्हारी दैहिक स्वतंत्रता से जुड़ा निर्णय लेने का हक़ सिर्फ और सिर्फ तुम्हारा है. किसी और को ये हक़ नहीं बनता कि वो उस पर तुम्हे सलाह भी दे. और हाँ कई बार आपका दिमाग उस वक़्त साथ नहीं देता पर ये तय कर लो कि इन लोगों को इनकी जुबां में सबक सिखाना बहुत ज़रूरी है. खुद को सुरक्षित रखने के लिए भी और उन तमाम लड़कियों को हौसला देने के लिए भी जिनकी उम्मीद तुम सब हो. वो जानकार हैं, बुद्धिजीवी हैं, पढ़े लिखे हैं, अनपढ़ हैं, विद्यार्थी हैं, बेरोजगार हैं, अफसर हैं, गरीब हैं, अमीर हैं, रसूखवाले हैं, रिश्तेदार हैं या कोई भी हैं. हमारी बला से. तुम्हारा शोषण करने वाले या तुम्हारी ज़िन्दगी तय करने वाले ये कोई नहीं...महाशय आपकी दोहरी मानसिकता आपको मुबारक जो बड़ी बड़ी बातें करने के बाद खुलेपन और दैहिक स्वतंत्रता का हवाला देकर स्त्री को एक उपभोग की ही वस्तु बनाती है. हाथों में नोबेल विजेताओं की किताबें होना, बड़े क्रांतिकारियों के विचार मुंहजुबानी याद होना, शराब पीना, लड़की के शरीर के हर हिस्से तक अपनी पहुँच बनाना आपके लिए चलन होगा. पर अपनी इस आदत और हरक़त को खुद तक ही रखिये और खुद को हम सबसे दूर रखिये. आप एक अच्छे इंसान होते तो साथ चलने में हमें भी ख़ुशी होती. पर ऐसा नहीं है और अकेले हम अब भी नहीं. आप जैसों की तादाद बहुत ज्यादा है पर हम जानते हैं दुनिया में एक बड़ी तादाद उन अच्छे पुरुषों की भी है जो हमारा साथ देने, हौसला बढाने, इंसानियत में विश्वास को जिंदा रखने के साथ साथ आपको आपकी सही जगह याद दिलाने में हर क़दम पर हमारे साथ होते हैं.   

शुक्रवार, 20 दिसंबर 2013

ठसक बनारस की ....


इस शहर से ये मेरी पहली मुलाक़ात थी. बहुत समय से यहाँ आना चाहती थी पर अपनी तमाम महत्वाकांक्षाओं के जाल में फंसे हुए मेरे जैसे लोगों की प्राथमिकताओं में ‘ज़िन्दगी जीना’ शायद कहीं पीछे छूट गया है. शायद यही वजह थी कि यहाँ आना हुआ तो वो भी व्यावसायिक कारणों से. अवध की शामों को तो बचपन से देखती आ रही हूँ. ये अलग बात है की शामें मुझे कभी पसंद नहीं रहीं, वो मुझे एक अलग किस्म की उदासी से भर देती हैं. रातें मुझे सुकून तो सुबह मुझे ऊर्जा देती है . तो अब बारी थी बनारस की मशहूर सुनहरी सुबह देखने की. 
एक अलग क़िस्म का चुम्बकीय आकर्षण है इस शहर में. आप हर एक चीज़ की तरफ खिंचते हैं. एक बड़ी वजह ये भी है कि लखनऊ में जिस ज़िन्दगी और देसीपन को अब दम तोड़ते देख रही हूँ वो यहाँ की हर चीज़ में अब भी दिखाई देती है. मैं इस बात से इनकार भी नहीं करती कि यहाँ कुछ नहीं बदला होगा. शायद यहाँ के पुराने लोगों के लिए बनारस भी वैसे ही बदला होगा जैसे मेरे लिए लखनऊ और शायद रह रह के उनके दिल में भी इस बदलती तस्वीर की टीस ज़रूर उठती होगी.
