बुधवार, 4 जून 2014

मुद्दों का तमाशा बनाते ये लोग


बड़ी उलझन में हूँ...एक अजीब बेचैनी...अफ़सोस, मायूसी, गुस्से और झुंझलाहट से भरी...टेलीविजन और अखबार की दुनिया से दूर हूँ इस बीच और सच कहूँ तो दूर रहकर थोड़ा सुकून है...पर हाँ आदतें बहुत ज्यादा बदलने नहीं देतीं...इंटरनेट और सोशल मीडिया के ज़रिये ख़बरें पहुँच जा रही हैं...न्यूज़ चैनलों की वेबसाइट और सोशल मीडिया पर बदायूं बलात्कार काण्ड (और अब बरेली भी) को लेकर एकदम हाहाकार मचा हुआ है...ये सब देख, सुन और पढ़ कर ऐसा लग रहा है मानो चीज़ें उलझती जा रही हैं और कई लोगों में एक भटकाव आता जा रहा है...पहली बात तो ये कि बात बलात्कार तक सीमित नहीं...साथ में कई सारे पहलु जुड़े हैं....एक कोशिश करने जा रही हूँ उन अलग अलग सिरों को सुलझाकर साथ लाने की...किसी और के लिए ये कितना ज़रूरी है नहीं पता, पर फिलहाल खुद को संतुलित करने के लिए ये मेरे लिए तो बहुत ज़रूरी है.

मैं बताती चलूँ एक मध्यम वर्गीय परिवार से हूं और बीते लगभग 8 सालों से अलग अलग मानवाधिकार संगठनों से जुड़ी हुई हूँ तो तमाम सामाजिक मुद्दों को देखने और समझने का मौका मिलता रहा है..महिला मुद्दे मेरे सरोकारों में पहले आते हैं...इसकी कोई ख़ास वजह नहीं हैं मेरे पास...दिलचस्पी रही है इसीलिए पढ़ाई भी इसी क्षेत्र में की और उसके बाद अलग अलग तरीके से इन संगठनों के साथ काम करने का मौका मिलता गया...तो इन सब वजहों और अनुभवों से महिलाओं से जुड़े और अन्य मुद्दों पर भी थोड़ी समझ बनी है...जी नहीं मैं कोई बुद्धिजीवी नहीं हूँ...एक आम लड़की हूँ और अपनी समझ और जानकारी को मैं अभी भी बहुत सीमित ही मानती हूँ...

बहुत कम घटनाओं से रूबरू हो पाती हूँ पर जितनों से अब तक हुई हूँ वो भी लिखने लगूंगी तो जाने कितना वक़्त लगेगा..पर एक बानगी भर के लिए कुछ घटनाएं अंत में साझा की हुई हैं..कोशिश कीजिये ये समझने की कि किस समाज का हिस्सा हैं हम इस वक़्त....जितना हकीकत में होता है उसके आगे ये घटनाएं कुछ भी नहीं...किसी भी लड़की ने...जी हाँ मेरा मतलब है किसी भी लड़की ने कभी हिंसा का कोई रूप न देखा हो ऐसा संभव नहीं है...अगर वो ऐसा कहती है तो मैं दावे से कह रही हूँ वो झूठ कह रही है...वो चाहे भेदभाव हो, रिश्तेदारों के अनचाहे स्पर्श, देह भेदती बेचैन कर देने वाली नज़रें, यातायात के साधनों में शरीर तक पहुँच बनाने को फडफडाते हाथ, ससुराल की दुश्वारियां, धमकियाँ या तेज़ाब के हमले, धार्मिक स्थल और वहां के ठेकेदार....आप मुझे दिल पर हाथ रखकर एक जगह बता दीजिये जहाँ लड़की सुरक्षित है...बल्कि वो तो न्याय के ठेकेदारों के यहाँ पहुँच कर ही सबसे ज्यादा असुरक्षित हो जाती है

लखनऊ में 2005 से साझी दुनिया नाम की संस्था से जुड़ी हुई हूं..अक्सर वहां जाती रहती हूँ...जिस तरह की समस्या लेकर वहां महिलाएं आती हैं, वो सुनकर कई बार रातों की नींद उड़ जाती है, भूख ख़त्म हो जाती है, बेचैनी, उलझन, अफ़सोस, गुस्सा, मायूसी जाने क्या क्या भर जाता है मन में...मुद्दे मानसिक, यौनिक, सामाजिक, घरेलू, शारीरिक और कार्यस्थल में होने वाली हिंसा किसी के भी हो सकते हैं...पर सबसे बड़ी बात ये कि हर हिंसा हर समस्या औरत की पूरी पहचान को शरीर या यौनिकता पर समेट देती है

इस वक़्त जिस तरह से बदायूं या बरेली बलात्कार काण्ड पर प्रतिक्रियाएं आ रही हैं कुछ बातें समझनी और कहनी बड़ी ज़रूरी हो गयी हैं:

1. लडकियां हर रोज़ हिंसा का किसी न किसी रूप में सामना करती हैं...वो कौन से पैमाने हैं जो ये तय करते हैं कि कौन सा रूप ज्यादा क्रूर या वीभत्स है...भ्रूण हत्या, बाल यौन शोषण, दहेज़ हत्या, जीवन भर चलता भेदभाव, शिक्षा या रोज़गार से वंचित रखना, जबरन शादी करवा देना, अपनी पसंद की शादी करने पर मौत के घाट उतार देना, शारीरिक हिंसा, तेज़ाब के हमले या बलात्कार आदि

2. क्या हमें ये सोचने की ज़रुरत नहीं कि किस तरह के समाज में हमारी नन्ही बच्चियां अपनी आँखें खोल रही हैं और जी रही हैं...यहाँ उनके पास उनके हक नहीं, मौके नहीं, घरेलू कामकाज की कोई गिनती नहीं, भेदभाव है, पढ़े लिखे घरों में आज भी मासिक धर्म जैसी वजहों से उसे अपवित्र मान लिया जाता है...किसी भी तरह की घटना होने पर सबसे पहले लड़की का बाहर निकलना बंद हो जाता है...उसे चुप रहना, बर्दाश्त करना, हमेशा एडजस्ट करना, त्याग करना, हर वक़्त खुद को ढके रहना सिखाया जाता है....यौनिकता की बातें आज भी फुसफुसाकर की जाती हैं...यहाँ तक कि दुकानदार अगर पुरुष है तो लड़की सैनिटरी पैड या अंतः वस्त्र मांगने तक में हिचकिचाती है...किसी पुरुष के सामने मासिक धर्म की बात कर देना आज भी पाप सरीखा होता है

एक और बात...अक्सर देखती हूँ लड़कों या पुरुषों को अपनी महिला सहकर्मियों का मज़ाक उड़ाते...कई लोगों से झगडे कर चुकी हूँ...उन्हें लगता है हर महीने ये लड़कियां मासिक धर्म का बहाना बना कर काम से बचती हैं....बेहद घटिया बात करने वाले ये लोग पढ़े लिखे और तथाकथित समझदार होते हैं....तुम लोगों को इस बात का अंदाजा भी नहीं है कि हर महीने लड़कियां किस दर्द, तकलीफ, परेशानी और उलझन से गुज़रती हैं....जितना होता है उसका 1/ 10 हिस्सा भी अगर समझ सकोगे तो ज़िन्दगी में ये बात दोबारा नहीं कहोगे...और हाँ अब ये कहके अपनी बीमार सोच का नया नमूना मत पेश करो कि फिर कहा किसने है काम करने को

3. बलात्कार, हिंसा (शारीरिक, मानसिक और यौनिक) का एक रूप है...ये मानसिक विकृति दिखाता है...पर ज़रा ये स्पष्ट कीजिये कि इससे लड़की की इज्ज़त कैसे चली जाती है...-ये काम तो एक प्रकार के शक्तिप्रदर्शन का एक तरीका होता है...अपने से कमज़ोर पर...तथाकथित सामाजिक पैमानों के हिसाब से खुद से नीचे आने वालों पर...महिलाएं तो यूँ ही कमतर मानी जाती हैं...इसके अलावा घर की इज्ज़त का टोकरा सर पर लेकर जिंदगी भर उनको ही चलना होता है...इसके अलावा जाति, धर्म, वर्ग के आधार पर शक्ति दिखाने का भी ये एक तरीका बन जाता है...और इससे बड़ी सजा या सबक किसी लड़की या उसके परिवार के लिए कुछ और हो नहीं सकता...समाज की सोच और रवैया पीड़िता और उसके परिवार को शर्मसार कर देता है..इस स्थिति के लिए हम और आप ज़िम्मेदार होते हैं और अनजाने में बलात्कारी का ही मनोबल बढाते हैं......उस जगह के बाकी लोग डर कर दुबक जाते हैं और बलात्कारी शान से छाती चौड़ी करके छुट्टा घूमते हैं...बलात्कार के बाद हत्या करके पेड़ पर टांग देने वाली घटनाएं ताक़त और सत्ता की हेकड़ी ही दिखाती हैं..किसी इंसान का जानवर की तरह शिकार करने के बाद शरीर को नुमाइश के लिए लोगों के सामने सजा देना कि ये हाल हम किसी का भी कर सकते हैं...साथ ही ये ख़याल उस सोच से उपजता है जो महिलाओं को सिर्फ और सिर्फ एक वस्तु के रूप में देखती है जिसका दुनिया में आने का उद्देश्य पुरुष की कामेच्छओं को पूरा करना है...पर अपने दिमाग की सारी खिड़कियाँ खोलकर ये बात समझ लें कि दुनिया का कोई भी व्यक्ति, जी हाँ कोई भी व्यक्ति किसी लड़की की ‘इज्ज़त’ नहीं लूट सकता....जिसको आप इज्ज़त कहते हैं वो आपकी मर्दवादी, पितृसत्तात्मक, दीमक लगी सोच के एक पहलू से ज्यादा कुछ नहीं होता है...   

कई अखबारों और ख़बरिया चैनलों में लड़की की इज्ज़त/ आबरू/ अस्मत लुटने की हेडलाइन को सनसनीखेज़ तरीके से पेश करके एक मसालेदार खबर तैयार कर दी जाती है...मतलब ये कि लड़की की इज्ज़त और अस्मिता सिर्फ और सिर्फ उसकी यौनिकता तक सीमित है...जिसपर कोई बिगड़ा मनचला कभी भी हमला कर सकता है और इसके साथ ही लड़की का वजूद ख़त्म हो जायेगा...ये पत्रकारिता के हाल हैं...

4. एक बार ज़रा आंकड़े भी उठाकर देखें, चाहे जातिगत हो या कोई और, बलात्कार सिर्फ़ दिल्ली, बदायूं या बरेली में नहीं हो रहे, हर दिन जाने देश के कोने कोने में जाने कितनी लडकियां, बच्चियां या महिलाएं इस हिंसा का शिकार हो रही हैं...सवर्णों का निचली जाति के साथ, राह चलते मौज मस्ती के लिए अय्याश लड़कों का लड़की उठा कर ले जाना, घर के अन्दर, बाहर, दंगों के दौरान, आपसी रंजिश, अपनी ताक़त/ प्रभुत्ता दिखाने, विरोधी को सबक सिखाने के लिए, माफियाओं द्वारा अपनी कामेच्छाएं पूरी करने के लिए,  पुलिस या सैन्य बालों द्वारा किये जाने वाले, ये सभी बलात्कार क्रूरता की हर बार एक वीभत्स तस्वीर दिखाते हैं...पर हम तब क्यूँ मौन रह जाते हैं...या खोज खोज के उन पीड़ितों तक तब क्यूँ नहीं पहुँचते?? क्या हम खुद सुविधाएं नहीं ढूंढ रहे...जो मुद्दा मीडिया में छाया हुआ है वहीँ पहुँच के अपना योगदान दिखा दें...बहती गंगा में हाथ धो लें...मेहनत भी कम पड़ेगी और गिनती में भी आ जायेंगे कि हमने फलां केस में बड़ी भूमिका निभाई थी 
  
5. बदायूं में इस वक़्त एक किस्म का मेला लगा हुआ है...ये छोटी सी जगह इस वक़्त अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर संज्ञान में आ गयी है....जिसकी शुरुआत मीडिया ने की...फिल्म ‘पीपली लाइव’ की याद हो आई...ओ बी वैन और पत्रकारों की भीड़ इस क़दर लगी है कि लड़कियां शौच के लिए तक नहीं जा पा रहीं...अब रातोंरात तो हर घर में शौचालय बनने से रहे...नेता और यहाँ तक कि कई एनजीओ वाले मौके का फायदा उठाने के लिए पहुंचे हुए हैं....ये बातें हर एक व्यक्ति पर लागू नहीं होती पर अधिकतर के यही हाल हैं...बाकी वक़्त कहाँ रहते हैं ये सब...हर कोई पीड़िता के परिवार को इन्साफ दिलाने का श्रेय लेना चाहता है...नेता, मीडिया, एनजीओ....इस क़दर तमाशा बना दिया है कि हकीकत में काम करने वालों पर भी सवाल उठने लगे हैं....ऐसा क्यूँ लगने लगा है कि बलात्कार की घटनाएं मीडिया, राजनीतिक पार्टियों और नेताओं तथा कई मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के लिए ऑक्सीजन सरीखी हो गयी है.

अंतर्राष्ट्रीय मीडिया से लेकर संयुक्त राष्ट्र संघ तक सब भर्त्सना करने उतर आये हैं...अच्छी बात है ये पर बाकी हिंसा या अलग अलग वक़्त पर हुए बलात्कार/ दंगों के वक़्त हुई सामूहिक दुष्कर्म की घटनाओं पर आपकी ज्ञानेन्द्रियाँ सुन्न हो गयीं थी क्या? या आप उस वक़्त जुबान खोलकर बड़ा खतरा मोल नहीं लेना चाहते?...और क्या आपको वाकई इस घटना का राजनीतिकरण समझ नहीं आ रहा या आप समझना नहीं चाहते?

6. एक और बात सज़ा से जुड़ी...बड़ी बहस छिड़ी हुई है...कि बलात्कारियों को फांसी दो...अब सवाल ये कि फांसी किस तरह का विकल्प है...और इससे बलात्कार की घटनाओं में किस प्रकार कमी आ जाएगी?

पहले तो फांसी की सज़ा का प्रावधान बनते ही बलात्कार के फ़ौरन बाद बलात्कारी लड़की को मौत के घाट उतार देंगे...अब जुटाते रहिये आप सबूत...जो सिस्टम इस वक़्त सालों साल कार्यवाही नहीं कर रहा, रिपोर्ट दर्ज करने में आना कानी कर रहा है...फैसला सुनाने में देरी कर रहा है...आपको लगता है सुबूत न होने पर वो काम करेगा?

दूसरे, फांसी की सज़ा, मतलब किसी का जीने का हक छीनने को किसी भी तरह से न्यायोचित नहीं ठहराया जा सकता....अनतर्राष्ट्रीय स्तर पर इस वक़्त इस सज़ा को ख़त्म करने की पैरोकारी की जा रही है और हम उससे उलट फांसी की मांग कर रहे हैं..

इसी से जुडी मेरी तीसरी बात, फांसी मतलब किसी का जीवन ख़त्म कर देना, बलात्कार मतलब शारीरिक, मानसिक और यौनिक हिंसा का क्रूर रूप...पर इन दोनों को आप बराबर कैसे कर सकते हैं...इसका तो सीधा मतलब ये हुआ कि बलात्कार लड़की और उसके परिवार के लिए म्रत्यु के बराबर है...क्यूँ भई? क्या लड़की की अस्मिता और जीवन यहीं तक सीमित है...क्या ऐसा करके हम लड़की को आत्महत्या के लिए नहीं उकसा रहे? क्या हम उसे ये सन्देश नहीं दे रहे कि अब तुम्हारे जीवन में कुछ नहीं बचा...याद रखिये कि वो जिंदा है और जिंदा व्यक्ति को हर हाल में हौसला देना चाहिए ताकि वो अपनी जिंदगी नए सिरे से शुरू करे..ये मुश्किल ज़रूर है पर मत भूलिए कि उसके जिंदा होने का मतलब उम्मीदों का जिंदा होना है...जो हुआ उसमे उसकी कोई गलती नहीं थी इसलिए उसको शर्मिंदा होने की कोई ज़रुरत नहीं...और यकीन मानिए लड़कियों का हौसला टूटने की वजह हम, आप और ये समाज और उसके प्रति हमारा व्यवहार होता है...ये घूम फिर के उसी पितृसत्तात्मक मानसिकता को मज़बूत करना है जहाँ इज्ज़त और वजूद उसकी यौनिकता तक सीमित है 
   
चौथी बात ये कि लगे हाथ एक नज़र न्यायिक ढाँचे पर भी डालें...आजादी से अब तक कितनी फांसी की सजा हुई हैं...ज़ाहिर है किसी को मृत्यु दंड की सज़ा सुनाना आसान नहीं...कोशिश की जाती है कि विकल्प तलाशे जाएँ जो कि सही भी है....कहीं पढ़ा था कि 2012 तक लगभग 40000 बलात्कार के मुक़दमे विभिन्न न्यायपालिकाओं में लंबित पड़े हैं...अब इस हिसाब से तो इन सबको मृत्यु दंड सुना दिया जायेगा

7. इससे जुड़ी हुई है अगली बात कि समस्याएं किस तरह भीतर तक घुसी हैं....राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो की 2012 की रिपोर्ट के हिसाब से ही सज़ा की दर मात्र 24% रही है....विभिन्न नेताओं, मंत्रियों, जन प्रतिनिधियों, लेखकों से लेकर आध्यात्मिक गुरुओं के विचार अलग अलग समय में हम तक पहुँच चुके हैं...ये नीति निर्धारकों के हाल हैं...माफ़ कीजिये पर न किसी को भाई कहने से बलात्कार रुकेंगे न ही शरीर ढकने से...और हाँ, न बलात्कारी 'बेचारे' होते हैं, न बलात्कार पीड़िता कोई जिंदा लाश और न ही बलात्कार धोखे से हो जाते हैं...अपनी जुबान और सोच पर ज़रा संयम रखें तो बेहतर होगा  
कहा जा रहा है खुले में शौच के लिए जाने से बलात्कार की घटनाएं बढ़ रही हैं...ये सही है कि ये एक कारण है...पर ये ही एकमात्र कारण है ऐसा नहीं है...क्यूंकि बलात्कार तो वहां भी होते हैं जहाँ हर घर में शौचालय होते हैं 

8. ये सच है कि इस वक़्त इन घटनाओं को राजनीतिक रणनीतियों के तहत तूल दिया जा रहा है...पर मुख्यमंत्री महोदय इन घटनाओं पर आपकी प्रतिक्रियाएं और बयान किसी भी संवेदनशील राजनेता की छवि नहीं पेश कर रहे हैं...पर खैर संवेदित तो आप, आपकी पार्टी और पार्टी हाईकमान कितने हैं ये भी हम सब जानते हैं

9. इन दिक्क़तों का कोई एक समाधान है ही नहीं...रूढ़िवादी मानसिकता, भृष्टाचार, लचर क़ानून और उससे भी लचर उसका क्रियान्वयन...जाति, वर्ण, धर्म, जेंडर ..हर स्तर पर ग़ैरबराबरी..सब कुछ ज़िम्मेदार है... ग़ैरबराबरी हर जगह गहरी पैठ बनाये हुए है...और दमनकारी व्यवहार आज भी बहुत आम है....उसके बाद घटनाओं को glamourise कर देने की प्रवृत्ति से भी बाज़ आने की ज़रुरत है...क्यूंकि इससे ज्यादा अमानवीय कुछ नहीं...पीडित परिवार को चैनलों पर यूँ दिखाया जाता है जैसे टीआरपी बढ़ाने के लिए कोई विज्ञापन चल रहा हो...मेहरबानी करके मुद्दों की गंभीरता समझिये और यूँ उनका तमाशा बनाकर अपनी रोटियां सेंकने से बाज़ आइये  

एक और बेहद ज़रूरी बात...बलात्कार की शिकार लड़की एक इंसान होती है...मेहरबानी करके बाहर निकालिए उस मानसिकता से जो ज़िन्दगी भर के लिए उसकी पहचान को इस एक घटना तक समेट देता है...हमेशा के लिए उसकी पहचान उसका 'बलात्कार पीड़िता' होना हो जाता है...और ऐसा करते मैंने मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को भी देखा है जो सामने नहीं लेकिन किनारे जाकर दुसरे के कान में फुसफुसाकर ये बताते मिल जायेंगे कि ये जो लड़की है न ये फलां रेप विक्टिम है 
  
10. फ़िल्म, टेलीविजन, विज्ञापन, पत्रिकाओं, अखबारों और खबरिया चैनलों की भूमिका इस वक़्त शर्मसार कर देने वाली है...बेहद गैर जिम्मेदाराना है...पर उस पर चर्चा एक अलग लेख पर करुँगी...
.................................................................................................................................................................

कुछ छोटे अनुभव जिनकी तकलीफ छोटी कतई नहीं हैं यहाँ साझा कर रही हूँ...अगर चाहें तो पढ़ सकते हैं...ये स्थितियों की एक बानगी भर हैं:

1. पिछले महीने अहमदाबाद में थी...अपनी दीदी के पास...उनके पड़ोस के घर में किसी पूजा का आयोजन था...पूजा से ठीक एक दिन पहले घर की बच्ची जिसकी उम्र लगभग 12-13 साल थी, के मासिक धर्म शुरू हो गए...वो अचानक अपवित्र हो गयी, किसी आयोजन में भाग नहीं ले सकी, उसे रसोई से ख़ासतौर पर दूर रखा गया क्यूंकि वहां भोग बनाया जा रहा था, पूजा के पास फटकने का तो सवाल ही नहीं...उदास आँखों से वो टुकुर टुकुर सबकुछ देखती रही...शाम को मेरे पास आई तो रुंधे गले से पूछ बैठी “मौसी मैंने तो कुछ भी नहीं किया फिर मैं क्यूँ नहीं जा सकती पूजा में? क्या मैं गंदी हो गयी हूँ?” मैं उसकी मायूस डबडबाई आँखें देख कर बेचैन हो उठी...उसकी मां को समझाने की कोशिश की पर मैं खुद भी जानती थी धर्म और आस्था को चुनौती देना उसके बस का नहीं था...यहाँ ये बताना ज़रूरी है कि वो महिला पीएचडी हैं और उनके पति एक बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनी में कार्यरत हैं..

2. इन दिनों कोटद्वार, उत्तराखंड में हूँ...यहाँ मेरा ददिहाल है...पिछले कुछ समय में ये जगह बहुत तेज़ी से बदली है..आधुनिक हो चली है...फैशन, तकनीक, सुविधायें सब कुछ पहुँच गया है यहाँ... बड़े सभ्रांत परिवार बसे हैं और पर आस्था के कुछ प्राचीन तरीके आज भी खूब प्रचिलित हैं बल्कि मुझे तो लगता है बढ़ते जा रहे हैं...

पुछेरे या नवरिया यहाँ उन लोगों को कहा जाता है जिन्हें मान्यतानुसार कुछ ख़ास दैविक शक्तियां मिली हुई होती हैं...आप इन लोगों के पास जायेंगे तो उनपर देवी या देवता प्रकट होकर आपको ये बता देंगे कि आपको क्या समस्या है, क्यूँ है, किसने की और इसका समाधान क्या है... उपचार की पूजा कुछ भी हो सकती है...भूत भागना, शमशान में पूजा देना, नज़र उतरवाना, कहीं स्नान करना, किसी जानवर की बलि देना, जंगल में पूजा के बाद मुर्गा छुड़वाना, परेशां व्यक्ति पर किसी देवी/ देवता/ भूत/ प्रेत का साया है तो उसको नचवाना इत्यादि...एक अलग किस्म की तिलस्मी दुनिया का बाज़ार खूब जोर शोर से चल रहा है...आप यकीन करें या न करें पर यहाँ आने वालों में अनपढ़ लोगों से लेकर वैज्ञानिक तक होते हैं, गरीब – अमीर, सवर्ण दलित, बच्चे बूढ़े सब...
     
यहाँ जानने में ही एक परिवार है...बेटा मेकैनिकल इंजीनियर है और बहू भी एक बड़ी कंपनी में कार्यरत थी, बच्चे होने के बाद नौकरी को विदा कहना पड़ा...दोनों पूना रहते हैं...आजकल आये हुए थे...पता चला 2 बेटियां हो गयी हैं, डॉक्टर ने कहा बहू में कोई कमी नहीं तो यहाँ नवर कराना है...कुछ बातें जो जुड़ी हैं – बेटे की चाहत, बेटी होने पर जांच सिर्फ बहू की ही जबकि हम जानते हैं बेटी या बेटा पैदा करने के लिए किसी भी प्रकार से लड़की ज़िम्मेदार नहीं होती क्यूंकि उसके पास तो सिर्फ X (एक्स) क्रोमोजोम ही होता है...मानसिक बोझ बहू पर और अब बेटा पैदा करवाने की ज़िम्मेदारी नवरिया की...ये एक सभ्रांत पढ़े लिखे परिवार की कहानी है...

3. अपनी पिछली संस्था में काम के सिलसिले में रायबरेली गयी थी...12-13 साल की बच्ची अपने घर पर बर्तन धो रही थी...परिवार में 7-8 सदस्य थे तो उनके कितने बर्तन रहे होंगे ये सोचिये..खाना खाकर माता, पिता और एक भाई काम के लिए ईंट की भट्टी पर गए हुए थे...लड़की के अलावा उस वक़्त घर पर तीन और छोटे भाई बहन थे...एक तो कुछ महीनो का ही था...इन सबको संभालना, घर की साफ़ सफाई, खाना बनाना खिलाना, बर्तन धोना ये सारे काम उस बच्ची के थे...और पढ़ाई?? “हम जाते थे स्कूल, अच्छा लगता था सहेली बनाना, खेलना, नयी नयी चीज़ें सीखना पर अगर मैं स्कूल गयी तो घर का काम कौन करता इसलिए मां बापू ने स्कूल छुड़वा दिया”...उसकी आँखें पथरायी सी कहीं शून्य में देख रही थीं...इस बच्ची ने हालात से समझौता कर लिया था...

4. मेरे साथ पढ़ने वाली एक सहेली शादी के 7 साल बाद मुझसे मिली और इसलिए मिली क्यूंकि अब उसका जीना दूभर हो रहा था...शादी की पहली रात पति ने बता दिया कि शादी सामाजिक दिखावे के लिए की है, उसके सम्बन्ध किसी और महिला से हैं...शारीरिक सम्बन्ध बनाने में न नुकुर की तो अलग उत्पीडन, लड़की के माता पिता एडजस्ट करने की ही सलाह देते रहे...कहा बच्चे हो जायेंगे तो सब ठीक हो जायेगा...बिना किसी भावनात्मक जुड़ाव के दो बच्चे भी पैदा कर लिए गए...तानों से लेकर शरीरिक हिंसा तक सब कुछ होता रहा और माता पिता और भाई अभी तक एडजस्ट करने की ही सलाह दे रहे हैं...एक भाई भाभी पीसीएस अफ़सर हैं और दूसरे  एक बड़े प्रतिष्ठित विद्यालय में रसायन विज्ञान के वरिष्ठ अध्यापक

5. एक अन्य लड़की को प्रेमी ने शारीरिक संबंध बनाने के बाद बिना किसी वजह के छोड़ दिया और चुपके से कहीं और शादी कर ली..