पतली संकरी गलियाँ, कंचे खेलते, पतंगों के पेंच लड़ाते बच्चे, लखौडी ईंटों के मकान, दीवारों की दरारों से निकलते पीपल के पौधे, गोल टोपी और हिना से रंगी दाढ़ी वाले खां साहब की वो रंग बिरंगी पतंगों की दुकान जहाँ वो पहले तो बच्चों को बनावटी गुस्सा दिखा कर डपटते पर थोड़ी देर में उनकी मासूमियत के आगे मुस्कुराकर घुटने टेक देते, छतों पर सर्दियों की गुनगुनी धुप में बैठी महिलाओं की चुहलबाजी, छतों से ही अगल बगल के घरों में कटोरियों की अदला बदली..पीपल के पेड़ वाले चबूतरे पर बैठी बुजुर्गों की मंडली और उनकी गप्पें...मैं अपने बचपन के दिनों में वापस चली गयी थी. एक लम्बे अरसे बाद मैंने आदाब का जवाब राम राम से सुना. मैं यहाँ ये साफ़ कर दूँ कि मैं कतई ये नहीं कह रही कि मैं वाराणसी को धार्मिक सौहार्द के लिए प्रेरणा के तौर पर देख रही हूँ...पर टुकड़े टुकड़े में मिल रहे ये अनुभव मुझे कहीं मुझे पुराने लखनऊ की, अपने बचपन की याद दिला रहे थे और मुझे वहां लौटना अच्छा लग रहा था. अच्छा शायद इसलिए भी लग रहा था कि मैं उन दो समुदायों को साथ में इतने आराम से रहते हुए देख रही थी जिनको आज राजनीतिज्ञों ने एक दूसरे का दुश्मन बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी है. लखनऊ से इतर यहाँ अल्पसंख्यक समुदाय कुछ हिस्सों तक सीमित नहीं थे. ये वही बनारस है जहाँ जब एक तरफ काशी विश्वनाथ के कपाट खुल रहे होते थे तो दूसरी ओर बिस्मिल्ला खां साहब की शहनाई शहरवालों को सुबह होने की खबर देती थी. ये वही काशी है जिसकी झलक मुझे ‘काशी का अस्सी’ में मिली थी.  मैं उस मशहूर गंगा जमुनी तस्वीर को देख रही थी. जानती हूँ कि ये इतनी संवेदनशील है कि कब बिगड़ जाए पता नहीं चलता पर अभी मैं इसके बारे में सोचना भी नहीं चाह रही थी.
इस शहर के रंग जिंदगी से भरे थे बिल्कुल बच्चों की तरह. आप उनकी तरफ देखें और वो एहसास जो आपको ऊर्जा और ज़िन्दगी के साथ आँखों में चमक और होठों पे मुस्कराहट दे जायें. हमारा अगला पड़ाव था उन लोगों के मोहल्लों में जिनके हुनर ने इस शहर की पहचान में बड़ा इज़ाफा  किया था. बुनकर, जुलाहे, और उनके हर घर में चलता हथकरघे का संगीत. उस संगीत के साथ चलता उन चटख रंगीन सूती और रेशमी धागों का ताना बाना किसी को भी मंत्र मुग्ध कर दे. ऐसे ही एक घर में जब उन रंगीन चमकीले धागों को मैं बच्चों की तरह देख रही थी तो उस कारीगर ने मुस्कुराते हुए मुझसे पुछा कि मैं कहाँ से आई हूँ. मैंने कहा ‘लखनऊ’ तो उसकी मुस्कराहट और लम्बी हुई और बहुत गर्मजोशी से उसने मुझे उसका हथकरघा देखने के लिए बुलाया. वो बहुत चाव से मुझे बता रहा रहा था कि कैसे ये हथकरघा काम करता है, कैसे अलग अलग धागे इस्तेमाल होते हैं, ताना और बाना क्या होता है वगैरह वगैरह. वो जानता था कि न तो मैं कोई खरीददार हूँ, न कोई विदेशी और न ही कोई फोटोग्राफर या फ़िल्मकार, फिर भी वो मुझे बता रहा था, मुझे इसकी उम्मीद नहीं थी. मैं उसकी आत्मीयता व उसके उत्साह से प्रभावित थी. उसने मुझसे कुछ भी नहीं कहा लेकिन जब मैं उसके घर