6. मेरी ही एक सहेली जो मानवाधिकार संगठन में कार्यरत है और सार्वजनिक यातायात के साधनों का इस्तेमाल करती है हर रोज़ छेड़खानी के अलग अलग रूप देखती हैं..घर से दफ्तर आना और सकुशल वापस घर पहुंचना एक चुनौती बन जाता है...दो बार ऐसा हुआ जब वो पैदा जा रही थी तो बाइक सवार लड़के कभी उसको धक्का देकर तो कभी पीछे से सिर पर ज़ोरदार घूँसा मारकर ठहाके लगाते हुए तेज़ रफ़्तार से निकल गए

7. आज़मगढ़ के एक गांव में सवर्णों ने एक मानसिक रूप से विक्षिप्त लड़की का बलात्कार किया...लड़की रोती थी पर कुछ समझ नहीं थी तो कुछ बता नहीं पायी...गर्भवती होने पर जब उसका पेट बढ़ने लगा बातें तब खुलीं...

8. एक अन्य लड़की पर ज़बरदस्ती दबाव बनाया जा रहा था कि वो भ्रूण गिरवा दे...वजह...जनाब भ्रूण हत्या का मतलब कन्या भ्रूण हत्या ही होता है...और बेटियां तो होती ही अनचाही हैं...बोझ कौन मोल ले

9. एक सभ्रांत पढ़े लिखे परिवार में पिता अपनी ही दोनों बेटियों का शारीरिक शोषण करने के बाद घर छोड़कर कहीं अलग रहता है और परिवार को कोई खर्चा भी नहीं देता...एक बड़े बैंक अधिकारी की स्नातक बेटी एक समय में लोगों के घर झाड़ू पोंछा करने को मजबूर हो गयी थी

शुक्रवार, 30 मई 2014

पहाड़, जंगल, नदी, खेत, बाज़ार, बचपन की यादें और कोटद्वार

आहिस्ता आहिस्ता सूरज की तपिश को मद्धम करती, ठंडी हवा साथ लिए पहाड़ के जंगलों से संदली शाम उतर रही है मेरे आँगन में...हां सच है, शामें सख्त़ नापसंद हैं हमें....उफ़ कैसी उदासी से भरी होती हैं ये....हाँ अगर अपना साथ निभाने बारिश को साथ लायी हों तो अलग बात है....बारिशें और उनका भीगा अहसास मुझे इस क़दर पसंद है कि मेरे ज़हन से वो शाम की उदासी का बोझ हटा देता है.

आजकल कोटद्वार में हूँ...ये मेरा ददिहाल है...इसे गढ़वाल का द्वार कहा जाता है और मुख्य व्यावसायिक व व्यापारिक केंद्र भी...इसका पुराना नाम खोद्वार हुआ करता था...खो एक नदी है यहाँ...घने, हरे जंगलों की शिवालिक की पहाड़ियों से सटा ये उप क्षेत्र है जहाँ से तराई का इलाका शुरू होता है.....याद करती हूँ जब बचपन में यहाँ आती थी तो इस जगह का, यहाँ के लोगों का अपना एक अलग ख़ास अंदाज़ होता था...सरल, खिलंदड़, मनमौजी, खुशनुमा.....एकदम अपनी तरह का...कि आप यहाँ आयें और विस्मय से उससे प्रभावित हुए बिना और मुस्कुराये बिना न रह पाएं....और फिर प्रकृति का साथ हो तो बात ही क्या...इसमें बड़ी ताक़त होती है...इंसानों की भीड़ में भी आप अकेले हो सकते हैं पर प्रकृति हमेशा साथ निभाती है...वो कभी आपको अकेलेपन का अहसास नहीं होने देती...पहाड़ी पार से आसमान को लाल, नारंगी और सुनहरा करता उगता सूरज आपकी अलसाई उनींदी आँखों पर आहिस्ता से दस्तक देगा...हवा आपसे बातें करेगी, फूल- पत्ती- पेड़- पौधे आपकी बातों पर मुस्कुराएंगे...अल्हड़ नदियां आपके साथ खिलखिलायेंगी और बचपन की कोई शरारत याद दिला जाएँगी....साफ़ नीला आसमान या तो अपनी नीली छतरी से आँखों को ठंडक देता रहेगा या फिर मंडली जमाने तरह तरह के बादल दोस्तों को ले आएगा...और इस बीच अगर बारिश हो गयी तब तो पूछिए मत...बस फिर तो वो सिहरन...ठण्ड भगाने के लिए जलती आग का वो ताप, वो रंग....तो बस...फिर अकेले कहां रहे आप...मैंने ऐसा महसूस किया है कि इंसानों के बीच आप ख़ुद को भूलकर दूसरों में, इंसानों में प्यार तलाशते हैं पर प्रकृति का ऐसा साथ मिलता है तो आपको ख़ुद से अपने साथ से मुहब्बत हो जाती है...जैसे बरसों बाद ख़ुद से मुलाक़ात की हो...

तो बात कोटद्वार की हो रही थी...जो एक वक़्त अपनी ही क़िस्म का था पर बाज़ार से ये और यहाँ के लोग भी नहीं बच पाए...पर हां उन ख़ालिस शहरों से ये आज भी भिन्न है....यहां ब्रांड और फैशन तो पहुंच चुका है पर कहीं कुछ अभी भी बाक़ी है...कह सकते हैं एक शहरनुमा क़स्बा....एक ही बाज़ार है इस जगह के पास....एक अज़ीज़ दोस्त अन्नू की प्यार भरी धमकी पर आज एक सैर कोटद्वार के उस बाज़ार की ही कराने जा रही हूँ आप सबको.
 
स्टेशन पर उतरते ही आपको अहसास हो जायेगा कि मैदानी इलाक़े से कहीं दूर आ गए हैं....सीढ़ियाँ चढ़ कर बाहर पहुँचिये तो यहाँ का रौनक भरा एकमात्र बाज़ार बाहें पसार देगा आपके लिए....बायां रास्ता बस स्टेशन की तरफ तो दायाँ झंडा चौक की तरफ़...बस स्टेशन की तरफ जाने वाला रास्ता बसों, यात्रियों, दुकानों और वहां आने वालों की भीड़ के चलते ख़ासा तंग हो जाता है....कंधे पर रस्सी डाले नेपाली पुरुष जिन्हें यहाँ की भाषा में डूट्याल कहा जाता है, इधर उधर दौड़ते दिख जायेंगे....ये लोग पहाड़ की ओर जानेवाली बसों तक भारी सामान पहुँचाने का काम करते हैं. ये रास्ता चाय और जलपान की छोटी दुकानों, फलों के ठेलों, सालों पुरानी भंडारी स्वीट्स की दुकान और किराने की कुछ और दुकानों से सजा रहता है....और यहाँ आपको पौड़ी गढ़वाल के अलग अलग इलाकों को जाने वाली बसों और टैक्सियों के ड्राईवर या कन्डक्टर आवाज़ दे देकर बुलाते मिल जायेंगे....माथे पर हल्दी चावल का टीका सजाये कोई रिश्तेदारों के यहाँ, कोई शादी में, कोई ख़रीददारी करके, कोई फौजी छुट्टियों पर, कोई लड़की गाँव में अपने मायके तो कोई मंदिर या पूजा के लिए सफ़र कर रहा होता है..हल्दी चावल का टीका जिसे यहाँ फिटाई कहा जाता है विदाई के समय का शगुन होता है....संकरे घुमाउदार पहाड़ी रास्तों पर बच्चों, बुजुर्गों, महिलाओं और पुरुषों से भरी ये बसें अपने आप में पूरे गढ़वाल की रौनक समेटे चलती हैं...और हाँ सजी धजी नयी नवेली दुल्हन को किसी मंदिर की यात्रा पर ले जाती गाड़ियाँ भी दिखेंगी....पहाड़ का असली मज़ा मतलब वहां की भाषा, मिज़ाज़ और लोगों से असल मुलाक़ात इन बसों या टैक्सियों में सफ़र करके ही हो पायेगी, एसी गाड़ियों में नहीं...ख़ूबसूरत नज़ारों, गढ़वाली गानों और लतीफ़ों के बीच सफ़र मज़े में कट जायेगा...हाँ चक्कर आने की बीमारी न हो बस..

अब ज़रा कोटद्वार स्टेशन वापस आते हैं और दाहिने रास्ते पर बढ़ चलते हैं...अब सड़क के दोनों ओर ज़रूरत के सामान की दुकानें मिलेंगी...बर्तन, जूते चप्पल, बिजली के उपकरण, मनोरंजन के लिए गढ़वाली गीतों के सीडी, कपड़े, किराने की दुकानें...दाहिनी तरफ साईं बाबा का मंदिर और बायीं तरफ एक सीध से कई दुकानें शादी के समारोहों के सामान की...वो नोटों की अलग अलग डिज़ाइन की मालाएं, सेहरे, सजावट, पूजा और शादी की और ज़रूरत का सामान, फूलों की दुकानें...सारी ख़रीददारी उतनी ही दूरी में फटाफट निपट जाये...और ये रहा सामने झंडा चौक....एक बहुत पुराना बड़ा चौराहा जिसमे बीच में एक झंडा लगा है...कहते हैं ये उस वक़्त से है जब से ये जगह बसी है...बस आपकी छोटी बड़ी हर ज़रूरत का सामान यहीं मिलेगा और यहाँ नहीं मिला तो वो इस जगह और कहीं नहीं मिलेगा...फिर तो आप हरिद्वार देहरादून ही जाइये...इस जगह से एक रास्ता गढ़वाल की तरफ, एक नजीबाबाद, और बाकी दो छोटे रास्ते यहाँ के स्थानीय इलाकों की तरफ जाते हैं...ये सभी रास्ते आगे जाकर छोटे छोटे रास्तों में बंट जाते हैं... और वो एक पतली गली जो बायीं तरफ गयी है न वो आगे जाकर दो और गलियों में बंट जाती है...उसमें से एक बस अड्डे पर मिलती है...एक गली में कपड़ों, सौंदर्य प्रसाधनों, जूते चप्पलों की दुकानें तो दूसरी तरफ किराने की दुकानें और फल और सब्जी मंडी...बड़ा मजेदार लग रहा था वो नींबू बेचने वाला लड़का...”खट्टे रसगुल्ले ले जाओ...ख़ूब पियो ख़ूब जियो”....एक खीरेवाला, खीरा जिसे यहाँ ककड़ी कहते हैं, आवाज़ दे रहा था कि ताज़े खीरे ले लो तो दूसरा उससे झगड़ रहा था कि तुम्हारे ताजें हैं तो क्या हमारे बासी है...और फिर दोनों की एक खिलखिलाती हंसी तैर गयी....अच्छी बात ये कि प्लास्टिक प्रतिबंधित है...या तो घर से थैला लेकर जाइये या उन कागज़ के लिफाफों में सामान लाइए.

गढ़वाल के रास्ते से आने वाले कुछ लोग टीका लगाये दिखेंगे....ये यहाँ के सिद्धबली मंदिर से लौट रहे हैं....इन्हें यहाँ का स्थानीय देवता कह सकते हैं...गढ़वाली तो वैसे भी देवी देवताओं के लिए अपने प्रेम के लिए प्रसिद्ध हैं ....खो नदी के बगल में पहाड़ी पर स्थित ये मंदिर यहाँ का बहुत पुराना मंदिर है...और मन्नत मानने वालों की लम्बी सूची है...जिनकी दुआएं पूरी होती हैं उनमे से कई लोग यहाँ भंडारा करवाते हैं...इस मंदिर की लोकप्रियता का अंदाज़ा आप इस बात से लगा सकते हैं कि शुरुआत में रविवार और मंगलवार को होने वाला भंडारा अब हर रोज़ होता है और अगले 6-7 सालों की बुकिंग इस वक़्त ही हो चुकी है...मतलब अगर आपकी कोई मनोकामना पूरी हुई है और आपको भंडारा करवाना है तो आपकी बारी 7 साल बाद आएगी...अब इन सब बातों को आप शौक से अपने तर्कों की कसौटी पर कस सकते हैं...आप इसे आस्था कहें या अन्धविश्वास ये आपकी समझ और सोच पर है.

यहाँ के लोगों के लिए ये मौसम बहुत गर्म है पर हम जैसों के लिए...जो जानलेवा गर्मी और देह भेदती लू को झेलने के आदि हैं, हमारे लिए तो ये कुछ भी नहीं...भरी दुपहरी मैं बहुत मज़े से तस्वीरें लेती और सब कुछ गौर से देखती और महसूस करती टहल रही थी..इस छोटी सी जगह में ज़्यादातर लोग एक दूसरे को जानते हैं...मसलन ऑटो चालक को मेरे परिवार के बारे में सब पता था...वो जानता था कि मैं बाहर से आई हूँ तो बताता चल रहा था कि घर से थैला लेकर आना था भुल्ली (भुल्ली यहाँ छोटी बहन को कहा जाता है) यहाँ तो प्लास्टिक की थैली नहीं मिलती...उसने मुझे ये भी बता दिया कि मेरे घर के किन किन सदस्यों को वो जानता है...एक अलग किस्म का जुड़ाव महसूस होता है जैसे हर कोई किसी न किसी तरह एक दुसरे से जुड़ा हो....मैं अपने सामान के अलग अलग लिफाफे समेट ही रही थी कि एक महिला भी अपनी नन्ही बच्ची के साथ बगल में आ बैठीं...उन नन्ही, चमकदार, कजरारी आँखों से मैंने इशारों में दो एक बातें की और वो देखिये वो निश्छल, चमकती, खिलखिलाती हंसी...बस हो गयी हम दोनों की जान पहचान भी और दोस्ती भी...अपनी मां की गोद से वो आ लपकी मेरी तरफ...थोड़ी देर यूँ ही इशारों की बातों, हंसी और मुस्कुराहटों का दौर चला...ऑटो चलते ही हवा से उस नन्ही परी की आँखें बोझल होने लगीं और वो वापस अपनी मां के पास पहुँच गयी...कैसे अजीब और करीबी होतें हैं कुछ रिश्ते...ख़ासतौर पर वो जो दुनिया की समझदारी से दूर रहकर बन जाते हैं...निश्छल, भोले, मासूम और ईमानदार...दुनिया की सारी फ़िक्र से दूर सोती हुई उस बेहद प्यारी बच्ची को देखते हुए मैं ये ही सोच रही थी जिसने गहरी नींद में भी अपनी नयी नवेली इस दोस्त की ऊँगली कसके थामी हुई थी.


उफ़, मेरी बातें तो ख़त्म होने का नाम ही नहीं लेतीं...ये देखिये शाम को रुख़सत कर, पहाड़ियों से ठंडी हवा के झोंके और सितारों भरा आसमान लिए दिलक़श रात पहुँच चुकी है छत पर...जानते हैं न रातें मुझे कितनी पसंद हैं...अब ज़रा यहाँ ठंडी हवा में बैठकर दूर पहाड़ियों के गांवों की टिमटिमाती रौशनियां देख लूँ...इजाज़त दीजिये....अगली बार अपने ननिहाल लेकर चलूंगी.   

गुरुवार, 3 अप्रैल 2014

एक सैर ज़िन्दगी से भरे बाज़ारों की..

आज ज़रा सैर हो जाये अहमदाबाद के कुछ बाज़ारों की....क्या कहा?? मॉल? न बाबा, बाज़ार मतलब तो वो शोख चटख रंगों से सराबोर, ज़िन्दगी के शोर और रौनक से भरे हुए, उस जगह के ठेठ देसीपन को ख़ुद में समेटे हुए पुराने बाज़ार....हँसते खिलखिलाते, भीड़ भाड़ से भरे बाज़ार जहाँ छोटी छोटी दुकानें रास्तों पर क़ब्ज़ा जमा लें....मोल भाव करके दाम कम करना ग्राहक का हुनर हो जिसके आगे तमाम न नुकुर के बाद भी आख़िर में दुकानदार को घुटने टेकने पड़ें....इन बाज़ारों की ज़िन्दगी को महसूस करने मैं होली के आस पास गयी थी...जी हाँ उस वक़्त तो ख़रीददारी अपने शबाब पर थी....लिखने में देरी इसलिए क्यूंकि छुट्टियों के दिनों में बेपरवाह यूँ ही अलग थलग पड़े रहना इतना अच्छा लगता है कि वक़्त, मूड और नीयत एक साथ मिल बैठें और कोई काम समय से हो जाये ये  मुश्किल ही होता है.

अगर घूमने – फिरने, दोपहर की तेज़ धूप और रात के स्याह अँधेरे की परवाह किये बग़ैर किसी जगह के चप्पे चप्पे को खंगाल डालने को आवारागर्दी करना कहते हैं तो जी हाँ ये ये मेरा पसंदीदा काम है. इस शहर में मेरा ठिकाना मेरी बहन के यहाँ है जो किसी ‘आदर्श गृहिणी’ की तरह घर के काम काज और बच्चों की फ़िक्र में कुछ यूँ आधी हुई जाती है कि शौक और अपनी निजी इच्छाओं से जुड़ी बातें वो भूतकाल में ही करती है....मसलन ”मुझे भी डांस का बड़ा शौक था” या मुझे भी घूमने जाना बहुत अच्छा लगता था....वर्तमान में कुछ बचा नहीं और भविष्य पर प्रश्नचिन्ह है...उसके पास हर रोज़ काम की एक लम्बी लिस्ट होती है....अगर किसी को इंसानी मशीन देखनी हो तो वो यहाँ आये या किसी और गृहिणी के घर भी चला जाये...तो अब ये तय था कि ‘आवारागर्दी’ तो अकेले ही करनी पड़ेगी....पर इसे संयोग कहें या हमारी अच्छी किस्मत कि हमें यहाँ भी एक साथी मिल गयीं...रश्मि जोशी. उनसे मेरी मुलाक़ात साल भर पहले लखनऊ में हुई थी बस उसके बाद फेसबुक ने हम दोनों की दोस्ती को ज़िन्दा रखा और इस यात्रा के दौरान ये और घनिष्ठ और मज़बूत हो गयी.

वो भी मेरे जैसी घुमक्कड़ मिज़ाज़...कभी भी कहीं भी चल पड़ो...फोटोग्राफर हैं तो कैमरे में उनकी जान बसती है... घूमघाम का पहला अड्डा था तीन दरवाज़ा बाज़ार....ऑटोवाला जान चुका था कि मैं गुजराती नहीं हूँ...बाज़ार के पास जब उसने हम दोनों को छोड़ा तो रश्मि से गुजराती में कहता गया कि ये बेन हिन्दीभाषी प्रदेश से आई हैं आप तो यहीं के हो इन्हें अच्छे से घुमा देना. उस जगह से गुज़रती तंग संकरी गलियों ने आख़िरकार हमें बाज़ार तक पहुंचा दिया...तीन बड़े और क़ारीगरी से खूबसूरत बन पड़े दरवाज़ों ने एकाएक मुझे लखनऊ के रूमी दरवाज़े की याद दिला दी...बस उसके आगे था बिलकुल मेरी अपेक्षाओं जैसा सजीला बाज़ार.


तीन दरवाज़ा पर मेरी साथी रश्मि 

बाज़ार में सबसे पहले मेरा ध्यान खींचा उन छोटी पतली कलाइयों में रंग बिरंगी चमकीली चूड़ियाँ पहने, दोनों चोटियों पर रंगीन रिबन और उन बड़ी, निच्छल, चमकदार आँखों में मोटा काजल लगाये और अपने नन्हे हाथों से अपनी मां की उंगली थामे ठुमक ठुमक चलती उस बच्ची ने...बस उससे इशारों में बात करते हुए हम दोनों भी उस भीड़ भाड़ और संकरी गली में पीछे हो लिए.

चारों तरफ नज़र दौड़ाई तो....उफ़, क्या कुछ नहीं मिलता यहाँ....हर वो चीज़ जो आप सोच सकते हैं और बहुत कुछ ऐसा जो आप सोच  नहीं सकते....ये बाज़ार काफी कुछ लखनऊ के अमीनाबाद बाज़ार जैसा है....भीड़ में टकराते कन्धों के बीच आगे बढती हूँ तो आवाज़ आती है “सौ की चार सौ की चार”, पहुँच के देखा तो पुरुषों की कमीजें बिक रहीं थीं....ज़रा सोचिये आज के समय में ₹ 25 की एक कमीज़!!

नकली रंग बिरंगे फूल, कपडे, पर्स, सौंदर्य प्रसाधन, रसोई का सामान, तोरण, पूजा का सामान, खिलौने, फल, सजावटी सामान, घर की बल्कि घर क्या किसी की ज़िन्दगी से जुड़ी छोटी मोटी ज़रूरतों की हर चीज़ यहाँ उपलब्ध थी....एक अच्छी बात जो मुझे यहाँ देखने को मिली है वो ये कि व्यवसाय में यहाँ महिलाएं भी काफी आगे हैं....कैसी भी दुकानें हों सब्जी से लेकर पानी पूरी तक की, उन्हें सँभालते यहाँ महिलाएं बहुतायत में देखी जा सकती हैं....इसमें कोई दो राय नहीं कि यहाँ के लोग बहुत मेहनती और काम की इज्ज़त करने वाले होते हैं....ये यहाँ के लोगों का गुण है और इसके लिए किसी ‘सरकार’ कोई कोई श्रेय नहीं जाता है....यहाँ व्यक्ति मौके तलाशते हैं आमदनी के, वो इंतज़ार नहीं करते कि उन्हें उनकी डिग्रियों के आधार पर ही काम मिले और अच्छी बात ये है कि इस आमदनी को वे मेहनत से उपजाते हैं.    
    
इस बाज़ार में ही अहमदाबाद की जामा मस्जिद है...कुछ बेनक़ाब खिलखिलाती लड़कियों को मैंने अन्दर जाते देखा तो उत्सुकता हुई....आमतौर पर मस्जिदों में महिलाओं का प्रवेश प्रतिबंधित होता है...मेरी साथी रश्मि मुझे वहीँ ले जा रही थी....तपती फर्श धूप से गर्म हो आग उगल रही थी...जूते हाथ में लेकर वज़ूखाने तक यूँ दौड़ लगाई जैसे किसी ने पीछे शेर छोड़ दिए हों....हाँफते हुए चारों ओर एक नज़र दौड़ाई....क्या भव्य और ख़ूबसूरत मस्जिद!! वज़ूखाने से मस्जिद की तरफ चेहरा करने पर एक विशाल खुले आँगन के सामने मस्जिद और बाकी तीनों ओर दीवार से सटी गलियारों जैसी जगह...मैं खुश थी ये देखकर कि कोई भी, महिला, पुरुष या बच्चे कहीं भी बैठकर प्रार्थना कर सकते हैं...वज़ूखाना भी एक ही....मतलब प्रार्थना करने के लिए लिंग पर आधारित बंटवारा इस मस्जिद में नहीं हुआ...ये जगह हर किसी के लिए खुली है...अगली दौड़ उस बड़े आँगन को पार करके मस्जिद तक पहुँचने के लिए लगानी थी...उस शांत भवन की ठंडी फर्श पर पैर रखकर जब सांस में सांस आई तो मस्जिद की क़ारीगरी पर मुग्ध हुए बिना नहीं रह सकी....ये मस्जिद सुल्तान अहमद शाह के काल में 1423 में बनायीं गयी थी....260 खम्भों पर टिकी इस मस्जिद में 15 खूबसूरत गुम्बदें हैं....शुरूआती समय में मस्जिद में महिलाओं के लिए एक अलग झरोखा बनाया गया था जो अब इस्तेमाल नहीं होता...अब महिलाएं भी किसी भी जगह बैठकर प्रार्थना कर सकती हैं....मैं यहाँ की क़ारीगरी को आँखों के साथ साथ अपने कैमरे में क़ैद करती चल रही थी.


जामा मस्जिद के दरवाज़े, खंभों और गुम्बदों की एक झलक 

मस्जिद में आने जाने के तीन रस्ते हैं...आँगन से सटे उन गलियारों से होकर एक रास्ते की तरफ बढ़ी तो एक बुज़ुर्ग महिला गुस्से से उन गिलहरियों को डपट कर भगा रही थी जो झुण्ड में खंभों से उतर उनके सब्जी पूड़ी के दोनों से खाना चुगने आ रही थी...महिला भिखारिन थी, मैं उनकी तस्वीर लेने लगी तो एक लम्बी मुस्कुराहट  उनके झुर्रियों से भरे चेहरे पर तैर गयी....मैंने उन्हें उनकी तस्वीर दिखाई तो दुपट्टा मुँह पर रख वो जोर से खिलखिलाई...जब मैं चलने लगी तो पूरे हक से उन्होंने गुजराती में कुछ कहा, मुझे समझ नहीं आया तो दोबारा कुछ यूँ कहा “मनी (money) दो मनी, शाम की चाय पीनी है”...अब तो खिलखिलाए बग़ैर मैं भी न रह सकी...एक नौजवान उनकी चाय लेकर पहुँच चुका था और अब वो अपनी शाम की चाय सुड़कने में मशगूल हो चुकी थीं....इसी जगह से मेरी साथी ने मुझे पीछे का बाज़ार दिखाया....ये माणिक चौक था....फल और सब्जियों का बड़ा बाज़ार और रात में खाने पीने की दुकानें इसे रौशन करती हैं...रात 1- 2 बजे तक लोगों की भीड़ रहती है....अब तो रात का ये फ़ूड बाज़ार देखना ज़रूरी हो गया था.

शाम का वक़्त काटने हम लॉ गार्डन के बाज़ार गए....इस बाज़ार का समय है शाम 7 से रात के 12 – 1 बजे....और लड़कियों का ये पसंदीदा बाज़ार है....सड़क किनारे फुटपाथ बाज़ार की शक्ल में सजा ये बाज़ार आपको कच्छ की झलक देता है....लहंगा चोली, बालों से लेकर पैरों तक को सजाने के तमाम नकली जेवर, बैग, चादरें, तोरण, कठपुतलियां, कच्छ की क़ारीगरी के सजावटी सामान, जूतियाँ और न जाने क्या क्या...रंगों, सितारों और चमकीली क़ारीगरी से सजा ये बाज़ार बेहद आकर्षक है...पर अगर आप मोलभाव के कच्चे हैं तो ये जगह आपके लिए नहीं.  


अहमदाबाद में कच्छ की झलक दिखाता लॉ गार्डन बाज़ार 

रात के 10 – 10:30 का वक़्त होगा...पर इस बात का यक़ीन करने के लिए आप अपनी घड़ी को शक़ की निगाहों से देखेंगे क्यूंकि कोई ताज्जुब नहीं अगर आपको ये महसूस हो कि आपकी घड़ी आज धीमी चल रही है या बंद पड़ गयी है....कौन कहता है कि रात को जिंदगी की रफ़्तार धीमी पड़ जाती है या ज़िन्दगी थम जाती है...कम से कम आधी रात को भी रौशनी से नहाया और खाने के शौकीनों की भीड़ से भरा माणिक चौक का बाज़ार आपकी इस सोच को खुली चुनौती देता है....मेरे शहर के बाज़ार में रात को ये रौनक रमज़ान के दिनों में दिखती है....यूँ लग रहा था जैसे किसी मेले में आ गए हों....ठेलों में दुकानें और सड़क पर बिछी कुर्सी मेज़ें....अगर जगह मिले तो वहीँ बैठ कर खाइए वरना खड़े खड़े या फिर इंतज़ार करिए जगह खाली होने का....क्या कुछ नहीं मिलता यहाँ खाने को, दक्षिण भारतीय, उत्तर भारतीय, बम्बैय्या, चाईनीज़ सब कुछ...मगर इन सबके अलावा सैंडविच के जितने प्रकार मैंने यहाँ देखे अपनी सीमित जानकारी के आधार पर ही सही पर उतने कहीं न देखे और न सुने.....हम घुमक्कड़ों के साथ अब एक और साथी हो ली थी...रश्मि की प्यारी, होनहार और अल्हड़ बेटी मिष्ठी...20 – 22 साल की उम्र की इतनी बेपरवाह और दुनिया के बनावटी रंगों से बची लड़की सालों बाद मिली....बस तो तीन महिलाओं की तिकड़ी ने कब्ज़ा जमाया एक मेज़ पर और 2 – 3 तरह के सैंडविच और पाव भाजी का आर्डर हो गया.