से निकली तो अपने साथ एक उदासी लेकर लौटी. पर क्यूँ? थोड़ी देर पहले तक ही तो मुझे उसके रंगीन धागों और हथकरघा के संगीत में ज़िन्दगी दिख रही थी और उसने भी तो मुझसे कुछ नहीं कहा. बस यूँ ही बात करते वक़्त मैंने सामने घर में रखी मशीन के बारे में पूछा तो उसने बताया कि  वो पावरलूम है, उसमें कम मेहनत लगती है और काम भी जल्दी होता है पर वो महंगी होती है. बेहतरीन और खूबसूरत कपडे बुनने वाला ये बुनकर एक निम्न स्तरीय जीवन जी रहा था. बुनकरों के पास से ये सामान ‘गद्दी वालों’ के पास जाता है जो उसे देश के बड़े बड़े शहरों में भेजते हैं, विदेशों में निर्यात करते हैं या बनारस की बड़ी दुकानों में बेचते हैं. ग़ैर बराबरी की ये खाई और इसकी गहराई किसी भी संवेदनशील व्यक्ति को विचलित कर दे. मैं हैरान हूँ कि हर ख़ूबसूरत  दिखने वाली चीज़ या स्थिति के पीछे की तस्वीर इतनी तकलीफ़ देने वाली क्यों होती है. हज़ारों लाखों में बिकने वाली साड़ियों को बनाने वालों को अगर उनके श्रम के मुताबिक़ मेहनताना मिलता तो उनकी स्थिति ऐसी तो न ही होती. पिछले साल जब बाराबंकी के बुनकरों की बस्ती में गयी थी तो उनकी स्थिति इससे भी बुरी थी पर उनका उद्योग फैशन से नहीं जुड़ा था पर यहाँ ऐसा नहीं है. उसके उस आदाब का जवाब मैं एक फीकी मुस्कान से ही दे पाई और भारी मन से उसके घर से निकल आई.
इन गली मुहल्लों में पूरा दिन कब निकल गया पता ही नहीं चला. मेरी साथी मेरी उदासी भांप गयी थी. सो मेरा मन बहलाने के लिए वो मुझे घाट के पास के बाज़ार में घुमाने ले गयी. तो भीड़ भाड़, चहल पहल, रौनक, रंगों और रौशनी से सराबोर ये दूसरी तस्वीर थी बनारस की. कभी कभी सोचती हूँ कि यहाँ की धार्मिक पहचान में कौन सा सुख या मज़ा मिलता है इन विदेशी सैलानियों को.
ये स्थानीय बाज़ार इस शहर के आईने की तरह लग रहा था. भाषा, बोली, पहनावा, रंग, यहाँ तक कि उस सर्द हवा में भी एक ठसक महसूस की जा सकती थी. रात में रौशनी से नहाया घाट के किनारे का बाज़ार, सड़क पर चहलकदमी करते विदेशी, उनको अपनी दुकानों की तरफ रिझाते दुकानदार, खाने पीने, पहनने ओढने से लेकर, फैशन और ज़रूरत का हर सामान आकर्षक कलेवर में सजा दिख रहा था. पूजा के लिए फूल, धूप और अगरबत्तियों से महकती दुकानें, झिलमिल सितारों वाली फ्रॉक पहनी उस नन्ही बच्ची की उँगलियाँ थामे उससे गंगा आरती दिखाने के लिए ले जाती उसकी माँ, गंगा पर उतरता गंगा आरती का प्रतिबिम्ब, किसी को बाँधने के लिए क्या इतना काफी नहीं? कुछ घुलती सी जाती है ये जगह आपके अन्दर साँसों के साथ.  
3 दिन यहाँ बिताने के बाद जब वापस लखनऊ लौट रही थी तो कुछ अधूरापन सा लगा....जैसे यहाँ वापस आना बहुत ज़रूरी है....मैं यहाँ से जितना कुछ ले जा सकती हूँ वो अभी अपने अन्दर समेट ही नहीं पाई थी....वो रंगों की ख़ुशबू, वो चमकीली मुस्कुराहटें, सिन्दूरी सुबहों, रौनक भरी शामों और रूहानी रातों का वो भीना एहसास....बहुत कुछ समेटना है.....जल्द ही लौटूंगी बनारस तुम्हें अपने साथ और ज्यादा ले जाने...                      
          
                                        

गुरुवार, 19 दिसंबर 2013

विवाह में ‘न’ के मायने


कल बड़े दिनों बाद थोड़ा फुर्सत में अपनी भाभी के साथ बैठी थी. उनकी तबियत ठीक नहीं थी तो मैंने भी ऑफिस से छुट्टी ले ली थी. शाम का वक़्त रहा होगा, एक महिला उनके हाल चाल लेने आयीं. शाम की चाय के साथ तीन महिलाओं की गप्पों का सिलसिला चल निकला. शुरू में हंसी मजाक के साथ शुरू हुई बातें धीरे धीरे संजीदा मुद्दों की तरफ बढती गयीं. उस महिला की बातें और व्यव्हार शुरू में थोड़ा अटपटा लगा पर धीरे धीरे हम सभी सहज हो गए. चलिए बातों की आसानी के लिए उनका नाम रख लेते हैं प्रतिभा. प्रतिभा के जीवन के अनुभव उसके चेहरों की लकीरों में नज़र आ रहे थे. हमारे समाज में ये एक आम बात है, एक औरत की सही उम्र चेहरे से कम ही पता चल पाती है. चेहरा उसकी ज़िन्दगी के अनुभवों का आईना दिखा देता है. अगर अनुभव सुखद थे (जो कि आमतौर पर कम ही होते हैं) तो आप सही उम्र देखेंगे वरना उसकी तकलीफों को पूछे या सुने बिना ही उन खाली उदास आँखों, फीकी मुस्कुराहटों, पेशानी पर पड़े बल और चेहरे पर उम्र से पहले ही उभर आई लकीरों में आप उसके अनुभव साफ़ देख सकेंगे. ये देख पाना भी एक हुनर है पर यकीन मानिये अगर आपके अन्दर कहीं भी एक इंसान जिंदा है तो आपको ज्यादा मेहनत नहीं करनी पड़ेगी.
खैर हम वापस आते हैं प्रतिभा पर. मेरी भाभी ने जब उनका परिचय मुझसे कराया तो बताया कि प्रतिभा को पढ़ने लिखने का बहुत शौक है और वो कवितायेँ बहुत अच्छी लिखती हैं. उनकी शादी कम उम्र में ही हो गयी थी लेकिन उसके बाद उन्होंने अपनी पढाई जारी रखी. बच्चों को भी खूब पढ़ाया, बेटी प्रेम विवाह करना चाहती थी तो उसका पूरा साथ दिया. मैं सुखद आश्चर्य से सुन रही थी और प्रतिभा के चेहरे में वो तलाश कर रही थी जो मुझे सुनने को नहीं मिल रहा था. मेरी दिलचस्पी  वो कहानी जानने में बढ़ती जा रही थी जो उसके ‘आज’ के पीछे थी. यूँ तो हर व्यक्ति विशेष की कोई न कोई कहानी ज़रूर होती है पर आप कह सकते हैं कि महिला मुद्दे मेरे सरोकारों में पहले आते हैं तो मेरा रुझान उनमें ज्यादा है. मैंने हमेशा पाया कि हर लड़की और औरत अपने साथ संघर्ष की  एक अलग ही कहानी लेकर आती है. प्रतिभा की भी एक कहानी थी. अनगिनत पर्तों में लिपटी कहानी जब धीरे धीरे खुलने लगी तो कई बार ऐसा महसूस हुआ जैसे मैं जड़ हो चुकी हूँ और हौसले की किस मिट्टी से बनी है ये औरत.