आधी रात को जगमगाता माणिक चौक का बाज़ार 
अब लोगों की भीड़ होगी तो तरह तरह का सामान भी मिलेगा...गुब्बारे, खिलौने, फल, रंग, त्योहार से जुडी और तमाम चीज़ें, सौंदर्य प्रसाधन, गानों और फिल्मों के सीडी और भी बहुत कुछ....उत्सुकता में सीडी के ठेले के पास गयी तो कई मशहूर हिंदी फिल्मों जैसे राम लखन, शक्ति के नाम पर बनी गुजराती फ़िल्मों की सीडी भी दिखी...खा पी के जब लौटने लगे...तो इन दुकानों के सामान पर नज़र पड़ी...अजीब बात है यहाँ थोक में लहसुन और चीनी एक ही दुकान पर मिलती है...मेरी साथी जो कि लखनऊ से ही हैं, उन्होंने बताया कि कैसे जब वो शुरू में यहाँ आई थी तो उन्हें बड़ी दिक्क़त हुई थी क्यूंकि लहसुन सब्जी की दुकान में तो मिलता ही नहीं था....ज़िन्दगी से भरी इतनी जागती रात से ये मेरी पहली मुलाक़ात थी.

एलिस ब्रिज पर ठंडी हवा में थोड़ी देर टहलने के बाद तीनों अपने अपने घर लौट चुके थे और अब मैं आधी रात को अपने कमरे की खिड़की से उस बेहद खूबसूरती चाँद को देख रही थी....इसे देखना और देखते ही जाना कितना ठंडक भरा एहसास देता है न? मुझे रातें बेहद पसंद हैं....अँधेरी रात की खुश्बू और सुकून भरे अहसास को महसूस किया है कभी? मैं घंटों बल्कि घंटों क्या पूरी रात बालकनी में बैठ के गुज़ार सकती हूँ....आसमान में टिमटिमाते तारों....रात की सर्द हवा के साथ पेड़ों के पत्तों को झूमते देखते हुए...उस सरसराहट की आवाज़ को महसूस करते हुए....उस हवा से मुख़ातिब होते हुए....रात को इंसानी दुनिया थम जाती है इसलिए ये वो वक़्त होता है जब आप प्रकृति से सीधे मुलाक़ात कर सकते हैं.....हालाँकि आज जिस रात को मैं माणिक चौक पर देख के आ रही थी वो बिलकुल अलग थी....और भी कई जगह घूमी हूँ....जल्द वहां की भी सैर कराऊंगी...तब तक के लिए अलविदा!!

सोमवार, 10 मार्च 2014

ज़िंदा सपनों, उम्मीद और संघर्ष का लेखा जोखा

आजकल डेरा अहमदाबाद में अपनी बहन के यहाँ डाला हुआ है...अजीब सनक है मुझे....कुछ दिन बाहर न निकलूं तो लगता है ज़िन्दगी थम गयी है....सब कुछ नीरस, रुका हुआ, बेजान, उदास...यूँ तो अपने शहर से मुझे बेइंतहा मुहब्बत है और जो सुकून मुझे वहाँ मिलता है वो कहीं और नहीं मिलता फिर भी ऐसी स्थितियां हो जाती हैं जिन्हें  दुरुस्त करने का बस एक ही इलाज होता है...बैग पैक करो और निकल पड़ो....कुछ लोग अपने खानाबदोश जीवन से परेशान रहते हैं पर मेरे साथ उलट है...कुछ कुछ दिनों में बदलाव नहीं हुआ तो अजीब उदासी घेर लेती है....पर शायद ऐसा होना ज़रूरी भी है वरना प्राथमिकताओं की लम्बी लिस्ट के चक्कर में बाकी सबकुछ तो हो रहा है...घर, बाहर, ऑफिस की सारी जिम्मेदारियां....सांसें भी चल ही रही हैं...बस ज़िन्दगी जीना कहीं दूर पीछे छूट गया है....कम से कम इस बहाने अपनी कोफ़्त या सनक के चलते ही सही मैं ज़िन्दगी जीने और कुछ रिश्तों में प्यार का कलफ लगाने का जुगाड़ कर ही लेती हूँ...घुटन की इन स्थितियों में मेरे दोस्त और मेरी बहन मेरे लिए ऑक्सीजन का काम करते हैं.

मज़े की बात ये कि जिस आवासीय सोसाइटी में मेरी बहन का घर है वहां मेरा स्वागत ऐसे होता है जैसे वहां की  सारी महिलाएं मेरी बहनें हों....शुरू शुरू में तो इस आत्मीयता को समझने में भी वक़्त लग गया था...पर फिर समझ आया कि ये मेरी बहन के कर्मों का बोनस है जो मुझे मिलता है....मेरी बहन बचपन से ही बड़ी व्यवहारकुशल रही है....खटपट दोस्ती करने में और रिश्ते जोड़ने में उसका कोई सानी नहीं....दूसरों के सुख दुःख को उसने हमेशा ख़ुद में महसूस किया है....इसलिए वो जब भी जिस भी शहर गयी है उसने अपने आसपास एक परिवार सा माहौल बना लिया है....बस तो दीदी, भैया, आंटी, अंकल से भरा एक परिवार यहाँ भी बन चुका है....और उस परिवार में मुलाक़ात से पहले ही मेरा नाम भी दर्ज हो चुका था.

इसी परिवार में एक दीदी हैं जो कि किसी गैर सरकारी संगठन से जुड़ी हुई हैं इसलिए उन्हें सब एनजीओ वाली दीदी के नाम से जानते हैं...दीदी ऐसी सख्त हैं कि सारे उनसे डरते हैं....उनका प्यार भी डांट के लहजे में तब्दील होकर निकलता है....इस चक्कर में छोटे बड़े सब दहशत में रहते हैं...यूँ लगता है जैसे उनको देखते ही सबकी जुबां हलक की जगह पेट में कहीं चली जाती है पर हाँ जितनी वो सख्त हैं बच्चों के साथ उतनी ही मस्त...बच्चे उनसे बड़े खुश...कोई बच्चों को कुछ कह दे तो मोर्चा खोल देती हैं...बच्चो की माएं उनसे ख़ासी दूरी बनाकर रखती हैं....क्यूंकि उनका और मेरा कार्यक्षेत्र मिलता जुलता है तो अक्सर बात हो जाती थी...वो शाम को घर पर बच्चों को ट्यूशन पढ़ाती हैं और इस वक़्त यहाँ वार्षिक परीक्षाएं चल रही हैं सो उनसे मिलना जुलना कम ही हो पाया...एक दिन दो तीन मिनट को बात हुई और किसी बात पर महिला दिवस का ज़िक्र आया...उनकी प्रतिक्रिया निराशा, गुस्से और झुंझलाहट से भरी हुई थी...उनका कहना था कि क्या बदला इतने सालों में...स्थितियां बद से बद्तर होती जा रही हैं....हर गली नुक्कड़ में महिला दिवस मनाया जा रहा है....महिला दिवस के मायने बदल गए हैं और महिलाएं आगे बढ़ने की जगह पीछे हो गयी हैं...सोसाइटी की बाकी महिलाओं की ओर इशारा करते हुए उन्होंने कहा कि देखो क्या बदलाव आया है इनमे...इनकी चर्चा के विषय आज भी वो कपडे लत्ते और गहने ही हैं... उनकी ये निराशा विकास से जुड़े हर पहलू पर थी...विकास के मुद्दे पर नरेन्द्र मोदी पर अपनी भड़ास निकल कर और उसे कोस कर वो चली गयीं....पूरी बातचीत के इस आखिरी हिस्से से मुझे बड़ी तसल्ली हुई थी...उनकी इन बातों से काफी हद तक तो मैं भी सहमत हूँ पर उनके जाते ही मैंने ख़ुद से सवाल किया कि क्या वाकई हम इस क़दर पिछड़ गए हैं?? क्या वाकई कोई बदलाव नहीं आया और क्या वाकई हम इस तरह हिम्मत हार सकते हैं??? इस वक़्त पीछे मुड़ कर संघर्ष के एक लम्बे इतिहास के साथ बहुत कुछ देखने समझने की ज़रूरत महसूस हुई कि आखिर कहाँ पहुंचे हैं हम और क्या वाक़ई पूरी तरह से भटक चुके हैं..तो सोचा क्यूँ न एक लेखा जोखा ही कर लिया जाए.

बात की शुरुआत स्व. राजेंद्र यादव जी के शब्दों में करूँ तो “स्त्री हमारा अंश और विस्तार है. वह हमारी ऐसी जन्मभूमि है जिसे हमने अपना उपनिवेश बना लिया है. हमारी सोच और संस्कृति के सारे सामंती और साम्राज्यवादी मूल्य उपनिवेशों के आधिपत्य और शोषण को जायज़ ठहराने की मानसिकता से पैदा होते है...दलित हमारे घरों और बस्तियों से बाहर होता है. स्त्री हमारे भीतर है, इसलिए उसका संघर्ष ज्यादा जटिल है. उनकी मुक्ति स्वयं हमारी मुक्ति है. यानी गुलाम बनाये रखने वाली मानसिक गुलामी से मुक्ति है.” (‘आदमी की निगाह में औरत’ से साभार)

अर्थात ये तो स्पष्ट है कि मौजूदा परिवेश में स्त्री एक संघर्ष और जटिलता का जीवन लेकर ही पैदा होती है....हालांकि बराबरी के उस समाज के लिए कोशिशें बदस्तूर जारी हैं. अपने जीवन के ही फ्लैशबैक में जाऊं को बहुत सारी यादें हैं...ईमानदारी से कहूँ तो अपने बचपन की बहुत खुशहाल तस्वीर नहीं हैं मेरे दिमाग में...एक दब्बू खामोश अंतर्मुखी और बेहद संवेदनशील बच्ची जिसने बचपन से ही अपने आस पड़ोस में हिंसा के अलग अलग रूप न सिर्फ देखे बल्कि महसूस भी किये...सच कहूँ तो परिवार से पहले शायद लोगों का ये व्यवहार ही था जिसने मुझे एहसास दिलाया कि मैं एक लड़की हूँ... मैं लड़कों से अलग हूँ और यौनिकता (ये शब्द तब पता नहीं था) जैसी कोई चीज़ होती है जिसके बारे में किसी से कुछ नहीं कहना चाहिए....मेरी स्मृतियों में आज भी बचपन के वो अनचाहे स्पर्श ताज़ा हैं जो कि ज़्यादातर नन्ही अबोध बच्चियों को कभी बहला फुसलाकर या कभी डरा धमका कर किये जाते हैं....ये सिलसिला जारी रहता अगर बड़े होने पर मैं मुखर न हुई होती और तथाकथित तौर पर बदतमीज़ या मुंहफट न हुई होती ..लखनऊ के जिस पुराने मुहल्ले में मैं रहती थी वहां कई परिवारों में पति द्वारा शराब पीकर रात को पत्नी की पिटाई करना आम बात थी....पति द्वारा सारी संपत्ति शराब में लुटाये जाने के बाद उन सहृदय बुज़ुर्ग महिला जिन्हें पूरा मुहल्ला मामीजी कहता था, का सिलाई करके एक एक दिन की रोटी जुगाड़ने की जद्दोजहद....बहुत कुछ है और शायद बचपन की इन सब बातों ने ज़रूरत से पहले बड़ा कर दिया...मैंने अपने जीवन का एक लम्बा हिस्सा गुपचुप रहके बिताया है...शायद बचपन की वो अप्रिय स्मृतियाँ थी जिनकी वजह से मैंने अपने चारों ओर एक दायरा बना लिया और लोगों से दूरी...दुनिया के अच्छे पुरुषों को मैं अपनी ऊँगली पर गिन सकती थी और उसमे सबसे पहले मेरे पापा आते थे....मार तो दूर की बात है पापा से डांट भी नहीं पड़ती थी....पर चर्चा करने का खुलापन उनके साथ भी नहीं था..भाई 10 साल बड़े थे तो उनके लिए तो मैं बच्ची थी..आज इस बात को सोचती हूँ कि कैसा माहौल मिलता था मेरे जैसी बच्चियों को बचपन में...हमारे घर में हमारा कोई दोस्त नहीं होता था..मेरा तो नहीं था/ थी...ऐसा दोस्त जिससे खुल कर किसी भी तरह की बात की जा सके...जीवन किताबों तक सीमित...इसके अलावा दिलचस्पी, शौक या कला जैसी भी कोई चीज़ होती है ये बड़े होकर पता चला...क्यूंकि पापा शांत थे तो सख्ती करने की ज़िम्मेदारी मां की थी...उन्होंने अपने जीवन में जिस किस्म की कठिनाइयों का अनुभव किया था उस वजह से एक अलग किस्म का गुस्सा और कड़वाहट थी उनके व्यवहार में ...पर ये बातें मैं अब समझती हूँ...तब उनकी सख्ती ने हमारे मन में सिर्फ डर भरने का काम किया था....पापा ने पढाई के लिए बहुत संघर्ष किया था इसलिए वो हम भाई बहनों को अच्छी शिक्षा देना चाहते थे...जाने क्यूँ उम्मीदों का बोझ मुझपर थोड़ा ज्यादा था तो मेरे खेल भी पढाई लिखाई से जुड़े ही होने लगे....जो भी हो पर ऐसे बचपन को खुशहाल और अच्छा बचपन कतई नहीं कहा जा सकता....मैं कभी नहीं चाहूंगी कि मेरे घर के बच्चों का बल्कि किसी भी बच्चे का बचपन ऐसा हो.