तरक्कीपसंद परिवार होते हैं और ज़रूरी नहीं कि ऐसे परिवार सिर्फ शहरों में हों, पढ़े लिखों के हों, किसी वर्ग विशेष के हों इत्यादि. इतने सालों में इतना तो समझ चुकी हूँ कि इस तरह की सीमाएं खुद को भुलावा देने के लिए हम लोगों ने खुद ही बनायीं हुई हैं. प्रतिभा ने पहले ही साफ़ कर दिया कि वो इतनी खुशकिस्मत नहीं थी कि उसे ऐसा परिवार मिला हो. वो बस्ती जिले के एक पिछड़े इलाके और आर्थिक रूप से  मध्य स्तरीय परिवार से थी. परिवार से मतलब उसका मायका. आमतौर पर हमारे समाज में तो एक औरत की पहचान भी स्थायी कहाँ होती है. जिस घर से जुडती है बस उसी हिसाब से पहचान भी बदल जाती है. 15 साल की उम्र में प्रतिभा की शादी हो गयी. ज़ाहिर बात है वो शारीरिक रूप से बेहद कच्ची थी. ये उसके पढ़ने, लिखने और खेलने कूदने की उम्र थी. पर अचानक उसके हाथों से किताबें छीनकर उनमें रसोई के बर्तन दे दिए गए, कन्धों पर स्कूल के बस्ते की जगह रिश्तों की ज़िम्मेदारियों ने ले ली और आँखों और ज़हन में पल पल पलते सपने मुरझा गए. प्रतिभा के मासिक चक्र भी शुरू नहीं हुए थे. गाँव देहात में आमतौर पर शादी होने के बाद भी विदाई तब की जाती है जब लड़की के मासिक चक्र शुरू हो जायें. रुखी भाषा में कहूँ तो इसके बाद लड़की को ससुराल वालों के सुपुर्द ऐसे किया जाता है कि लगता है कहा जा रहा हो कि लो बच्चा पैदा करने की मशीन तैयार हो गयी है, हमारी ज़िम्मेदारी बस यहीं तक थी अब ये तुम्हारी हुई, जैसे मर्ज़ी इस्तेमाल करो. इस प्रक्रिया को ‘गौने’ का नाम दिया जाता है. प्रतिभा की कहानी इस ख्याल को और पुख्ता करती है. 17 साल की उम्र में प्रतिभा के मासिक चक्र शुरू हुए और उसे ससुराल रवाना कर दिया गया. ठीक एक साल बाद यानि 18 साल की उम्र में प्रतिभा एक बच्चे की माँ बन चुकी  थी.
थोड़ी देर पहले तक खिलखिलाती और चहकती आँखों में दर्द, तकलीफ, घृणा और गुस्से की उभरी हुई तस्वीर मुझे भीतर तक झकझोर गयी. उसके कोरों पर चमकती बूँदें मुझे साफ़ नज़र आ रही थीं. मैं समझ सकती थी जिस ज़िन्दगी को प्रतिभा ने जिया था, उसमें अब आंसू बहाने की गुंजाईश ख़त्म हो चुकी थी. उन छोटी बूंदों को साड़ी के कोने से पोंछते हुए उसने कहा “जिसे सब बलात्कार कहते हैं वो तो मेरे साथ हर रोज़ होता था, फर्क बस इतना था कि क्योंकि मेरी उस आदमी से शादी हुई थी इसलिए वो सबकी नज़र में जायज़ था. मैंने अपने जीवन के 10 साल इसी तरह बिताये हैं दीदी, मेरी उम्र ही क्या थी तब”, मैं स्तब्ध थी.
प्रतिभा से कभी कुछ पूछा नहीं गया, उसकी मर्ज़ी नहीं जानी गयी, उसे बस फैसला सुनाया गया. उसे मानना पड़ा क्योंकि उसे बचपन से सिखाया भी तो ये ही गया था. पहली बात तो वो कहती किससे? कहती तो बेशर्म कहलाती. लोगों के हिसाब से इसमें गलत ही क्या होता है, ये तो औरत की नियति होती है. ये बातें पढ़ने सुनने में आपको, हमें और कथित रूप से सभ्य लोगों को कितनी ही बुरी क्यों न लगें कड़वी सच्चाई ये ही है कि हमलोग अंदाजा भी नहीं लगा सकते कि अलग अलग परिवेशों से आने वाली न जाने कितनी औरतें ऐसी ज़िन्दगी को अपनी नियति मानकर ख़ामोशी से जी जाती हैं. प्रतिभा ने अपने जीवन के 10 लम्बे साल इस शारीरिक, मानसिक, यौनिक और सामाजिक हिंसा को जीते हुए गुज़ारे थे. अब वो दो बच्चों की माँ थी. एक छोटी खरोंच भी अपना निशान छोड़ती है और यहाँ तो चोट का प्रहार शरीर से लेकर आत्मा तक था. जिस्म की खरोंच वक़्त के साथ ख़त्म हो जाती है लेकिन दिल और दिमाग की चोटें व्यवहार में असर छोड देती हैं. प्रतिभा में एक अलग किस्म की कड़वाहट आ गयी थी. उसे किसी का भी, कैसा भी स्पर्श परेशान कर देता था. बल्कि आज भी अगर वो किसी को भी अपनी तरफ बढ़ते हुए देखती है तो बेहद असहज हो जाती है. ये दूरी उसने स्त्री - पुरुष, हर किसी से बना ली है. यह बहुत हद तक समझा भी जा सकता है क्योंकि अपनी तकलीफ के उस दौर को उसने अकेले ही झेला है.
मगर जिस जज्बे की मिसाल प्रतिभा ने दी वो बहुत कम देखने को मिलता है. जब प्रतिभा थोड़ी समझने की स्थिति में आई तो उसने अपनी बिखरी ज़िन्दगी को समेटने का फैसला किया. अपने भीतर दौड़ रही कड़वाहट को उसने अपनी शक्ति बनाया. उसने अपनी पढाई दोबारा शुरू की. जिद की  और दसवीं, बारहवीं, बी. ए., एम्. ए. किया. खुद को किताबों की दुनिया में उतार लिया. हौसला आने लगा और वो घर वालों की नज़र में विद्रोही हो गयी. हमारे समाज में ‘न’ सुनना पति को नागवार गुज़रता है पर प्रतिभा ने ‘न’ बोलना सीखा. खुद से और बच्चों से जुड़े फैसलों में किसी की न सुनी. बेटी को खूब पढ़ाया, पी. एच. डी. करायी. बेटी ने अपनी पसंद से शादी करने की इच्छा जताई तो परिवार वालों के विर्रुद्ध जाकर बेटी की शादी उसकी पसंद के लड़के से करायी. प्रतिभा ने लिखने पढ़ने के शौक को अपना साथी बना लिया है.
प्रतिभा के संघर्ष की कहानी सुनकर मैं बहुत प्रभावित थी पर हाँ कुछ बातें हैं जो अन्दर तकलीफ देती हैं. प्रतिभा ने खुद को संभाला, बेटी, बेटे की अच्छी परवरिश की लेकिन कितनी गहरी हैं वो तकलीफें जिनकी टीस व्यक्तिगत तौर पर उसे आज भी बेचैन कर देती है और शायद हमेशा करती रहेंगी. किसी का प्यार, दुलार या संवेदना से भरा स्पर्श भी उसे परेशान कर देता है, वो दूरी जो उसने दुनिया से बना ली है, नहीं लगता कि कभी कम हो पायेगी. पर फिर ये भी लगा कि कितनी औरतें हैं जो इतनी हिम्मत जुटा पाती हैं जो प्रतिभा ने जुटाई. मैं कई ऐसी महिलाओं को जानती हूँ जिनके ऐसे अनुभव उनकी जीने की इच्छाशक्ति को ही ख़त्म कर देते हैं.