7 वीं कक्षा में बेहतर शिक्षा के उद्देश्य से मेरा दाख़िला अंग्रेजी माध्यम स्कूल में करा दिया गया...मुझे यहाँ पहुँचाने में मेरी बहन का सबसे बड़ा योगदान रहा...अंग्रेजी के बढ़ते चलन की वजह से बढ़ते भेदभाव और हिंदी माध्यम के छात्रों के लिए अवसरों की कमी को उसने महसूस किया था...पर इस विद्यालय में आकर नंबर लाने का एक नया संघर्ष शुरू हुआ...भेदभाव के तमाम आयाम मुझे यहाँ आकर पता चले...पढने में तेज़ व कमज़ोर बच्चों के बीच भेदभाव, आर्थिक रूप से मज़बूत और कमज़ोर परिवारों के बच्चों के बीच भेदभाव, और भी कई यादें हैं ऐसी...पर ये भी सच हैं कि कुछ समय बाद आत्मविश्वास भी आया हालांकि उसके लिए भी 3 साल संघर्ष करना पड़ा....पर एक बार मुखर होने के बाद पीछे लौटने की नौबत नहीं आई...जब 11 वीं में थी तो बहन वीमेंस स्टडीज पढ़ रही थी....बहन में आये बदलाव को देखकर मैं उस विषय से इस कदर प्रभावित हुई कि तभी ठान लिया कि  मुझे भी आगे जाकर यही विषय पढना है....स्नातक तक कमोबेश जीवन यूँ ही था...हिम्मत आई विश्वास भी आया पर किसी अपने के बढ़ते ग़लत हौसलों पर प्रतिक्रिया देना अभी भी नहीं आया था...ऐसी बातें मुझे तब भी सन्न कर देती थी और उस व्यक्ति को कोसते हुए मैं फिर अपने बनाये दायरे के अन्दर दुबक जाती.

मेरे जीवन में असली बदलाव एमए के समय से आया...घर के विरोध के बावजूद मैंने वीमेंस स्टडीज विषय चुना...तब से आत्मविश्वास, बदलाव और सोच में जो तरक्की होनी शुरू हुई वो आज भी जारी है जिसके लिए मैं कई सारे लोगों की शुक्रगुजार हूँ जिसमे मेरी अध्यापिका, मार्गदर्शक और बेहतरीन दोस्त प्रो रूप रेखा वर्मा के साथ साथ मेरे दोस्त और मेरी बहन शामिल हैं. सबसे अच्छी आदत जो पड़ी वो थी सवाल करने और तर्क ढूंढने की....इस चक्कर में धर्म और पाठ पूजा के बोझ से भी ख़ुद को हल्का कर लिया क्यूंकि जिन भगवान को मानते आ रहे थे सवालों और तर्कों के इम्तिहान को वो पास न कर सके. 
                 
खैर, मेरे जीवन की ये झलक बहुत थोड़ी है पर इन कुछ बातों का ज़िक्र मैंने इसलिए किया ताकि शुरू में ख़ुद से किये सवाल का उत्तर के एक सिरे तक पहुँच सकूँ...कि क्या वाकई कुछ नहीं बदला है.    
आज के परिवारों में बच्चों को देखती हूँ तो पाती हूँ बच्चियां कहीं ज्यादा मुखर हैं...हाँ यौनिक हिंसा को आज भी हर घर में चर्चा का विषय नहीं बनाया गया है...बच्चों के साथ यौनिक हिंसा आज भी बड़े पैमाने पर होती है पर पहले के मुकाबले ज्यादा घरों में इस विषय को लेकर जागरूकता आई हैं..अभिभावक चौकन्ने हुए हैं...हालांकि इस बात से भी मेरा कोई इनकार नहीं कि ज़रुरत इससे कहीं ज्यादा होने की है.

शिक्षा के स्तर से लेकर अवसरों की उपलब्धता और अन्य कलाओं को प्राथमिकता देने का चलन भी बढ़ा है....फोटोग्राफी, अभिनय, कला, लेखन, विज्ञान, खेल जैसे और कई तकनीकी क्षेत्रों में लड़कियों की भागीदारी बढ़ी है...इन क्षेत्रों को भी करियर के विकल्प में देखा जाने लगा है जो कि अच्छी बात है...लड़कियों का घर से बाहर निकलना बढ़ा है...महिलाओं की राजनीति में रूचि व भागीदारी बढ़ी है... अभी अभी हिंदुस्तान टाइम्स की एक खबर पढ़ रही थी जिसमे कहा गया था कि उत्तर प्रदेश में 2009 में हुए आम चुनावों और 2012 में हुए विधान सभा चुनावों में महिला मतदाताओं की भागीदारी के प्रतिशत में लगभग 16% की वृद्धि हुई थी...2009 में महिलाओं की 44% भागीदारी दर्ज की गयी थी जो कि 2012 में बढ़कर 60 % हो गयी थी. तो ये बात तो साफ़ है कि बदलाव तो यकीनन आये हैं पर हाँ इतना काफी नहीं है... और ये भी सच है कि इन अच्छे बदलावों के साथ प्रतिकूल व स्थितियों को बिगाड़ने वाले बदलाव भी भारी मात्रा में आये हैं.

मसलन, अभी राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो की वर्ष 2012 की रिपोर्ट देख रही थी ...महिला के प्रति हुई हिंसा के आंकड़े तकलीफ और चिंता देने वाले हैं...यहाँ ये बात फिर जोर देकर कहूँगी कि ये वो आंकडें हैं जो सरकारी दस्तावेजों में दर्ज हुए हैं....अधिकांश घटनाओं में शिकायत दर्ज नहीं की जाती है इसकी वजहें कई हैं...ये कथित तौर पर घर की इज्ज़त से जुड़ा मसला होता है, ‘भले’ घर की औरतें थाने या कोर्ट कचेहरी नहीं पहुँचती (ये अलग बात है कि  इन भले घरों में औरतें मारी, पीटी, सताई और यहाँ तक की जला दी जाती हैं पर इससे घर की इज्ज़त पर कोई आंच नहीं आती) और साथ ही पुलिस का असंवेदनशील रवैया और कोर्ट कचेहरी की कमरतोड़ लम्बी और खर्चीली प्रक्रिया उनके हौसले पहले ही पस्त कर देती है...असंवेदनशीलता मानसिकता में इस कदर घुसी होती है कि रवैये, कार्य प्रक्रिया और नतीजे हर जगह ये साफ़ नज़र आती है....अगर इन घटनाओं का भी कोई आंकड़ा मिलता तो कुल आंकड़ों में जो उछाल आता वो इस तथाकथित सभ्य समाज की जो तस्वीर पेश करता उसकी कल्पना करना संभव नहीं...खैर बात करते है दर्ज शिकायतों के आंकड़ों की..
वर्ष 2012 में महिलाओं के प्रति हुई हिंसा के 2,44,270 मामले दर्ज किये गए..2011 की तुलना में ये आंकड़ा 6.4% की वृद्धि दिखाता है...2008 से इन आंकड़ों में 24.7 % की वृद्धि दर्ज हुई है...2008 में ये संख्या 1,95,856 थी. देश के 10 राज्यों में इन घटनाओं की संख्या 10,000 से ऊपर है...3 राज्यों में 5001 से 10000 के बीच है और बाकी राज्यों में इससे कम है......राष्ट्रीय स्तर पर अपराध की दर 41.74 है और असम में ये सबसे ज्यादा 89.5 आंकी गयी है...बलात्कार के 24,923, अपहरण के 38,262, दहेज़ हत्या के 8,233, पति व अन्य रिश्तेदारों द्वारा हिंसा के 1,06,527, महिलाओं के शीलभंग करने के उद्देश्य से किये गए हमलों के 45,351, महिलाओं की अस्मिता और शील (modesty) को अपमानित करने के 9,173 और विदेशों से की गयी लड़कियों की तस्करी/ आयात के 59 मामले दर्ज हुए हैं...ये सभी मामले भारतीय दंड संहिता के अंतर्गत आते हैं....इन अपराधों में 2011 की तुलना में 6.1% की वृद्धि हुई है...इसके अलावा मानव तस्करी के 2,563, महिलाओं की अभद्र अथवा आपत्तिजनक छवि बनाने/ दिखाने के 141 और दहेज निरोधक कानून के अंतर्गत 9,038 मामले दर्ज हुए हैं....विशेष और स्थानीय कानून के अंतर्गत आने वाले इन अपराधों में 23.5% की वृद्धि हुई है. एक आंकलन करने के लिए अगर कुछ अपराधों की सज़ा की दर पर नज़र डालें तो आंकड़े हताश करने वाले हैं. उदाहरण के तौर पर बलात्कार के मामलों में ये दर 24.2, अपहरण में  21.2 , दहेज हत्या में 32.3 और महिला का शीलभंग के उद्देश्य से की गयी हिंसा के मामलों में 24.0 दर्ज की गयी है.                         
                  
ज़ाहिर है तस्वीर बेहद विचलित कर देने वाली है...और ये तस्वीर किसी एक वर्ग, धर्म, जाति, आयु, पेशे या क्षेत्र तक सीमित नहीं...औरत या लड़की का अपने हक के लिए आवाज़ उठाना हमारे समाज में परवरिश का हिस्सा ही नहीं होता है...इस दुनिया में आने से पहले से लेकर जाने तक एक लड़की भेदभाव और हिंसा को अनगिनत रूपों में झेलती है...स्थिति अब सिर्फ चिंताजनक न होकर भयावह हो चुकी है और ये दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र को शर्मसार कर देने वाली बात है....ज़िम्मेदारी सरकार, पुलिस, न्यायपालिका, मीडिया से लेकर आमजन तक की है...जागरूकता एक बड़ा विकल्प होता है लेकिन अब सिर्फ इतना काफी नहीं...कड़े कानून और उनका क्रियान्वयन अब सबसे बड़ी ज़रुरत बन चुका है....कानून व्यवस्था और न्यायप्रणाली को संवेदनशीलता का परिचय देते हुए इन शिकायतों का जल्द निपटारा करने की ज़रूरत है..बल्कि अब तो ज़रूरत एक ऐसी व्यवस्था की भी हो गयी है जो इनकी निरंतर निगरानी करे...स्थितियां अब वो नहीं रहीं जब हम ये कह सकें कि ख़ुद को बदलने से ही सुधार आएगा...जागरूकता का यह स्तर आवश्यक है पर अब उससे कहीं ज्यादा आवश्यक है कड़े कानून होना और उनका क्रियान्वयन सुनिश्चित किया जाना...पीड़िताओं का भरोसा न्यायप्रणाली से उठने लगे और शिकायतकर्ता के दिल में पुलिस की दहशत बैठी हो, ये स्थितियां सरकार और कानून व्यवस्था को भद्दा मजाक साबित करती हैं लेकिन अफ़सोस की बात ये है कि स्थितियां ऐसी ही हैं बल्कि लगातार और भी बुरी होती जा रही हैं.    
  
वैश्विक स्तर पर देखें तो यूएन वुमन के शोध के अनुसार अनुसार, विश्व भर में 66% कार्य महिलाओं द्वारा किया जाता है, 50% खाद्य सामग्री का उत्पादन महिलाओं द्वारा किया जाता है लेकिन इस कार्य के बदले महिलाओं की आय का हिस्सा सिर्फ 10% होता है और दुनिया भर में महिलाओं को सिर्फ 1% संपत्ति पर ही स्वामित्व प्राप्त है...एक बड़ी खाई सदियों से बनी है जो गहरी और चौड़ी होती जा रही है...वो काम के घंटों की हो, समान कार्य के लिए असमान वेतन की हो, कार्यक्षेत्र में होने वाले भेदभाव की हो या संपत्ति पर अधिकार की हो.

उदाहरण के लिए भारत में ही देखें तो आज भी लोग संपत्ति पर अधिकार देने की जगह लड़कियों को शादी में दहेज  देते हैं...ऐसा करके वो एक कुरीति के साथ साथ कभी न ख़त्म होने वाले लालच और इसके नतीजे में मिलने वाली हिंसा को बढ़ावा देते हैं. ये सोच ही बेहद हास्यास्पद होती है कि अधिक दहेज दिए जाने पर ससुराल में बेटियों को खुश रखा जायेगा....आये दिन की घटनाओं से ये स्पष्ट है कि शादी नाम की संस्था के चरमराने की एक बड़ी वजह ये रवैया भी है...इसके अलावा ये चलन ग़लत उदाहरण पेश करते हुए आर्थिक रूप से अक्षम लोगों पर बोझ बढ़ाने का काम करता है और विवाह को रिश्तों की ऐसी दुकान बनाता है जहाँ बोली तो लड़कों की लगती है पर सारे इम्तिहान लड़की को देने पड़ते हैं.....साथ ही ऐसी संपत्ति से लड़की का कोई सशक्तिकरण नहीं होता...पर ख़ुद माता पिता का ये मानना होता है कि अचल संपत्ति (जिसका मूल्य अधिक होता है) पर बेटे का अधिकार होता है...कानूनी हक होने के बावजूद अगर बेटी संपत्ति पर अपने हिस्से की मांग कर ले तो उसे तीखे ताने देने से कोई पीछे नहीं हटता...इसके साथ एक बात और कहना ज़रूरी लगता है...बेहद क़ाबिल और अच्छी लड़कियों को भी आज के समय में एक असफल विवाह का दंश झेलना पड़ रहा है...ऐसे में सबसे पहले लड़की को और उसकी महत्वाकांक्षाओं को ही ज़िम्मेदार ठहराया जाता है...लड़की से ही त्याग की न सिर्फ उम्मीद लगायी जाती है बल्कि विवाह को सफल बनाने की सारी ज़िम्मेदारी उसके ऊपर ही डाल दी जाती है...ऐसा करने में लड़की के मां बाप और अन्य रिश्तेदार बढ़ चढ़कर हिस्सा लेते हैं...अत्यंत विषम परिस्थितियों मे यदि ससुराल से अलग होने की नौबत आये तो मां बाप और भाइयों की हवाइयां उड़ने लगती हैं जैसे एक बड़ा बोझ आ गया हो...उसे हौसला दिए जाने की जगह ‘एडजस्ट’ करने की सलाह दी जाती है..घर से डोली और ससुराल से अर्थी उठने की मानसिकता आज भी उतनी ही मज़बूत है...ऐसे में या तो महिला ऐसे जीवन को नियति मानकर बर्दाश्त करे, या फिर अगर हिम्मत रखती है और सक्षम है तो ससुराल और मायके दोनों से अलग रहकर नए सिरे से ज़िन्दगी की जद्दोजहद शुरू करे...अपनी जान देने का विकल्प भी कई महिलाएं अपनाती हैं...मैं किसी ऐसी महिला को नहीं जानती जो ऐसी स्थितियों में पूरे हक से अपने मायके जाकर संपत्ति पर अपने हक की मांग की हो.....मेरी ही एक सहेली 8 साल से अपने ससुराल में यूँ ‘एडजस्ट’ करने को विवश है....जब उसके पिता को मैंने समझाने की कोशिश की तो उन्होंने मुझसे कहा हमारे यहाँ ऐसा नहीं होता, दो बच्चे हो गए हैं अब दोबारा शादी भी नहीं होगी....मेरी मौसेरी बहन का असफल प्रेम विवाह तलाक पर ख़त्म हुआ पर उसके माता पिता ने उसको इस मानसिक तकलीफ से निकालने की बजाय साल भर के भीतर उसकी दोबारा शादी करवाने को अपना उद्देश्य बनाया और ऐसा करवाकर ही दम लिया....ख़ुद मुझसे ही मिलने वाले हर दूसरे इंसान का पहला सवाल और चिंता मेरी शादी से जुड़ी होती है..मतलब ये कि लड़की के जीवन में विवाह एकमात्र और आखिरी उद्देश्य होता है......उसके सपने, पहचान, अस्मिता, काम, क़ाबिलियत और प्राथमिकताएं शादी तक ही सीमित होती हैं.... इसके बिना उसका जीवन निरर्थक है. 
                      
ज़ाहिर है हक और हुक़ूक़ की लड़ाई में महिलाएं दुनिया भर में पीछे हैं... कभी धर्म, कभी जाति, कभी कर्त्तव्य, कभी परंपरा तो कभी संस्कारों के नाम पर महिलाओं को पीछे धकेलने की कोशिशें लगातार जारी हैं....साथ ही बाज़ार ने खूबसूरत जाल बिछा कर अधिकाँश महिलाओं को अपनी गिरफ्त में लेकर उन्हें वस्तु में तब्दील करने में कोई कसर नहीं छोड़ी है...अब उसका काम करना ज़रूरी है पर उसका गोरा दिखना भी उतना ही ज़रूरी है...वो डॉक्टर हो पर घर आकर फर्श पर पोंछा कैसे मारा जायेगा, बच्चे किस साबुन से हाथ धोयेंगे और बर्तन धोने के लिए कौन सा साबुन आएगा ये भी वो ही देखेगी....ये निर्णय लेने में भागीदारी नहीं है बल्कि बाज़ार के चालाक और कुटिल दिमाग ने उसे दोगुने कार्यबोझ के नीचे दबा दिया है..मीडिया ने इसे पूरी तरह से मज़बूत करने का काम किया है...अधिकाँश अखबार व न्यूज़ चैनल अब खबर का माध्यम न होकर बाज़ार के हाथों की कठपुतली बन चुके हैं और दुकानों में तब्दील हो चुके हैं....मीडिया की भूमिका पर विस्तार से बात फिर कभी होगी.

तो हमारा धर्म, मान्यताएं रिवाज़ तो तस्वीर को बेहतर बनाने से रहे...रुढियों, पिछड़ी मान्यताओं और हर उस व्यवस्था को खुली चुनौती देना बेहद ज़रूरी है जो किसी भी तरह पितृसत्ता या गैर बराबरी के सामाजिक ढाँचे को मज़बूत करती हो....तस्वीर अच्छी तो बिलकुल नहीं और बदलाव के जिस दौर में हम हैं उसमे भटकाव की ज़बरदस्त गुंजाईश और डर है....पर उम्मीद का साथ नहीं छोड़ा जा सकता यहाँ तक लाने में भी जाने कितने लोगों का सदियों का संघर्ष शामिल है..उनकी हिम्मत और जज्बों ने तस्वीर में बड़े बदलाव किये हैं जो आजादी, हक और सशक्तिकरण के किसी न किसी रूप में आज हमारे सामने हैं और सबसे बड़ी बात तो ये की इस विषय को मुद्दा बनाया है....इतिहास पर नज़र डालें तो कई मामलों में हम यकीनन एक बेहतर माहौल में हैं...हम यहाँ से वापस नहीं पलट सकते इसलिए हम संघर्ष और उम्मीद दोनों को साथ लेकर चलेंगे....ये सच है कि इस भटकाव की वजह से कई बार आन्दोलनकारियों का मजाक बना दिया जाता है पर ये उस संघर्ष का ही एक हिस्सा है और कहीं न कहीं ये पितृसत्ता और रुढ़िपंथियों की खिसियाहट को दिखाता है...ये संघर्ष बराबरी के समाज के लिए है...इसमें पुरुषों की भागीदारी उतनी ही ज़रूरी है जितनी महिलाओं की क्यूंकि इस ढाँचे ने कर्त्तव्य और परम्पराओं की बेड़ियों में उन्हें भी ठीक उसी तरह कसा है जैसा कि महिलाओं को...मज़बूत और सख्त बनाने के चक्कर में उनकी मानवीय भावनाएं छीन ली हैं. मैं नकारात्मक सोच के साथ आगे नहीं बढ़ सकती और ये समय स्थितियों के आगे घुटने टेकने का नहीं बल्कि उनसे और भी उत्साह और मजबूती के साथ लड़ने का और अपनी कोशिशों को निरंतर जारी रखने का है...हम संख्या में भले कम हैं पर हम अकेले नहीं और ये मुद्दा किसी अकेले का नहीं....तस्वीर हर पल बदल रही है....मेरा विश्वास है कि इस लड़ाई से ये और बेहतर होगी....ये तो नहीं कह सकती कि कब लेकिन मुझे पूरा विश्वास है कि वो सुबह कभी तो ज़रूर आएगी....ऐसी स्थिति में हौसलों को जिंदा रखने के लिए ही पाश बरसों पहले ये पंक्तियाँ कह गए थे:

मेहनत की लूट सबसे ख़तरनाक नहीं होती
पुलिस की मार सबसे ख़तरनाक नहीं होती  
गद्दारी, लोभ की मुट्ठी सबसे ख़तरनाक नहीं होती

बैठे बिठाये पकडे जाना बुरा तो है
सहमी सी चुप्पी में जकड़े जाना बुरा तो है
पर सबसे ख़तरनाक नहीं होती

सबसे ख़तरनाक होता है
मुर्दा शान्ति से भर जाना
ना होना तड़प का
सब कुछ सहन कर जाना
घर से निकलना काम पर
और काम से लौटकर घर आना
सबसे ख़तरनाक होता है
हमारे सपनो का मर जाना 

रविवार, 23 फ़रवरी 2014

घोंसला हौसलों का..

अहमदाबाद. यह शहर मेरे लिए अनजाना नहीं लेकिन कुछ ख़ास जाना पहचाना भी नहीं....यहाँ के चटख रंग, ऊर्जावान और मेहनती लोग, साधारण जीवनशैली और गरबे का संगीत...बहुत कुछ है जो किसी को प्रभावित कर देता है पर एक संवेदित नागरिक के तौर पर सोचूं तो गुजरात के साथ काले अध्याय भी जुड़े हुए हैं जिनका असर आज भी ज़िन्दा है.....ख़ैर...इस बार यहाँ आने की वजह पारिवारिक थी...अभी तक बाहर निकलना ज्यादा हुआ ही नहीं पर घर बैठे ही कुछ देखा महसूस किया वहीँ यहाँ साझा करुँगी.

कहते हैं प्रेरणा लेने के लिए दुनिया, लोग, समय, उम्र, क्षेत्र इत्यादि की कोई सीमाएं नहीं होती पर बात यहाँ उससे एक क़दम आगे जाकर जब आपको ये एहसास अपने आस पास के जीव जंतुओं को देख कर हो जाये....ज़रुरत बस ख़ुद को उनसे जोड़कर महसूस करने की होती है.....मसलन कभी झूमकर नाचते हुए मोर को देखिये, जी करेगा कि दुनिया भूलकर उसके साथ झूमें नाचें...ख़ुद के अन्दर के सोये हुए बेपरवाह इंसान को फिर ज़िन्दा कर दें...जंगल में चौकड़ी भरते हिरणों के झुण्ड को देखिये, आप याद करने लगेंगे कि वो आख़िरी बार कब था जब आप दोस्तों के साथ यूँ ही किसी दिन सड़क पर निकल पड़े थे या वो कब था जब आप खुल कर कुछ यूँ हँसे थे कि आँखें गीली हो गयी थीं....सड़क पर या मिट्टी में लोटते उन नन्हे मुन्ने शावकों को देखिये आपको अपने बचपन के दिन याद आ जायेंगे जब खेलते हुए धूल मिट्टी में गिरना पड़ना आम बात होती थी या ज़िद में सड़क पर लेट जाना ब्लैकमेल करने का सबसे आसान तरीका.

ज़िन्दगी उम्मीदों का नाम है और उम्मीदें ज़िन्दा रखने के लिए मज़बूत हौसलों का होना बहुत ज़रूरी है....एक दिन यूँ ही जब आसमान बादलों से घिरा था और कमरे में बैठकर कॉफ़ी की चुस्कियां लेते हुए नज़र बाहर बालकनी में पड़ी तो कबूतरों का एक जोड़ा दिखा...बेहद प्यारा पक्षी होता है ये, जो इस शहर में बेइंतहा पाया जाता है....यहाँ सुबह अलार्म की आवाज़ से न होकर कबूतरों की गुटरगूं से होती है...मेरी बहन का घर ऊंची इमारतों वाली जिस सोसाइटी में हैं वहां अक्सर महिलाएं इसी कोफ़्त में बडबडाती दिख जाएँगी कि इन कबूतरों ने तो जीना दूभर कर दिया है...हर वक़्त शोर...खिड़की या दरवाज़ा खुला छोड़ दो तो अन्दर घुस आते हैं...बालकनी में फिर घोंसला बना दिया है वगैरह वगैरह....कबूतरों के साथ इनकी ऐसी नोकझोंक से दो बातें बहुत याद आती हैं...एक, हर किसी के बचपन में एक ऐसा बुज़ुर्ग (नानी, नाना, दादी, दादा या कोई और भी) ज़रूर होता था जिसे परेशान करना बच्चों का पसंदीदा शगल होता था. ये बुज़ुर्ग परिवार, मोहल्ले, गाँव, कहीं के भी हो सकते थे...बच्चों की शैतानियों से गुस्साए ये बुज़ुर्ग उनको डपटते, भगाते, उनके मां बाप से उनकी शिकायत करते या छड़ी लेकर उनको दौड़ाते कभी भी देखे जा सकते थे....पर किसी दिन अगर ये ही बच्चे उन्हें नहीं दिखते तो सबसे ज्यादा बेचैनी भी इनको ही हो जाती..या किसी दिन माता पिता बच्चों को डांट रहे होते तो बचाने भी सबसे पहले ये ही पहुँचते क्यूंकि डपटने का हक़ सिर्फ इनका ही होता था...एक अलग क़िस्म का रिश्ता होता था इन बुजुर्गों और बच्चों में....कुछ ऐसा ही रिश्ता है यहाँ मंडराते इन कबूतरों और इन महिलाओं में....दूसरी जो बात बहुत याद आती है वो है टॉम एंड जेरी कार्टून....बिलकुल वैसा ही युद्ध छिड़ा रहता है दोनों में...  
    