प्रतिभा की कहानी जब सुन रही थी तो ज़हन में और बातें भी चल रही थी. दिसंबर 2012 में हुई  दिल्ली के बहुचर्चित बलात्कार की घटना से जुडी बातें कौंध गयी. साथ ही 2004 की एक परिचर्चा की भी याद हो आई. परिचर्चा सुप्रीम कोर्ट की एक वरिष्ठ वकील के साथ हुई थी जिसमें मुझे ये पता चला था कि हमारे कानून में वैवाहिक जीवन में पति द्वारा हुए बलात्कार को बलात्कार माना ही नहीं जाता. 2012 में वर्मा कमेटी ने एक अच्छी पहल करते हुए देश भर से सुझाव मांगे. न जाने कितने लोगों और संस्थाओं ने ये सुझाव दिया कि वैवाहिक जीवन में हो रही इन घटनाओं को भी बलात्कार में शामिल किया जाये. ये वो घटनाएं हैं जिनका कोई आंकड़ा ही नहीं मिलता क्योंकि इसे क्रूरता की श्रेणी में रखा जाता है. पर समाज के हर हिस्से, हर संस्था मे घर कर चुकी पित्रसत्ता से ये  संवेदनशील कमेटी, सरकार, राजनीतिक दल, न्यायपालिका, कुछ भी तो अछूता नहीं. जो कानून बना उसमें इन घटनाओं को बलात्कार में शामिल नहीं किया गया. दलीलें भी दे दी गयीं इस निर्णय के पीछे कि परिवार और विवाह संस्था को बचाए रखने के लिए ऐसा करना ज़रूरी है. कितनी हास्यास्पद बात है कि वही घटना किसी कुंवारी लड़की या महिला के साथ होने पर उसे बलात्कार माना जायेगा, उसके लिए अलग कानून होंगे, अलग सजायें होंगी लेकिन वही घटना अगर पति करे, बार बार करे, हर रोज़ करे तो उसका कानून, सजा, सुनवाई, सब अलग. जो सवाल उठते हैं वो पुराने हैं लेकिन आज तक अनुत्तरित हैं इसलिए ज़रूरी हैं. क्या महज़ शादी हो जाने से किसी घटना की जघन्यता कम हो जाती है? क्या शादी का मतलब कोई लाइसेंस है जो पति को अपनी पत्नी की देह का शोषण करने के लिए मिलता है? अपनी पत्नी की मर्ज़ी के खिलाफ जाकर, ज़बरदस्ती उससे सम्बन्ध बनाने वाले पुरुष में और एक बलात्कारी में क्या अंतर है? क्या एक पत्नी की इच्छा या मर्ज़ी की कोई अहमियत नहीं? कहीं हम ये तो नहीं कहना चाहते कि चूँकि उसने ऐसा अपनी पत्नी के साथ किया इसलिए ये उतना ग़लत नहीं, बाहर किसी और लड़की के साथ करता तो गलत होता? क्या हम ये कहना चाह रहे हैं कि पत्नी इसी प्रकार के उपभोग की ही वस्तु है? क्या हम सोच भी पा रहे हैं कि तथाकथित रूप से महान विवाह संस्था को बचाने के लिए हम इस मुल्क की अनगिनत पीड़ित महिलाओं और लड़कियों को किस नरक में धकेल रहे हैं? काश हमारे देश की निर्णायक प्रणाली में शामिल होने वाली सभी संस्थाएं और समूह थोडा संवेदनशील होकर ये सोचती कि विवाह संस्था को बचाने की ज़िम्मेदारी सिर्फ औरत की ही तो नहीं और वो कैसी संस्था जो किसी औरत के जीवन को दु:स्वप्न में बदल दे. ऐसी संस्था को तो सिरे से ख़ारिज करके बाहर निकलने में ही समझदारी है. ज़रूरत थी कि वो इस मुल्क की लड़कियों में हौसला भर सकते कि ऐसी स्थितियों में वो अकेली नहीं हैं और उनके पास कानून की ताकत है. हमारी सरकार को इस बात का ज़रा भी अंदाजा नहीं कि उनके इस निर्णय ने न जाने कितने शोषक पुरुषों के हौसलों को मज़बूत किया, कितनी औरतों, बराबरी के समाज के लिए कार्य कर रहे लोगों और संगठनों की उम्मीदों को तार तार किया और असंवेदनशीलता की क्या मिसाल पेश की.
मैं खुश हूँ कि प्रतिभा ने स्थितियों के आगे घुटने टेकने से मना कर दिया, कम ही महिलाएं ऐसी हिम्मत जुटा पाती हैं लेकिन हम सच से मुंह नहीं फेर सकते और सच ये है कि उन काले वर्षों की वजह से प्रतिभा खुश और सामान्य तो आज भी नहीं!!