हाँ तो....बालकनी में दिखा कबूतरों का जोड़ा अपनी अपनी चोंच में तिनके दबाये....और उन गोल नारंगी चौकन्नी आँखों से इधर उधर टुकुर टुकुर देखते. कपड़ों का जुगाड़ करने के कार्यबोझ से पंछी अभी बचे हुए हैं पर भोजन  और मकान का सवाल इनके सामने भी होता है...तो आज ये जोड़ा अपने आशियाने की तलाश में निकला था और जगह जो उसे पसंद आई, वो थी दीदी की बालकनी में मोड़ कर खडी की हुई कालीन.....जो भी मापदंड होते होंगे एक अच्छे, सुरक्षित, हवादार आशियाने के, उनमें शायद ये जगह एकदम सही बैठी....बस तब फिर क्या तिनका तिनका जोड़कर घर तैयार करने की कवायद शुरू हो गयी.....पंख फैलाये उड़ान भरते हुए दोनों कभी नीम तो कभी अमलतास के  पेड़ पर पहुँच जाते और चोंच में दबा लाते अपने घर के लिए एक तिनका....मैं सोच रही थी कि  कितना अच्छा और आसान होता है इन पक्षियों के लिए....कोई लोन नहीं लेना, कोई ज़मीन नहीं खरीदनी बस ये तय करो कि कहाँ बनाना है घोंसला और शुरू हो जाओ...मेरी ये ग़लतफहमी को कुछ पलों में ही तगड़ा झटका लगा जब बडबडाती हुई मेरी बहन बालकनी में पहुंची.....”उफ़ इन कमबख्त़ कबूतरों ने तो हैरान कर दिया है....घर के बाकी काम क्या कम पड़ते हैं जो ये चले आते हैं काम बढ़ाने...एक तरफ सफाई कर करके दम निकला जाता है उस पर ये चले आते हैं घोंसला बनाने” और बस ये कहने के साथ ही वो आधा बना घोंसला धराशायी कर दिया गया....मैं उसकी परेशानी और गुस्सा समझ सकती थी पर फिर भी अफ़सोस हुआ जो तब और बढ़ गया जब चोंच में तिनका दबाये कबूतरों का वो जोड़ा बालकनी में पहुंचा और अपना घोंसला वहां न पाकर विस्मय से इधर उधर देखने लगा....उन्हें यूँ देखकर मुझे बहुत तकलीफ़ और मायूसी हुई....ऐसा लगा कि कितनी तकलीफ़ हो रही होगी इन दोनों को अपनी इतनी देर की मेहनत को ज़ाया होते देख कर...उनका उत्साह और हौसला टूटा होगा ....पर अब मेरी इस सोच को झटका देने का काम इन कबूतरों का था....पूरी दृढ़ता (जिसे मेरी बहन ढिठाई कहती है) से उन्होंने अपने तिनके दोबारा ठीक उसी जगह रखे....और उनका नन्हा आशियाना बनाने का सिलसिला फिर शुरू हो गया....अब ये खुली चुनौती थी और अब इस खेल में वास्तव में मज़ा आ रहा था....इधर घोंसला गिराया जाता और उधर अगला तिनका ठीक उसी जगह फिर पहुँच जाता...जैसे कहा जा रहा हो कि आप चाहे जो कर लें घर तो यहीं बनेगा...खुली दबंगई जैसा कुछ.....पर हाँ एक बात गौर देने वाली थी....याद करने की कोशिश करूँ तो बामुश्किल ऐसे चंद इंसानों को ही याद कर पाऊँगी जो अपने अन्दर ऐसी ज़िद, हिम्मत, हौसला और मज़बूत इरादे रखते हों...इंसानों को जीवन की चुनौतियाँ और हार इन जीवों की तुलना में जल्दी तोड़ती हैं या कमज़ोर तो कर ही देती हैं और अगर मसला किसी बुनियादी ज़रुरत से जुड़ा हो तो भावनाएं और भी जल्दी आहत होती हैं....मैं हैरान भी थी और बेहद प्रभावित भी...जो सबक मुझ तक पहुंचना था वो अब तक पहुँच चुका था...मैं मुस्कुराकर देख रही थी अपने इन नए जिद्दी बेख़ौफ़ दोस्तों को....6–7 बार तो गिराया ही जा चुका था पर उसी ऊर्जा से बदस्तूर जारी है सिलसिला बनाने का....एक घोंसला हौसलों का !! 

सोमवार, 13 जनवरी 2014

उन 'आधुनिक' पुरुषों से मुख़ातिब हम 'पिछड़ी' लड़कियां



इस तथाकथित डेवलपमेंट सेक्टर से जुड़े हुए लगभग 8 साल पूरे हो चुके हैं....पढाई को भी जोड़ दूँ तो 10 साल. वक़्त बहुत तेज़ी से गुज़रा. पढाई के दिनों में एक ख़ास छवि थी इस क्षेत्र की मेरे दिमाग में. कि ये क्षेत्र उन जुझारू, बहादुर, संवेदित और जानकार लोगों का है जो वाकई में समाज को बदलने की न सिर्फ नियत और इच्छा रखते हैं बल्कि विरोध और कठिनाइयों से निपटने की कुव्वत भी. उस ख़ास बुद्धिजीवियों की जानकारी का भंडार और जूनून देख कर चकित भी होती थी और प्रभावित भी. ऐसा महसूस होता था की काश हम भी कभी इन जैसे बन सकें. ये ही वो लोग हैं जो बराबरी का समाज लाने का माद्दा रखते हैं. पर इतने सालों में ये छवि न जाने कितनी बार टूटी, कितनी बार बदली और इस क्षेत्र का एक असली और बेहद अलग चेहरा एक दु:स्वप्न की तरह झकझोर कर चला गया. मैं यहाँ ये बात साफ़ कर दूँ कि मैं शिद्दत से इस बात को मानती हूँ कि अच्छे लोग कम हैं पर वे हर जगह मौजूद हैं बल्कि शायद उनकी वजह से ही उम्मीदें आज भी जिंदा हैं. साथ ही इस लेख का आशय ये कतई न निकाला जाय कि मैंने हर पुरुष या लड़के को एक ही वर्ग में लाकर खड़ा कर दिया है. चूँकि बीते कुछ दिनों में एक के बाद एक घटनाएं मेरे आस पास के लोगों के साथ साथ मेरे साथ भी घटीं इसलिए इस तरह के लोगों के ख़िलाफ़ बोलना ज़रूरी हो गया है. अब इस बात में कोई संदेह नहीं कि अन्य क्षेत्रों की भांति ये क्षेत्र भी अत्यधिक प्रदूषित हो गया है. ये प्रदूषण मानसिकता से लेकर आचरण तक हर जगह है. सबसे ज्यादा ख़तरनाक बात ये है कि ऐसा करने वाले बुद्धिजीवी लोग वो हैं जो मंचों पर अपने भाषणों में, अपनी किताबों व लेखों में बड़ी बड़ी आदर्श बातें करते हैं. इन लोगों से युवा खासे प्रभावित होते हैं और इन्हें अपने आदर्श के तौर पर देखते हैं. लेकिन गुस्से, घृणा, नफरत और अफ़सोस से भरा होता है वो पल जब इनकी दुहरी मानसिकता और ओछापन नज़र आता है.

आज मैं इस बात को पूरी मज़बूती के साथ कहती हूँ कि कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि व्यक्ति किस संस्था से जुड़ा हुआ है. उनकी सोच की ये गन्दगी हर स्तर पर है. बात ग्राम, ज़िले या प्रदेश स्तर की संस्थाओं की हो या बड़ी अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं की.....सोच का ये दिवालियापन हर जगह काबिज़ हो चुका है. इसे सोच के खुलेपन से लेकर, फैशन और मौज मस्ती के रूप में देखा जा रहा है. एक लड़की से मुख़ातिब हर दूसरा आदमी उसमें मौका तलाशता हुआ मिलता है. ये सोच रखना कि महिला अधिकारों और बराबरी की बात करने वाले ये पुरुष संवेदित हैं, अक्सर एक भद्दा झूठ साबित होता है. वो पुरुष जानकार, पढ़ा लिखा, अच्छा वक्ता और प्रदर्शनकारी तो हो सकता है पर वो एक संवेदित इंसान हो या अपने उन भाषणों पर अमल करने वाला हो ऐसा कतई ज़रूरी नहीं. ये लोग हमारे आस पास होते हैं, हमारे अध्यापक, बॉस, सहकर्मी या कई बार ये वो भी हो सकते हैं जिन्हें हमने अभी तक अपने आदर्श के रूप में देखा हो. ये हमारे जानने में कोई भी हो सकते हैं इसीलिए ये लोग ज़्यादा ख़तरनाक होते हैं. अपनी पढाई पूरी करके इस क्षेत्र में काम करने आई लड़कियां इनकी सॉफ्ट टार्गेट होती हैं जिन्हें ये आसानी से अपनी बातों से प्रभावित भी कर लेते हैं और फंसा भी लेते हैं. बीते कुछ दिनों में मेरी मित्र के साथ और पिछले कुछ दिनों में मेरे साथ घटी इस घटना ने एक बार फिर झटका दिया. हमारी उस सोच को फिर पुख्ता किया कि कोई फ़र्क नहीं पड़ता वो पुरुष कौन है, क्या है, क्या करता है, उसकी सामाजिक, वैचारिक, शैक्षिक पृष्ठभूमि क्या है, चाहे कुछ हो जाए उस पर भरोसा करने की ग़लती मत करो. उनसे बात भी मत करो, और ये सोच तो भूल के भी मत रखो की चूँकि तुम और वो एक ही क्षेत्र में काम करते हैं या एक ही ऑफिस में काम करते हैं तो औपचारिक शिष्टाचार या एक दूसरे की मदद करना सामान्य बात है. बच के रहो क्यूंकि तुम्हारे इस आचरण का मतलब ये कुछ और ही निकालते हैं. अपनी सोच की सारी हदें पार करते हुए वो तुम्हारे इस व्यवहार का नतीजा ये निकालते हैं कि तुम उनके लिए उपलब्ध हो. और अगर उनके इस व्यवहार पर कोई आपत्ति जताती हो तो इसका साफ़ मतलब ये है कि तुम्हे अपनी सोच और नज़रिया खोलने की ज़रूरत है. उनके हिसाब से तुम्हें उनके भद्दे मज़ाक पर कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए, उनके चाय, कॉफ़ी या उनके साथ घूमने जाने की इच्छाओं को पूरा करना चाहिए, अपनी सोच और मानसिकता को बदलते हुए इस खुलेपन को अपनाना चाहिए जिसमें उनके बेहुदे स्पर्श पर तुम्हे आपत्ति, गुस्सा, या घृणा का भाव आने की जगह मज़ा आये. इसे फैशन और अपनी देह की स्वतंत्रता समझना चाहिए. यही बराबरी है, यही चलन है, यही सशक्तिकरण है और उनके हिसाब से यही सही है.

पर क्या किया जाये. पुरुषों की ऐसी खेप को कैसे समझाएं कि महाशय हम बड़ी ढीठ लड़कियां हैं, और आप जैसे लोगों ने हम लोगों को चालाक भी बना दिया है, सड़क, बस, ऑटो, स्कूल, दफ्तर हर जगह आप जैसे लोग मौका तलाशते मिल ही जाते हैं. कई बार हमारी तेज़ी आपको फ़ौरन आपकी हदें बता देती है और कभी कभी थोड़ी देर हो जाती है....आप उस वक़्त बच निकलते हैं. पर हाँ इतना ज़रूर तय है कि आपके चंगुल में तो हम आने से रहीं और ये भी तय है कि देर सवेर आपको सबक सिखाने में हमे रत्ती भर संकोच न होगा, और उस सबक की भाषा, यकीन मानिए वही होगी जो आप समझते हैं और आप जिसके योग्य हैं. हो सकता है आपके हिसाब से हम बेहद दकियानूसी और सोच से पिछड़ी हों, हम आधुनिकता, तरक्की और खुलेपन के उस मापदंड पर बिलकुल भी फिट न बैठते हों जो आपकी उन तरक्कीपसंद बहुराष्ट्रीय कम्पनियों में हमारी मौजूदगी को सार्थक करे पर क्या करें इन चुनौतियों ने मज़बूत कर दिया है हमें. हम न सिर्फ़ आपकी घटिया हरकतों के दुर्ग को भेदेंगे, आपके क्षेत्र में आपके सामने अपनी मौजूदगी मज़बूती से दर्ज कराएँगे, कहीं कोई समझौता नहीं करेंगे बल्कि वक़्त आने पर आपको सबक सिखाने से भी नहीं चूकेंगे. हर बार आपका वक़्त अच्छा हो और आप बच निकलें ये मौका अब तो आपको मिलने से रहा. मैं हैरान हूँ तुम मर्दों के बढ़ते उस हौसले पर जिसमे अपने इस व्यवहार पर तुम्हें शर्मिंदगी होने की जगह गर्व होता है.

लड़कियों इस बात को जान लो कि न समाज, न समाज का ढांचा और न समाज के ठेकेदार, कोई भी तुम्हारी तरफ़ नहीं है. हर किसी को सवालिया नज़र से देखना यूँ तो सही नहीं पर जो स्थितियां हैं उसमें सिर्फ ये ही सही है. भरोसा सिर्फ खुद पर करो और दूसरों पर जितना भी करो अपनी सारी ग्रंथियां खोल के करो, कोई फर्क नहीं पड़ता सामने कौन है. किसी भी शर्त पर, किसी भी तरह के फ़ायदे के लिए ख़ुद को समर्पित करने से बचो. तुम्हारी दैहिक स्वतंत्रता से जुड़ा निर्णय लेने का हक़ सिर्फ और सिर्फ तुम्हारा है. किसी और को ये हक़ नहीं बनता कि वो उस पर तुम्हे सलाह भी दे. और हाँ कई बार आपका दिमाग उस वक़्त साथ नहीं देता पर ये तय कर लो कि इन लोगों को इनकी जुबां में सबक सिखाना बहुत ज़रूरी है. खुद को सुरक्षित रखने के लिए भी और उन तमाम लड़कियों को हौसला देने के लिए भी जिनकी उम्मीद तुम सब हो. वो जानकार हैं, बुद्धिजीवी हैं, पढ़े लिखे हैं, अनपढ़ हैं, विद्यार्थी हैं, बेरोजगार हैं, अफसर हैं, गरीब हैं, अमीर हैं, रसूखवाले हैं, रिश्तेदार हैं या कोई भी हैं. हमारी बला से. तुम्हारा शोषण करने वाले या तुम्हारी ज़िन्दगी तय करने वाले ये कोई नहीं...महाशय आपकी दोहरी मानसिकता आपको मुबारक जो बड़ी बड़ी बातें करने के बाद खुलेपन और दैहिक स्वतंत्रता का हवाला देकर स्त्री को एक उपभोग की ही वस्तु बनाती है. हाथों में नोबेल विजेताओं की किताबें होना, बड़े क्रांतिकारियों के विचार मुंहजुबानी याद होना, शराब पीना, लड़की के शरीर के हर हिस्से तक अपनी पहुँच बनाना आपके लिए चलन होगा. पर अपनी इस आदत और हरक़त को खुद तक ही रखिये और खुद को हम सबसे दूर रखिये. आप एक अच्छे इंसान होते तो साथ चलने में हमें भी ख़ुशी होती. पर ऐसा नहीं है और अकेले हम अब भी नहीं. आप जैसों की तादाद बहुत ज्यादा है पर हम जानते हैं दुनिया में एक बड़ी तादाद उन अच्छे पुरुषों की भी है जो हमारा साथ देने, हौसला बढाने, इंसानियत में विश्वास को जिंदा रखने के साथ साथ आपको आपकी सही जगह याद दिलाने में हर क़दम पर हमारे साथ होते हैं.